भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं हीरचापलम् ॥ २ ॥ १० दैवी-गुण, अहिंसा— विश्व-हित उद्देश्यसे । तन बचन मनसे । रहना जो दक्षतासे । अहिंसा जान ॥ १४ ॥ ११ दैवी-गुण, सत्य— तीक्ष्ण होकर भी मृदुल । जैसे स्वभावसे मुकुल । तेज होकर भी शीतल । शशांकका ॥ १५ ॥ दिखाते ही करे रोग निवारण । किंतु न लगे जिव्हामें जान । ऐसी औषधी न होनेके कारण । उपमा दूं कैसे ॥ १६ ॥ मृदुतामें जैसे आंखोंकी पूतली । किंतु है रगड़ने पर भी भली । वैसे फोडती पत्थरकी भी शिली । उदक जैसे ॥ १७ ॥ वैसे संदेह करनेमें दूर । मानो अति तीक्ष्ण तलवार । किंतु है सुननेमें मधुर । मधुसे भी ॥ १८ ॥ सुननेमें कौतुक । कानोंको होता सुख । सत्यतामें है देख । भेदता ब्रह्मको ॥ १९ ॥ अथवा जो कभी प्रियत्वमें । न आता किसीके झांसेमें । पूर्ण होकर भी सत्यमें । किसीको चुभता नहीं ॥ १२० ॥ वैसे तो व्याध-ध्वनि कर्ण-मधुर । अंत लाती है अतीव भयंकर । अग्नि जलाता है वैसे खुलकर । जले वह सत्य ॥ २१ ॥ रहता है अति कर्ण-मधुर । किंतु छीलता हृदय गह्वर । ऐसी भाषा भाषा नहीं सुंदर । होती है बला ॥ २३ ॥ अहितमें जैसे हो क्रोधानल । लालनमें सुमनसे कोमल । माताका रूप है यह सरल । बाचाका भी ॥ २४ ॥ अहिंसा सत्य अक्रोध त्याग शांति अपैशुन । निर्लोभ स्थैर्य माधुर्य मर्यादा जीवमें दया ॥ २ ॥ ६३५ दैवासुर-संपद्विभाग-योग

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