ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अथवा माला हाथमें लेनेसे । सर्पाभास भय मिटता जैसे । मेरे पुरुषोत्तमत्व-बोधसे । जगाभाससे छूटता ॥ ६१ ॥ अलंकार सोनेका है जो जानता । अलंकारके मोहमें नहीं आता । उसी भांति मुझको जो है जानता । छूटता भिन्नत्व ॥ ६२ ॥ फिर सर्वत्र सच्चिदानंद । कहता मैं एक स्वयं सिध्द । अपनेमें अन्य कोई भेद । नहीं जानता ॥ ६३ ॥ उसीसे है सब जाना । अल्प है यह कहना । उसके लिये तू जान । नहीं रहा द्वैत ॥ ६४ ॥ इसलिये मेरा भजन । वही एक योग्य है जान । गगन जैसा अलिंगन । करता गगनका ॥ ६५ ॥ जैसे क्षीर-सागरको भोजन । दे सकता क्षीर-सागर बन । या अमृत होकर ही मिलन । अमृतसे जैसे ॥ ६६ ॥ मिलानेसे सुवर्ण शुध्द । मिलता है सुवर्ण शुध्द । वैसे मैं बनकर सिध्द । मेरी भक्ति ॥ ६७ ॥ अजी ! सिंधु रूप यह नहीं होती । गंगा सिंधुसे कहो कैसे मिलती । इसीलिये मैं न बनकर भक्ति- । में कैसा प्रवेश ॥ ६८ ॥ इसीलिये हे सभी प्रकार । कल्लोल अनन्य है सागर । ऐसे मुझसे हे धनुर्धर । भजता है जो ॥ ६९ ॥ जैसे सूर्य और प्रभा । एक रूप और लोभ । वैसे ही योग्यता लाभ । उस भजनका ॥ ६७० ॥ इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुध्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥ ऐसा गूढ कहा शास्त्र निष्पाप तुझसे यह । इसको जानके धीर होते हैं कृत कृत्य ही ॥ २० ॥ ६२१ पुरुषोत्तमयोग
यह शब्द-ब्रह्मका नवनीत है— जबसे किया कहना प्रारंभ । अब तक सब शाखावलंब । कहा है उपनिषद सौरभ । कमलका मान ॥ ७१ ॥ यह शब्द-ब्रह्मका मथित । तथा व्यास प्रज्ञाके है हाथ । मंथन कर जो नवनीत । सार लिया हमने ॥ ७२ ॥ ज्ञानामृतकी है जो जान्हवी । आनंद-चंद्रकी सत्रहवी । विचार क्षीरार्णवकी नवी । लक्ष्मी है यह ॥ ७३ ॥ तभी अपनी पद-वर्णसे । अर्थके यह जीव प्राणसे । मुझे छोड़ न जानती जैसे । महालक्ष्मी जो ॥ ७४ ॥ सम्मुख आया जब क्षराक्षरत्व । न कहा तब उनका पुरुषत्व । तथा समर्पण किया है सर्वस्व । मुझ पुरुषोत्तममें ॥ ७५ ॥ इसीलिये विश्वमें गीता । मुझ आत्मकी पतिव्रता । यह जो अब तू सुनता । इस समय ॥ ७६ ॥ सच बोलना तो यह नहीं शास्त्र । संसार जीतनेका है महाशस्त्र । तथा है आत्म अवतारका मंत्र । इन अक्षरोंमें ॥ ७७ ॥ तुझसे यह है कहा गया । यह ऐसा हुवा धनंजय । यह गोप्य धन निकलवाया । मुझसे आज ॥ ७८ ॥ मुझ चैतन्य शंभुका माथा । जो गीता तत्व था वह पार्थ । उसका गौतम बन आस्था- । निधि तू आया ॥ ७९ ॥ अपनी निर्मलतासे अर्जुन । करते सम्मुख अवलोकन । बन कर तू आया दर्पण । हमारे लिये ॥ ५८० ॥ अथवा भरा हुवा चंद्र तारागण । नभ सिंधुमें होता अवतरण । वैसे ही मैं गीता सह अंतःकरण- । में डूबा तेरे ॥ ८१ ॥ यह गीता आत्म-ज्ञानकी लता है— त्रिविध मल निश्चित । छोड़ गया तुझे पार्थ । तभी तू गीता सहित । बना मम स्थान ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६२२
किंतु क्या बोलूं यह गीता । मेरी ज्ञानकी है जो लता । जानता जो इसे समस्त । होता मुक्त मोहसे ॥ ८३ ॥ सेवन की अमृत सरिता । रोग गंवाकर पांडुसुत । अमरपन यह उचित । देती जैसे ॥ ८४ ॥ वैसे ही जाननेसे यह गीता । निर्मोह होना विस्मय क्या पार्थ । अपने आत्म-ज्ञानमें होना रत । होता सरल ॥ ८५ ॥ जिस आत्म-ज्ञानके स्थान । कर्म जो अपना जीवन । लय कर होगा अर्जुन । ऋण-मुक्त ॥ ८६ ॥ खोया हुआ दिखा कर जैसा । मार्ग जाता है वीर-विलास । ज्ञान बनता कलश वैसा । कर्म-प्रासादका ॥ ८७ ॥ इसीलिये ज्ञानी पुरुष । कर्म करता है निःशेष । बोलता अनाथोंका सखा । इस प्रकार ॥ ८८ ॥ इस गीता-ज्ञानकी परंपरा— यह श्रीकृष्ण वचन-अमृत । न समानेसे छलकाता पार्थ । तब हुई हे व्यास कृपा प्राप्त । संजयको यहां ॥ ८९ ॥ उसने धृतराष्ट्रको दिया । धृतराष्ट्रसे पान कराया । इसीलिये जीवांत भया । उसका सरल ॥ ५९० ॥ आया गीता श्रवण अवसर । लगा उसको नहीं अधिकार । किंतु जीवनांत समय पर । उससे मिला प्रकाश ॥ ९१ ॥ द्राक्षा-लतामें दूध डाला जाता । व्यर्थ गया यह ऐसा दीखता । फल पाकमें वह दूना होता । जिस प्रकार ॥ ९२ ॥ वैसे हरिमुखके अक्षर । संजयने कहे स-आदर । उससे अंध स-अवसर । हुवा दुखी ॥ ९३ ॥ उसकी कर देश-भाषा रचना । उसको ऐसी वैसी कर सजना । सुना दिया उसे मैंने जैसे वह जाना । श्रीचरणोंमें ॥ ९४ ॥ ६२३ पुरुषोत्तमयोग
सेवंती जब अरसिक देखते । उसमें विशेष कुछ भी न पाते । किंतु सौरभसे सब कुछ खाते । भ्रमर सार ॥ ९५ ॥ ज्ञानेश्वर महाराजका विनय— वैसे तत्वका करना स्वीकार । खामी देना मुझको लौटाकर । कुछ न जानना स्वभाव सार । अबोध शिशुका ॥ ९६ ॥ यद्यपि यह अनजान होता । उसको देख कर माता पिता । आनंद विभोर होके सतत । होते हैं प्रसन्न ॥ ९७ ॥ वैसे मेरे सर्वस हैं संत । उनसे करना लाड नित । वैसे ही लाड है यह ग्रंथ । मानेंगे आप ॥ ९८ ॥ कव विश्वात्मक यह माझा । स्वामी है निवृत्ति राजा । स्वीकार करें यह वाक्पूजा । कहता ज्ञानदेव ॥ ९९ ॥
गीता श्लोक २०
ज्ञानेश्वरी ओवी ५९९.
१६ दैवासुर-संपद्विभाग-योग चित्सूर्य श्रीगुरु वंदन- मिटाते हुये विश्वका आभास । उदित हुआ विस्मित चंडांश । अद्वय-कमलिनीका विकास । नमन करें अब ॥ १ ॥ अविद्या-तम जो दूर करता । ज्ञानाज्ञान तारोंको निगलता । ज्ञानियोंका है सुदिन करता । स्वबोधका ॥ २ ॥ जिससे उदित होते ही दिन । खुलके आत्म-ज्ञानके नयन । तजता है जीव-पक्षी अर्जुन । देहभावका घोंसला ॥ ३ ॥ लिंग-देह कमल मध्यमें । फंसा चिद्भ्रमर बद्धतामें । बंध-मोक्ष होता है प्रकाशमें । उसके उदयसे ॥ ४ ॥ सिकुडे पथमें शष्प-शब्दोंके । दोनों किनारोंमें भेद-नदीके । चीखते हैं पागल विरहके । बुद्धि औ' बोध ॥ ५ ॥ उन चक्रवाकोंका मिथुन । समरसका जो समाधान । प्रतीत करता चिद्गगन । भुवनका दीप ॥ ६ ॥ जिसके उदयका प्रातःकाल । मिटाता है भेद-चोरका काल । आत्मानुभव-पथिक सकल । चलते योगी ॥ ७ ॥ जिसके विवेक-किरण संग । उन्मेष-सूर्यकांतके स्फुलिंग । जला देता है अरण्य-विभाग । संसारके ॥ ८ ॥ रश्मि-पुंज जिसका अति प्रखर । होते ही स्वरूप ऊसरमें स्थिर । आता वहां महा सिद्धियोंका पूर । मृगजलका ॥ ९ ॥ (79)
अजी प्रबोधके माथे पर । सोऽहंताका मध्यान्ह आकर । आत्म-भ्रांति छाया जो सत्वर । छिपती पदतलमें ॥ १० ॥ तब विश्व-स्वप्न सहित । अन्यथा मति जो निद्रित । न रहती जब माया रात । सम्हालेगा कौन ॥ ११ ॥ तभी अद्वय-बोध-पुरमें अति । महदानंदकी भीडभाड होती । फिर सुखानुभूतिकी उतरती । बात लेनदेनकी ॥ १२ ॥ अथवा माना सदा ऐसा । मुक्त-कैवल्य सुदिवस । देता है सदैव प्रकाश । उदयसे उसके ॥ १३ ॥ निज-धाम-व्योमका राव । उदित रहता सदैव । उदयास्त दिशाका ठाव । मिटाता है वह ॥ १४ ॥ न दीखना दीखने सह मिटाता । दोनोंसे ढका हुवा जो उजलाता । उसका प्रातःकाल ही भिन्न होता । अवर्णनीय ॥ १५ ॥ दिन-रातके जो उस पार । प्रकाश रूप ज्ञान-भास्कर । दीप्ति बिन दीप्ति है अपार । देखता कौन ॥ १६ ॥ मौन छोडकर गुरु-गुण-वर्णनके लिये क्षमा याचना— श्रीनिवृत्ति वह चित्सूर्य । नमन उसे स-विनय । बाधक है स्तवन-कार्य । शाब्दिक जो यहां ॥ १७ ॥ गुरु-देवकी महिमा देखकर । स्तवन करना हो यदि सुंदर । गुरु-चरणमें लीन हो तत्पर । स्तव्य-बुद्धिसे ॥ १८ ॥ न जानते जो सब जानते । मौन निगल बखाने जाते । कुछ भी न होनेसे हैं आते । अपने यहां जो ॥ १९ ॥ तेरी स्तुतिमें होना जिसे तत्पर । पश्यंति मध्यमाको निगलकर । होती है परा सह वैखरी फिर । जहां विलय ॥ २० ॥ एसे तुझमें सेवकपनमें । शब्द-स्तोत्र-भूषण चढानेमें । यह सहनकर कहनेमें- । भी न्यून अद्वयानंद ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ६२६
किंतु रंकने देखा अमृत सागर । तब जो उचितानुचित भूलकर । दौडा करने उसका पाहुनाचार । लेकर साग-पात ॥ २२ ॥ यहां साग-पात ही बहुत कहना । उसके हर्ष-वेगपर ध्यान देना । दीपसे सूर्यकी आरती उतारना । यहां देखना भक्ति ॥ २३ ॥ बालक यदि उचित जानता । उसका बालपन क्या रहता । किंतु होती है जो उसकी माता । तोषती बहू ॥ २४ ॥ गांवकी गंदगीसे भरा जो नीर । आता है सिर पर पैर देकर । तब कहती क्या गंगा हठो दूर । उससे कभी ॥ २५ ॥ अजी ! कैसा था भृगुका अपाचार । उसको मानकर प्रियोपचार । तब की हरिने संतुष्ट होकर । गुरुकी पाद्य-पूजा ॥ २६ ॥ आता जब गगन तमसे भर । सूर्यके सम्मुख तब देखकर । कहता है क्या भास्कर “तू हो दूर ।” कभी ऐसे ॥ २७ ॥ वैसे भेद-बुद्धिकी तुला पर । सूर्योपमाके शब्द डालकर । तोला है जो मैंने श्रीगुरुवर । सहन करें स्वामी ॥ २८ ॥ देखा जिन्होंने ध्यान-चक्षुसे । वर्णन किया है वेद-काव्यसे । वह सब क्षमा किया जैसे । मुझे भी क्षमा कर ॥ २९ ॥ किंतु आज मैं तेरे गुणगानमें । ललचाया दोष न मान मनमें । न उठूंगा कभी मैं अर्थ-तृप्तिमें । कुछ भी हो फिर ॥ ३० ॥ जन्म-जन्मांतरके सत्य-वचन-तपका फल है यह गीतार्थ — गीताके नामसे तेरा सतत । सेवन करता प्रसादमृत । तभी वर्णन किया है ईप्सित । दैवसे मिला दूना ॥ ३१ ॥ किया सत्य-वचनका तप । मेरी वाणीने अनेक कल्प । उस फलका है महा-दीप । मिला यह स्वामी ॥ ३२ ॥ पुण्य-पोषण किया असाधारण । उससे ही हुवा तेरा गुण-वर्णन । यह फल देकर हुए उऋण । आज वे स्वामी ॥ ३३ ॥ ६२७ दैवासुर-संपद्विभाग-योग
मैं जीव-दशाके अरण्यमें । जा फंसा था मृत्युके गांवमें । वह दुर्दशा इस क्षणमें । मिटाई आपने ॥ ३४ ॥ गीता नामसे जो है यह विख्यात । अविद्याको जीत हुवा दृढ गात । वह तेरी कीर्ति हुई है वर्णित । हृदयसे सहज ॥ ३५ ॥ जो था अकिंचनका निवास-स्थान । वहां लगाया आ लक्ष्मीने आसन । तब कह सकते हैं क्या निर्धन । उसको कभी ॥ ३६ ॥ अथवा देख अंधकारका स्थान । वहां आया दैवसे चंडांशु मान । वह अंधःकार ही प्रकाश महान । होता है जैसे ॥ ३७ ॥ देखनेसे जिस देवकी श्रेष्ठता । विश्वको न आती अणुकी योग्यता । भक्तके भाव-सम न हो सकता । क्या वह देव ॥ ३८ ॥ वैसे मेरा गीताका व्याख्यान । सूंघ लेता गगनका सुमन । पूर्ण करते जो अरमान । आप समर्थ ॥ ३९ ॥ तब तेरे ही प्रसादसे । गीता-पद अगाध ऐसे । स्पष्ट करूं निरूपणसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ४० ॥ ज्ञान प्राप्तिके बाद और कुछ पाना नहीं रहता — पंद्रहवे अध्यायमें । कहा कृष्णने अल्पमें । पार्थको पूर्ण रूपमें । शास्त्र सिद्धांत ॥ ४१ ॥ जो है वृक्ष रूपक परिभाषा । कहती उपाधि रूप अशेष । सद् वैद्य दिखाता है सभी दोष । शरीरगत जैसे ॥ ४२ ॥ तथा जो कूटस्थ अक्षर । दिखाया पुरुष प्रकार । जिससे उपहिताकार । चैतन्य सह ॥ ४३ ॥ फिर उत्तम पुरुष । करके शब्दका मिष । दिखाता है हृषीकेश । आत्मतत्त्व ॥ ४४ ॥ तथा कहा आत्म प्राप्त्यर्थ । साधन जो अति समर्थ । वह ज्ञान भी यथार्थ । कहा स्पष्ट ॥ ४५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६२८
तभी है इस अध्यायमें । न रहा कुछ कहनेमें । अब रहा गुरु-शिष्योंमें । स्नेहाचार ॥ ४६ ॥ ऐसे इस विषयकी बात । हो गयी है ज्ञानियोंको ज्ञात । किंतु हुए अन्य आकांक्षित । मुमुक्षुजन ॥ ४७ ॥ ऐसे जो मैं पुरुषोत्तम । ज्ञानसे मिलता सुवर्म । वह सर्वज्ञ मैं औ' सीमा । वही भक्तिकी ॥ ४८ ॥ इस भांति यह त्रिलोक नायक । बोला उस अध्यायका एक श्लोक । तब वहां तोषसे वर्णन एक । किया विज्ञानका ही ॥ ४९ ॥ संसारका एक कौर कर । जीवको एक दृष्टिसे देखकर । आनंद साम्राज्य सिंहासन पर । बिठाया है यह ॥ ५० ॥ उपाय नहीं इतना समर्थ । कहता है देव अन्य यथार्थ । यही एक सम्यक् ज्ञानका नाथ । सभी उपायोंमें है ॥ ५१ ॥ ज्ञान प्राप्तिका उपाय— होते जो आत्म-जिज्ञासु ऐसे । सादर तथा प्रसन्नतासे । उतारते हैं ज्ञान परसे । अपना जीव ॥ ५२ ॥ जिस पर जब प्रेम होता । वही वही सम्मुख है आता । अन्य सबको पीछे हटाता । ऐसे है प्रेमका ॥ ५३ ॥ इसी लिये मुमुक्षु जिज्ञासुओंमें । नहीं करते ज्ञानानुभव अपनेमें । करेंगे योग-क्षेम ज्ञानके विषयमें । स्वाभाविक रूपसे ॥ ५४ ॥ तब है जो यह सम्यकज्ञान । कैसे होगा अपने स्वाधीन । या मिला उसका वृद्धि-यत्न । होगा कैसे ॥ ५५ ॥ या न होने देता जो ज्ञान उत्पन्न । तथा उदित ज्ञानका अप्रयोजन । ऐसे ज्ञान विरुद्धका होना भान । यह आवश्यक ॥ ५६ ॥ फिर ज्ञानका जो प्रतिकूल । दूर करना वह सकल । तथा ज्ञानका जो अनुकूल । करें स्वीकार ॥ ५७ ॥ ६२९ देवासुर-संपद्विभाग-योग
जिज्ञासु-जन आप समस्त । सोचते ऐसे अपने चित्त । यह पूर्ण करने यथार्थ । बोलेंगे श्रीहरि ॥ ५८ ॥ जिससे होगा ज्ञान उत्पन्न । आप होंगे विश्रांतिसे पूर्ण । ऐसे दैवी-गुणोंका वर्णन । करेंगे श्रीहरि ॥ ५९ ॥ ज्ञानका कर अनादर । राग-द्वेषको दे आधार । वे आसुरी गुण भी घोर । कहेंगे स्पष्ट ॥ ६० ॥ इष्टानिष्ट दोनों स्वाभाविक । करता है जिनका कौतुक । उनका कथन किया देख । पहले नवममें ॥ ६१ ॥ वहां करना था इसका विस्तार । वहां अन्य विषय हुवा गोचर । तब यहां किया प्रसंगानुसार । उसका निरूपण ॥ ६२ ॥ इसका अब निरूपण । सोलहवेमें करेंगे पूर्ण । क्रमानुगत संख्या जान । पहलेसे जो ॥ ६३ ॥ रहने दो यहां है जो प्रस्तुत । जाननेमें ज्ञानका हिताहित । देवासुर संपदा है समर्थ । कहेंगे अब ॥ ६४ ॥ जो है मुमुक्षुओंका पथ दर्शक । तथा मोह-रात्रिका तम नाशक । कहती दैवी संपदा अलौकिक । सुनो वह प्रथम ॥ ६५ ॥ जहां परस्पर पोषक । ऐसे पदार्थ जो अनेक । एकत्र करते हैं लोक । कहते हैं संपदा ॥ ६६ ॥ सुख संभावना जो दैवी । तथा दैवी गुणोपजीवी । होती है इसीलिये दैवी । संपत्ति है वह ॥ ६७ ॥ भगवान उवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥ श्री भगवानने कहा निर्भयत्व मनःशुद्धि व्यवस्था ज्ञानयोगमें । यज्ञ निग्रह दातृत्व स्वाध्याय ऋजुता तप ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ६३०
१ दैवी-गुण, अभय— अब जो दैवी गुणके श्रेष्ठ । आसन पर बैठता ज्येष्ठ । गुण कहलाता है वरिष्ठ । अभय ऐसे ॥ ६८ ॥ कूदा ही नहीं महा-पूरमें । तब डूबना कहो किसमें । या रोग नहीं आता घरमें । पथ्यके कभी ॥ ६९ ॥ वैसे कर्माकर्मका अहंकार । उठने नहीं देता धनुर्धर । तथा संसार भय तजकर । रहना सदैव ॥ ७० ॥ अथवा ऐक्य भावसे भरकर । अपनेसे अन्य नहीं मानकर । भय-वार्ताको करता सीमा पार । पूर्ण रूपसे ॥ ७१ ॥ जब लवणको पानी डुबाता । तब लवण ही पानी बनता । वैसे आप ही अद्वय बनता । नाशता भय ॥ ७२ ॥ जिसको कहते हैं अभय । वह समझनेसे अद्वय । चलता रहता धनंजय । सदा सर्वत्र ॥ ७३ ॥ २ दैवी-गुण, सत्त्वसंशुद्धि— तथा सत्त्वशुद्धि जो कहलाता । एसे लक्षणोंसे है जाना जाता । जो न जलता या नहीं बुझता । राखके जैसे ॥ ७४ ॥ या शुक्लमें जो न बढ़ता । या कृष्णमें जो न घटता । वैसे सूक्ष्म होके रहता । चंद्रमा जैसे ॥ ७५ ॥ या वर्षाका उतरा महापूर । ग्रीष्मका शुरू न हुआ उतार । वैसे निज रूपमें हो सुंदर । गंगा प्रवाहसा ॥ ७६ ॥ वैसे संकल्प विकल्पका खींचाव । रज तमका तज बोझ दबाव । अनुभवता निज-धर्म स्वभाव । बुद्धिमात्र ॥ ७७ ॥ इन्द्रिय-समूहसे जो दर्शित । उचित अथवा हो अनुचित । देख चित्त नहीं होता स्पंदित । किंचितमात्र ॥ ७८ ॥ घरसे दूर गया वल्लभ । पतिव्रताका विरह क्षोभ । भुला देता अन्य हानि लाभ । मनमें न डसता वैसे ॥ ७९ ॥ ६३१ देवासुर-संपद्विभाग योग
वैसे ही सत्स्वरूपमें पार्थ । अनन्य हो रहना सतत । सत्त्व-शुद्धि कहता श्रीनाथ । असुरारी जो ॥ ८० ॥ ३ दैवी-गुण, योगज्ञान व्यवस्थित— तथा जो आत्म-लाभके विषयमें । ज्ञान या योग दोनोंमेंसे एकमें । रखना अचल निष्ठा हृदयमें । योग्यतानुसार ॥ ८१ ॥ अपनी सभी चित्त वृत्ति । तजना वहां इस भांति । निष्काम देता पूर्णाहुति । यज्ञमें जैसे ॥ ८२ ॥ या कुलीन कन्यादान । दिया सत्कुलमें ही मान । या लक्ष्मी स्थिर हुई जान । नारायणमें ॥ ८३ ॥ ऐसे अनन्य होकर । योग-ज्ञानमें स्थिर । होना जो गुण तीसरा । जाण तू पार्थ ॥ ८४ ॥ ४ दैवी-गुण, दान— तथा तन मन वचनसे । संपन्नतानुसार वित्तसे । आर्त शत्रुको भी ऋजुतासे । पांडुकुमार ॥ ८५ ॥ पत्र पुष्प तथा छाया । फल फूल धनंजया । पथिक जो पास आया । देता वृक्ष जैसे ॥ ८६ ॥ वैसे मनसे धन तक सब । जब जैसे आवश्यक हो तब । काममें लाना आता श्रांत जब । विश्रामार्थ ॥ ८७ ॥ इसको कहते हैं दान । जो मोक्ष निधान अंजन । रहने दे अब अर्जुन । सुन तू दम ॥ ८८ ॥ ५ दैवी-गुण, दम— अजी ! जो विषयेंद्रियोंका मिलन । उसको भंग कर देता भिन्न । जैसे खडु गंदला पानी अर्जुन । करता शुद्ध ॥ ८९ ॥ विषय स्पर्श न होने देता । इंद्रियोंको बचाके रखता । नियम बद्ध कर सौंपता । प्रत्याहारके ॥ ९० ॥ ज्ञानेश्वरी ६३२
चित्त तक सब तज अंदर । प्रवृत्ति चली जाती है बाहर । तब सजाता है इंद्रिय द्वार । वैराग्याभिसे ॥ ९१ ॥ श्वासोच्छ्वाससे भी जो कठिन । व्रत आचरता निशिदिन । उसमें न मिलता है क्षण । विश्रांति उसको ॥ ९२ ॥ दम कहते हैं जिसे । उसके लक्षण ऐसे । यागार्थको संक्षेपसे । कहता हूं सुन ॥ ९३ ॥
६ दैवी-गुण, यज्ञ— ब्राह्मणोंसे स्त्रियों तक । सबका विधिपूर्वक । अपना कर्तव्य नेक । करना सब ॥ ९४ ॥ जिसका है जो सर्वोत्तम । भजनीय देवता-धर्म । वह उसका यथागम- । पूर्वक करना ॥ ९५ ॥ द्विज जैसे षट्कर्म करता । उसे शूद्र नमन करता । उन दोनोंका समान होता । यह यज्ञकर्म ॥ ९६ ॥ अधिकारानुसार अपना । सबका ऐसे यज्ञ करना । उससे फलाशा न करना । विष रूप जो ॥ ९७ ॥ तथा मैं करता ऐसा भाव । न ले देह कार्यका पांडव । किंतु वेदकी आज्ञाका ठाव । होकर रहना ॥ ९८ ॥ अर्जुन ! यह है संज्ञा । सर्वत्र जान तू यज्ञ । कैवल्य-मार्गका विज्ञ । कहता यह ॥ ९९ ॥
७ दैवी-गुण, स्वाध्याय— गेंदसे जैसे भूमिको जो मारना । मारना नहीं गेंद हाथमें लाना । अथवा खेतमें बीजको फेंकना । उपजके लिये ॥ १०० ॥ या रखी वस्तू देखनेके लिये । आदरसे जाते हैं दिया लिये । शाखामें फल फलनेके लिये । सींचते हैं मूल ॥ १ ॥ जाने दे यह जैसे है शीसा । आप देखनेके लिये ऐसा । पोंछ पोंछ रखते हैं स्वच्छ-सा । प्रीतिसे नित ॥ २ ॥
६३३ देवासुर-संपद्विभाग-योग
वैसे प्रतिपाद्य जो ईश्वर । होनेके लिये वह गोचर । करना श्रुतिका निरंतर । अभ्यास पार्थ ॥ ३ ॥ द्विजोंको देखना ब्रह्मसूत्र । अन्योंको स्तोत्र या नाममंत्र । आवर्तन करना पवित्र । देखने तत्व ॥ ४ ॥ कहलाता है यह स्वाध्याय । सुन तू यह धनंजय । तप शब्दका अभिप्राय । कहता हूं अब ॥ ५ ॥
८ दैवी-गुण, तप— दानका अर्थ है सर्वस्व देना । व्ययको संपूर्ण व्यर्थ करना । फलकर जैसे स्वयं सूखना । वनस्पतिका धर्म ॥ ६ ॥ अन्यान्य धूपका जैसे अग्नि-प्रवेश । कनकमें जैसे मलका नाश । या बढ़ते पित्र-पक्षमें ह्रास । जैसे चंद्रमाका ॥ ७ ॥ वैसे स्वरूप प्राप्तिके कारण । गलाना तन मन प्राण । दक्ष रह करके प्रतिक्षण । कहलाता तप ॥ ८ ॥ अथवा तपका रूप भिन्न । अन्य कोई है तो तू जान । दूधमें डाली जैसे चोंच अर्जुन । हंसकी जो ॥ ९ ॥ वैसे देह जीवका मिलन । उसमें पानी करता भिन्न । वह विवेक अंतःकरण । जगाये रखना ॥ ११० ॥ देखते मानो आत्माकी ओर । बुद्धि संकोष होता सत्वर । निद्रा स्वप्न जैसे धनुर्धर । जागृतिमें डूबते ॥ ११ ॥ वैसे आत्म-आलोचन । होता सही प्रवर्तन । तपका सही अर्जुन । होता अर्थ ॥ १२ ॥
९ दैवी-गुण, आर्जव = ऋजुता— बालकके लिये जैसे रम्य । होता भूतमात्रमें चैतन्य । वैसे जीवमात्रमें सौजन्य । कहलाता आर्जव ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६३४
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं हीरचापलम् ॥ २ ॥ १० दैवी-गुण, अहिंसा— विश्व-हित उद्देश्यसे । तन बचन मनसे । रहना जो दक्षतासे । अहिंसा जान ॥ १४ ॥ ११ दैवी-गुण, सत्य— तीक्ष्ण होकर भी मृदुल । जैसे स्वभावसे मुकुल । तेज होकर भी शीतल । शशांकका ॥ १५ ॥ दिखाते ही करे रोग निवारण । किंतु न लगे जिव्हामें जान । ऐसी औषधी न होनेके कारण । उपमा दूं कैसे ॥ १६ ॥ मृदुतामें जैसे आंखोंकी पूतली । किंतु है रगड़ने पर भी भली । वैसे फोडती पत्थरकी भी शिली । उदक जैसे ॥ १७ ॥ वैसे संदेह करनेमें दूर । मानो अति तीक्ष्ण तलवार । किंतु है सुननेमें मधुर । मधुसे भी ॥ १८ ॥ सुननेमें कौतुक । कानोंको होता सुख । सत्यतामें है देख । भेदता ब्रह्मको ॥ १९ ॥ अथवा जो कभी प्रियत्वमें । न आता किसीके झांसेमें । पूर्ण होकर भी सत्यमें । किसीको चुभता नहीं ॥ १२० ॥ वैसे तो व्याध-ध्वनि कर्ण-मधुर । अंत लाती है अतीव भयंकर । अग्नि जलाता है वैसे खुलकर । जले वह सत्य ॥ २१ ॥ रहता है अति कर्ण-मधुर । किंतु छीलता हृदय गह्वर । ऐसी भाषा भाषा नहीं सुंदर । होती है बला ॥ २३ ॥ अहितमें जैसे हो क्रोधानल । लालनमें सुमनसे कोमल । माताका रूप है यह सरल । बाचाका भी ॥ २४ ॥ अहिंसा सत्य अक्रोध त्याग शांति अपैशुन । निर्लोभ स्थैर्य माधुर्य मर्यादा जीवमें दया ॥ २ ॥ ६३५ दैवासुर-संपद्विभाग-योग
वैसे ही हो सुननेमें सुखमय । परिणाममें सत्य मंगलमय । बोलनेमें अविकार औ' सदय । सत्य है वह ॥ २५ ॥ १२ दैवी-गुण, अक्रोध— जैसे कितना ही पानी डालकर । शिलामें नहीं फूटता है अंकुर । अथवा छासको बहु मथकर । आता क्या नवनीत ॥ २६ ॥ केंचुलीके सिर पर पैर । मारा तो क्या उठाता है सिर । तथा वसंतमें भी अंबर । नहीं देता फूल ॥ २७ ॥ जैसे रंभाके भी अनेक रूप । न जगा सका शुकमें कंदर्प । या राखमें न होती है उदीप । घृतसे भी आग ॥ २८ ॥ शिशु भी क्रोधित हो वैसे । कुवाचाके बीजाक्षरोंसे । अथवा अन्य उपायोंसे । किसी समय ॥ २९ ॥ ब्रह्मको भी नमन कर पार्थ । गतायु कभी न होता जागृत । वैसे उसमें कभी न जागृत । होता क्रोध तरंग ॥ १३० ॥ १३ दैवी-गुण, त्याग— मृत्तिका त्यागसे घट । तंतुके त्यागसे पट । बीजके त्यागसे वट । त्याग जैसे ॥ ३१ ॥ या तजकर भित्तिमात्र । तजता है संपूर्ण चित्र । या निद्रा-त्यागसे विचित्र । स्वप्न जाल ॥ ३२ ॥ तथा जल त्यागसे तरंग । वर्षा त्यागसे अनेक मेघ । वैसे झडते हैं समस्त भोग । धन-त्यागसे ॥ ३३ ॥ वैसे ही जो बुद्धिमंत । तजते हैं देहाहंता । जिससे संसार जात । छूटते हैं ॥ ३४ ॥ इसका नाम है त्याग । कहता यह यज्ञांग । यह मानके सुभग । पूछता पार्थ ॥ ३५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६३६
१४ दैवी-गुण, शांति— अब शांतिका लक्षण । कह तू मुझे श्रीकृष्ण । कृष्ण कहता अर्जुन । सुन तू अब ॥ ३६ ॥ निगलकर जब ज्ञेय । ज्ञाता ज्ञान भी धनंजय । मिट जाता जिस समय । मिलती जो शांति ॥ ३७ ॥ जैसे प्रलयांबुका उभार । डुबाकर विश्वका प्रसार । अपनेमें ही रहता नीर । भरके आप ॥ ३८ ॥ उगम ओघ तथा सागर । न रहता यह व्यवहार । सर्वत्र अनुभवता नीर । वह भी कौन ॥ ३९ ॥ वैसे ज्ञेयका होते ही आलिंगन । ज्ञातृत्व भी होता उसमें लीन । फिर रहता जो कुछ अर्जुन । वह है शांति ॥ १४० ॥ १५ दैवी-गुण, अनिंदा— जैसे रोगको दूर कर । पुष्ट करनेमें शरीर । न देखता है आप पर । कमी सद्वैद्य ॥ ४१ ॥ या कीचमें फंसी गाय देखकर । नहीं देखा जाता सूखी या दुधार । उसकी जीवन व्यथा देख कर । चित्त होता व्याकुल ॥ ४२ ॥ डूबतेको देखकर सकरुण । न पूछता तू अंत्यज या ब्राह्मण । जानता उसके बचाना है प्राण । इतना मात्र ॥ ४३ ॥ महावनमें पापीसे नग्न । की हुई स्त्रीको कोई सज्जन । उसको वस्त्र पहने बिन । न देखता जैसे ॥ ४४ ॥ वैसे अज्ञान या प्रमादमें । अथवा दुर्दैव या दोषमें । सभी प्रकारके निंद्यत्वमें । जकड़े गये जो ॥ ४५ ॥ उन्हे अपने अंगके । भले गुण दे करके । भुलाते हैं चुभनेके । सभी शल्य ॥ ४६ ॥ अजी ! दूसरोंके सभी दोष । अपनी दृष्टिसे कर चोख । उनकी ओर वे फिर नेक । दृष्टिसे देखते ॥ ४७ ॥ ६३७ देवासुर-संपद्विभाग-योग
पूज कर जैसे देव देखना । बुवाई करके खेतमें जाना । संतुष्ट करके प्रसाद लेना । अतिथिका जैसे ॥ ४८ ॥ ऐसे लगाकर अपने गुण । दूर कर औरके अवगुण । देखा करता है जो अर्जुन । सबकी ओर ॥ ४९ ॥ न करना मर्माघात । न उलझाना पापमें पार्थ । सदोष नामसे उल्लिखित । न करना कभी ॥ १५० ॥ तथा करके कोई उपाय । पतित खडा हो धनंजय । ऐसे ही करना सभी कार्य । न हो मर्माघात ॥ ५१ ॥ अधमको भी मान । उत्तम ही अर्जुन । कभी इसके बिन । न देखें दोष ॥ ५२ ॥ अनिंदाका यह लक्षण । जान तू होता है अर्जुन । मोक्ष-मार्गका सुखासन । मुमुक्षुओंका ॥ ५३ ॥ १६ दैवी-गुण, दया— अब दया है ऐसी । पूर्ण चंद्रिका जैसी । शीतलता एकसी । देती सबको ॥ ५४ ॥ वैसे दुखितोंका कष्ट । दूर करना है इष्ट । उसमें श्रेष्ठ कनिष्ठ । देखता नहीं ॥ ५५ ॥ जगतमें जीवन जैसे । नाश होता है अंगसे । किंतु बचाना अपनेसे । तृणजात ॥ ५६ ॥ वैसे अन्योंका देख ताप । चटपटाता हो सकृप । सर्वस्व देकर भी आप । कुछ भी मानता नहीं ॥ ५७ ॥ जैसे गढ़ा देखकर अपूर्ण । पानी आगे नहीं बहता जान । वैसे श्रांतको तोष दिये बिन । आगे नहीं जाता ॥ ५८ ॥ पैरोंमें जब कांटा चुभता । उससे हृदय तडपता । वैसे कष्टोंसे चटपटाता । अन्योंके यह ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ३३८
या पैरोंकी होती शीतलता । आंखोंको मिलती है शांतता । वैसे पर सुखसे हर्षता । सदैव आप ॥ १६० ॥ या प्यासोंके लिये जैसे । पानीका जन्म है वैसे । दुखितोंके लिये वैसे । जीवन उसका ॥ ६१ ॥ ऐसे पुरुष धनंजया । मूर्तिमंत जान तू दया । उसके जन्मसे ही भया । ऋणी मैं उसका ॥ ६२ ॥ १७ दैवी-गुण, अलोभ— जीव-भावसे अनुसरता । सूर्य पुष्प सूर्यको सतत । किंतु सूर्य कभी नहीं लेता । सौरभ उसका ॥ ६३ ॥ अथवा वसंतमें आते अनंत । वनमें बहार वैभवके नित । किंतु उनको तजकर वसंत । चलता जैसे ॥ ६४ ॥ जाने दो महासिद्धियोंके साथ । लक्ष्मी आयी पास कहके नाथ । किंतु महा-विष्णु न देखता पार्थ । उसकी ओर ॥ ६५ ॥ वैसे लौकिक या पारलौकिक । आते भोग बनकर सेवक । किंतु तरंग न उठते देख । भोगके मनमें ॥ ६६ ॥ इससे कहना क्या अधिक । मनमें न उठे सकौतुक । अभिलाषा विषयकी देख । वह अलोलुप्य ॥ ६७ ॥ १८ दैवी-गुण, मार्दव— मद्माखियोंको छत्ता सुखकर । जलमें ही जैसे सुखी जलचर । या पक्षियोंको गगन धनुर्धर । होता है मुक्त ॥ ६८ ॥ या बालकके हितमें जैसे । माताका स्नेह होता है वैसे । बसंतमें छूता है हौलेसे । मलयानल ॥ ६९ ॥ या आखोंको प्रियका दर्शन । पिल्लोंको कूर्मीका दृष्टि जान । वैसे है उसका आचरण । जीव-मात्रसे ॥ १७० ॥ ६३९ देवासुर-संपद्विभाग-योग
स्पर्शमें जो है अति मृदु । मुखमें लिया तो सुस्वादु । घ्राणमें वैसे ही सुगंधु । अंगोंसे उज्ज्वल ॥ ७१ ॥ यदि चाहे जितना भी लेता । कोई नुकसान नहीं होता । उसको तब है कहा जाता । कर्पूरसा वह ॥ ७२ ॥ महाभूत अपनेमें समालेता । तथा परमाणुमें भी जो समाता । जैसे विश्व है वैसे ही बन जाता । आकाश जैसा ॥ ७३ ॥ क्या कहूं मैं ऐसोंका जीवन । विश्वके लिये जीव धारण । उसको कहता हूं अर्जुन । मार्दव मैं ॥ ७४ ॥ १९ दैवी-गुण, मर्यादा : लज्जा— तथा पराजयसे राजा । हीन दशामें जो सलज्ज । स्वाभिमानी होता निस्तेज । निकृष्टतामें ॥ ७५ ॥ या आया चंडालका सदन । अकस्मातही संन्यासी जान । होता है जैसे सलज्जमन । उत्तम जो ॥ ७६ ॥ क्षत्रियको रणसे भागना । कैसे सहना निर्लज्ज जीना । विधवा नामसे पुकारना । महासतीको जैसे ॥ ७७ ॥ सुरूपको महारोग भया । या शिष्टको कलंकित किया । प्राण संकटमें लजा गया । उसी भांति ॥ ७८ ॥ साडे तीन हाथका देह बना । तथा शवसा बनकर जीना । जनम ले लेकर मरना । पुनः पुनः जो ॥ ७९ ॥ गर्भके मेद सांचेमें । रक्त मूत्रके रसमें । पुतला बन जीनेमें । आती लज्जा ॥ १८० ॥ लेकर यह देहपन । नाम रूपका धारण । रहनेसे न कुछ भिन्न । लज्जा जनक ॥ ८१ ॥ ऐसेमें देहसे उकताकर । रहते हैं सूज्ञ पांडुकुमार । तथा मानते निर्लज्ज अपार । उसीमें सुख ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४०