ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचित्त तक सब तज अंदर । प्रवृत्ति चली जाती है बाहर । तब सजाता है इंद्रिय द्वार । वैराग्याभिसे ॥ ९१ ॥ श्वासोच्छ्वाससे भी जो कठिन । व्रत आचरता निशिदिन । उसमें न मिलता है क्षण । विश्रांति उसको ॥ ९२ ॥ दम कहते हैं जिसे । उसके लक्षण ऐसे । यागार्थको संक्षेपसे । कहता हूं सुन ॥ ९३ ॥
६ दैवी-गुण, यज्ञ— ब्राह्मणोंसे स्त्रियों तक । सबका विधिपूर्वक । अपना कर्तव्य नेक । करना सब ॥ ९४ ॥ जिसका है जो सर्वोत्तम । भजनीय देवता-धर्म । वह उसका यथागम- । पूर्वक करना ॥ ९५ ॥ द्विज जैसे षट्कर्म करता । उसे शूद्र नमन करता । उन दोनोंका समान होता । यह यज्ञकर्म ॥ ९६ ॥ अधिकारानुसार अपना । सबका ऐसे यज्ञ करना । उससे फलाशा न करना । विष रूप जो ॥ ९७ ॥ तथा मैं करता ऐसा भाव । न ले देह कार्यका पांडव । किंतु वेदकी आज्ञाका ठाव । होकर रहना ॥ ९८ ॥ अर्जुन ! यह है संज्ञा । सर्वत्र जान तू यज्ञ । कैवल्य-मार्गका विज्ञ । कहता यह ॥ ९९ ॥
७ दैवी-गुण, स्वाध्याय— गेंदसे जैसे भूमिको जो मारना । मारना नहीं गेंद हाथमें लाना । अथवा खेतमें बीजको फेंकना । उपजके लिये ॥ १०० ॥ या रखी वस्तू देखनेके लिये । आदरसे जाते हैं दिया लिये । शाखामें फल फलनेके लिये । सींचते हैं मूल ॥ १ ॥ जाने दे यह जैसे है शीसा । आप देखनेके लिये ऐसा । पोंछ पोंछ रखते हैं स्वच्छ-सा । प्रीतिसे नित ॥ २ ॥
६३३ देवासुर-संपद्विभाग-योग