भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 704

वैसे ही सत्स्वरूपमें पार्थ । अनन्य हो रहना सतत । सत्त्व-शुद्धि कहता श्रीनाथ । असुरारी जो ॥ ८० ॥ ३ दैवी-गुण, योगज्ञान व्यवस्थित— तथा जो आत्म-लाभके विषयमें । ज्ञान या योग दोनोंमेंसे एकमें । रखना अचल निष्ठा हृदयमें । योग्यतानुसार ॥ ८१ ॥ अपनी सभी चित्त वृत्ति । तजना वहां इस भांति । निष्काम देता पूर्णाहुति । यज्ञमें जैसे ॥ ८२ ॥ या कुलीन कन्यादान । दिया सत्कुलमें ही मान । या लक्ष्मी स्थिर हुई जान । नारायणमें ॥ ८३ ॥ ऐसे अनन्य होकर । योग-ज्ञानमें स्थिर । होना जो गुण तीसरा । जाण तू पार्थ ॥ ८४ ॥ ४ दैवी-गुण, दान— तथा तन मन वचनसे । संपन्नतानुसार वित्तसे । आर्त शत्रुको भी ऋजुतासे । पांडुकुमार ॥ ८५ ॥ पत्र पुष्प तथा छाया । फल फूल धनंजया । पथिक जो पास आया । देता वृक्ष जैसे ॥ ८६ ॥ वैसे मनसे धन तक सब । जब जैसे आवश्यक हो तब । काममें लाना आता श्रांत जब । विश्रामार्थ ॥ ८७ ॥ इसको कहते हैं दान । जो मोक्ष निधान अंजन । रहने दे अब अर्जुन । सुन तू दम ॥ ८८ ॥ ५ दैवी-गुण, दम— अजी ! जो विषयेंद्रियोंका मिलन । उसको भंग कर देता भिन्न । जैसे खडु गंदला पानी अर्जुन । करता शुद्ध ॥ ८९ ॥ विषय स्पर्श न होने देता । इंद्रियोंको बचाके रखता । नियम बद्ध कर सौंपता । प्रत्याहारके ॥ ९० ॥ ज्ञानेश्वरी ६३२