भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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किंतु क्या बोलूं यह गीता । मेरी ज्ञानकी है जो लता । जानता जो इसे समस्त । होता मुक्त मोहसे ॥ ८३ ॥ सेवन की अमृत सरिता । रोग गंवाकर पांडुसुत । अमरपन यह उचित । देती जैसे ॥ ८४ ॥ वैसे ही जाननेसे यह गीता । निर्मोह होना विस्मय क्या पार्थ । अपने आत्म-ज्ञानमें होना रत । होता सरल ॥ ८५ ॥ जिस आत्म-ज्ञानके स्थान । कर्म जो अपना जीवन । लय कर होगा अर्जुन । ऋण-मुक्त ॥ ८६ ॥ खोया हुआ दिखा कर जैसा । मार्ग जाता है वीर-विलास । ज्ञान बनता कलश वैसा । कर्म-प्रासादका ॥ ८७ ॥ इसीलिये ज्ञानी पुरुष । कर्म करता है निःशेष । बोलता अनाथोंका सखा । इस प्रकार ॥ ८८ ॥ इस गीता-ज्ञानकी परंपरा— यह श्रीकृष्ण वचन-अमृत । न समानेसे छलकाता पार्थ । तब हुई हे व्यास कृपा प्राप्त । संजयको यहां ॥ ८९ ॥ उसने धृतराष्ट्रको दिया । धृतराष्ट्रसे पान कराया । इसीलिये जीवांत भया । उसका सरल ॥ ५९० ॥ आया गीता श्रवण अवसर । लगा उसको नहीं अधिकार । किंतु जीवनांत समय पर । उससे मिला प्रकाश ॥ ९१ ॥ द्राक्षा-लतामें दूध डाला जाता । व्यर्थ गया यह ऐसा दीखता । फल पाकमें वह दूना होता । जिस प्रकार ॥ ९२ ॥ वैसे हरिमुखके अक्षर । संजयने कहे स-आदर । उससे अंध स-अवसर । हुवा दुखी ॥ ९३ ॥ उसकी कर देश-भाषा रचना । उसको ऐसी वैसी कर सजना । सुना दिया उसे मैंने जैसे वह जाना । श्रीचरणोंमें ॥ ९४ ॥ ६२३ पुरुषोत्तमयोग