भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 709

१४ दैवी-गुण, शांति— अब शांतिका लक्षण । कह तू मुझे श्रीकृष्ण । कृष्ण कहता अर्जुन । सुन तू अब ॥ ३६ ॥ निगलकर जब ज्ञेय । ज्ञाता ज्ञान भी धनंजय । मिट जाता जिस समय । मिलती जो शांति ॥ ३७ ॥ जैसे प्रलयांबुका उभार । डुबाकर विश्वका प्रसार । अपनेमें ही रहता नीर । भरके आप ॥ ३८ ॥ उगम ओघ तथा सागर । न रहता यह व्यवहार । सर्वत्र अनुभवता नीर । वह भी कौन ॥ ३९ ॥ वैसे ज्ञेयका होते ही आलिंगन । ज्ञातृत्व भी होता उसमें लीन । फिर रहता जो कुछ अर्जुन । वह है शांति ॥ १४० ॥ १५ दैवी-गुण, अनिंदा— जैसे रोगको दूर कर । पुष्ट करनेमें शरीर । न देखता है आप पर । कमी सद्‌वैद्य ॥ ४१ ॥ या कीचमें फंसी गाय देखकर । नहीं देखा जाता सूखी या दुधार । उसकी जीवन व्यथा देख कर । चित्त होता व्याकुल ॥ ४२ ॥ डूबतेको देखकर सकरुण । न पूछता तू अंत्यज या ब्राह्मण । जानता उसके बचाना है प्राण । इतना मात्र ॥ ४३ ॥ महावनमें पापीसे नग्न । की हुई स्त्रीको कोई सज्जन । उसको वस्त्र पहने बिन । न देखता जैसे ॥ ४४ ॥ वैसे अज्ञान या प्रमादमें । अथवा दुर्दैव या दोषमें । सभी प्रकारके निंद्यत्वमें । जकड़े गये जो ॥ ४५ ॥ उन्हे अपने अंगके । भले गुण दे करके । भुलाते हैं चुभनेके । सभी शल्य ॥ ४६ ॥ अजी ! दूसरोंके सभी दोष । अपनी दृष्टिसे कर चोख । उनकी ओर वे फिर नेक । दृष्टिसे देखते ॥ ४७ ॥ ६३७ देवासुर-संपद्विभाग-योग