ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह शब्द-ब्रह्मका नवनीत है— जबसे किया कहना प्रारंभ । अब तक सब शाखावलंब । कहा है उपनिषद सौरभ । कमलका मान ॥ ७१ ॥ यह शब्द-ब्रह्मका मथित । तथा व्यास प्रज्ञाके है हाथ । मंथन कर जो नवनीत । सार लिया हमने ॥ ७२ ॥ ज्ञानामृतकी है जो जान्हवी । आनंद-चंद्रकी सत्रहवी । विचार क्षीरार्णवकी नवी । लक्ष्मी है यह ॥ ७३ ॥ तभी अपनी पद-वर्णसे । अर्थके यह जीव प्राणसे । मुझे छोड़ न जानती जैसे । महालक्ष्मी जो ॥ ७४ ॥ सम्मुख आया जब क्षराक्षरत्व । न कहा तब उनका पुरुषत्व । तथा समर्पण किया है सर्वस्व । मुझ पुरुषोत्तममें ॥ ७५ ॥ इसीलिये विश्वमें गीता । मुझ आत्मकी पतिव्रता । यह जो अब तू सुनता । इस समय ॥ ७६ ॥ सच बोलना तो यह नहीं शास्त्र । संसार जीतनेका है महाशस्त्र । तथा है आत्म अवतारका मंत्र । इन अक्षरोंमें ॥ ७७ ॥ तुझसे यह है कहा गया । यह ऐसा हुवा धनंजय । यह गोप्य धन निकलवाया । मुझसे आज ॥ ७८ ॥ मुझ चैतन्य शंभुका माथा । जो गीता तत्व था वह पार्थ । उसका गौतम बन आस्था- । निधि तू आया ॥ ७९ ॥ अपनी निर्मलतासे अर्जुन । करते सम्मुख अवलोकन । बन कर तू आया दर्पण । हमारे लिये ॥ ५८० ॥ अथवा भरा हुवा चंद्र तारागण । नभ सिंधुमें होता अवतरण । वैसे ही मैं गीता सह अंतःकरण- । में डूबा तेरे ॥ ८१ ॥ यह गीता आत्म-ज्ञानकी लता है— त्रिविध मल निश्चित । छोड़ गया तुझे पार्थ । तभी तू गीता सहित । बना मम स्थान ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६२२