ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे ही हो सुननेमें सुखमय । परिणाममें सत्य मंगलमय । बोलनेमें अविकार औ' सदय । सत्य है वह ॥ २५ ॥ १२ दैवी-गुण, अक्रोध— जैसे कितना ही पानी डालकर । शिलामें नहीं फूटता है अंकुर । अथवा छासको बहु मथकर । आता क्या नवनीत ॥ २६ ॥ केंचुलीके सिर पर पैर । मारा तो क्या उठाता है सिर । तथा वसंतमें भी अंबर । नहीं देता फूल ॥ २७ ॥ जैसे रंभाके भी अनेक रूप । न जगा सका शुकमें कंदर्प । या राखमें न होती है उदीप । घृतसे भी आग ॥ २८ ॥ शिशु भी क्रोधित हो वैसे । कुवाचाके बीजाक्षरोंसे । अथवा अन्य उपायोंसे । किसी समय ॥ २९ ॥ ब्रह्मको भी नमन कर पार्थ । गतायु कभी न होता जागृत । वैसे उसमें कभी न जागृत । होता क्रोध तरंग ॥ १३० ॥ १३ दैवी-गुण, त्याग— मृत्तिका त्यागसे घट । तंतुके त्यागसे पट । बीजके त्यागसे वट । त्याग जैसे ॥ ३१ ॥ या तजकर भित्तिमात्र । तजता है संपूर्ण चित्र । या निद्रा-त्यागसे विचित्र । स्वप्न जाल ॥ ३२ ॥ तथा जल त्यागसे तरंग । वर्षा त्यागसे अनेक मेघ । वैसे झडते हैं समस्त भोग । धन-त्यागसे ॥ ३३ ॥ वैसे ही जो बुद्धिमंत । तजते हैं देहाहंता । जिससे संसार जात । छूटते हैं ॥ ३४ ॥ इसका नाम है त्याग । कहता यह यज्ञांग । यह मानके सुभग । पूछता पार्थ ॥ ३५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६३६