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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

२० दैवी-गुण, स्थैर्य— सूत्र तंतु जब टूट जाता । गुड़ियाका थै थै रुक जाता । वैसे प्राण-जयसे टूटता । कर्मेंद्रियोंका खेल ॥ ८३ ॥ या अस्त होते ही दिनकर । रुकता किरणोंका प्रसार । वैसे मनो-जयसे व्यापार । ज्ञानेंद्रियोंका ॥ ८४ ॥ ऐसे मन-प्राणका संयम । करता है इंद्रियां अक्षम । यह है अचांचल्यका मर्म । जानना यहां ॥ ८५ ॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता । भवंति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥ २१ दैवी-गुण, तेज— संकट है मरनेका-सा । वह है अग्नि-प्रवेश-सा । प्राणेश्वरके लिये ऐसा । नहीं गणती सती ॥ ८६ ॥ वैसे आत्म-नाथके ध्यानमें भर । विषय विषकी बाधा दूर कर । जाता शूल्यकी कांटेली राह पर । दौड़ना है उसको ॥ ८७ ॥ निषेधकी बाधा तब नहीं आती । विधिकी भीड़ भी उसे न रोकती । हृदयमें चाह कभी नहीं होती । महासिद्धियोंकी ॥ ८८ ॥ ईश्वराभिमुख हो ऐसे निज । दौड़ता अपने आप सहज । उसको कहते हैं सुज्ञ तेज । अध्यात्मिक जो ॥ ८९ ॥ २२ दैवी-गुण, क्षमा— तथा रहता है सभी गरिमा । गर्व नहीं आता है वही क्षमा । जैसे ढोता है शरीर जो रोम । जानता न ढोता ॥ १९० ॥ पवित्रता क्षमा तेज धैर्य अद्रोह नम्रता । जिसके गुण ये आया दैवी संपत्ति लेकर ॥ ३ ॥ (80) ६४१ देवासुर-संपद्विभाग-योग

२३ दैवी-गुण, धैर्य— तथा उभर आया इंद्रिय-वेग । या भड़क उठे हैं पुराने रोग । अथवा हुये नाता योग-वियोग । प्रियाप्रियोंके ॥ ९१ ॥ इन सबका आया बवंडर । या साथ मिलकर आया पूर । तब अगस्ति बनकर धीर । खडा होता है ॥ ९२ ॥ नभमें धूम्रका वलय । जोरसे उठा धनंजय । क्षणमें करता विलय । वायु जैसे ॥ ९३ ॥ वैसे अधिभूताधिदैव । अध्यात्मिकादि उपद्रव । होते हैं उनको पांडव । निगलता जो ॥ ९४ ॥ जब ईश्वरकी प्राप्तिमें । प्रवर्तता ज्ञान-योगमें । धीरजका न्यून उसमें । नहीं होता ॥ ९५ ॥ आता ऐसा चित्त-क्षोभका समय । सहके पराक्रम करता धैर्य । धृति कहते हैं जिसे धनंजय । वह हैं यही ॥ ९६ ॥ २४ दैवी-गुण, शौच=पवित्रता— जैसे शुद्ध कनक-कलश । उसमें भरा गंगा पीयूष । जैसे हे अंतर्बाह्य कलश । वैसे पावित्र्य ॥ ९७ ॥ शरीरसे निष्काम आचार । हृदयमें विवेक साकार । अंतर्बाह्य बना है आकार । शुचित्वका जो ॥ ९८ ॥ २५ दैवी-गुण, अद्रोह— हरते हरते पाप ताप । पोसते किनारेके पादप । समुद्र तक जाता है आप । गंगाका जैसे ॥ ९९ ॥ या विश्वका तम हरते । क्रियाका सदन खोलते । चला परिक्रमा करते । भास्कर जैसे ॥ २०० ॥ वैसे बद्धको मुक्त करते । डूबेहुओंको जो उभारते । कठिनाईको दूर करते । अंतरतमकी ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४२

वैसे वह दिवस-राति । करते सबकी उन्नति । चलता आत्म-हित-रति । धनुर्धर ॥ २ ॥ केवल अपने हितार्थ । प्राणियोंका अहित पार्थ । मनमें भी लाना किंचित । नहीं कभी ॥ ३ ॥ अद्रोहत्वकी ऐसी गोष्ठी । कही मैंने तुझे किरीटी । मानो वह प्रत्यक्ष दृष्टी । देखती है ॥ ४ ॥

२६ दैवी-गुण, अमानित्व— गंगा जैसे चढके शंभुके माथ । आप हुई अपनेमें संकुचित । वैसे सन्मानसे भी करें प्रतीत । लज्जा आप ॥ ५ ॥ वह अमानित्व कहलाता । तुझसे पहले जो कहा था । वही वही कहना क्या पार्थ । बार बार ॥ ६ ॥

दैवी-गुणोंकी महानता— ऐसे ये गुण हैं जो छब्बीस । ब्रह्मेश्चर्य करता निवास । मोक्ष-चक्रवर्तिका है खास । अग्रहार ॥ ७ ॥ ऐसी नाना संपदा दैवी । गुण-तीर्थकी नित्य-नवी । निरिच्छ सगरोंकी दैवी- । गंगा बह आयी ॥ ८ ॥ या गुण-पुष्पकी वरमाला । लेकर आयी है मुक्ता बाला । निरिच्छ विरक्तका है गला । खोजती है ॥ ९ ॥ अथवा छब्बीस गुणोंकी ज्योती । उजलाकर ले यह आरती । उतारने आयी गीता खोजती । पति आत्माको ॥ २१० ॥ उगलते हैं जो निर्मल । इन गुणोंके मुक्ता-फल । दैवी श्रियाके शुक्तावळ । गीतार्णवमें जो ॥ ११ ॥ कितना करूं इसका वर्णन । कहे हैं स्पष्ट होंगे ऐसे गुण । इन गुण-राशिका है दर्शन । दैवी श्रियाका रूप ॥ १२ ॥

६४३ देवासुर-संपद्विभाग-योग

आसुरी-गुणोंकी ओर संकेत— दुःख क्लेशकी जो पुष्ट लता । दोष-कांटोंसे भरी है पार्थ । वह अपनी व्याख्यामें लाता । आसुरी जो ॥ १३ ॥ त्याज्यको तजनेके हित । जान लेता है उपयुक्त । इसीलिये दे तू स्व-चित्त । सुननेमें यह ॥ १४ ॥ यह है नरक-व्यथा घोर । लाये दोष अति भयंकर । एकत्र किये हैं ये असुर- । संपदा रूप ॥ १५ ॥ नाना विष वर्गका कर गठन । बनाया जाता कालकूट महान । वैसे सभी दोषोंका कर मिलन । बनी आसुरी संपदा ॥ १६ ॥ दंभो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । अज्ञानंचाभिमानस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥ ४ ॥ १ आसुरी-गुण, दंभ— आसुरी दोषमें ख्यात । गर्जेके जिसका पार्थ । नाम चलता सतत । दंभ ऐसा ॥ १७ ॥ अपनी जननी है पावन । रहती जो तीर्थके समान । किंतु जनमें करना नग्न । पतन कारण होता ॥ १८ ॥ या विद्या गुरुपदेशमें प्राप्त । चौराहे पर किया प्रदर्शित । इच्छा भी होती अनिष्ट हेत । वैसे ही जो ॥ १९ ॥ डूबनेको महा-पूरमें । पहुंचाती पैल तीरमें । वह नाव बांधे शिरमें । डुबो देती है ॥ २२० ॥ जीवनका जो साधन । अधिक खाया तो अन्न । वही जीवनीय अन्न । होता है विष ॥ २१ ॥ वैसे ही दृश्य-अदृश्यका मित्र । तारक होता है धर्म सर्वत्र । प्रसिद्ध करनेसे जो सर्वत्र । शत्रु बन जाता ॥ २२ ॥ अहंता दंभ अज्ञान क्रोध दर्प कठोरता । आया जो गुण ये लेके आसुरी संपदा वह ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४४

तमी वाचाके चौराहे पर । फैलाया तो धर्मका विस्तार । कहलाता दंभ धनुर्धर । अधर्म-रूप ॥ २३ ॥ २ आसुरी-गुण, दर्प— किंतु मूर्खकी जिव्हा पर । फैलाया तो धर्मका विस्तार । कहलाता दंभ धनुर्धर । वह ब्रह्म सभाको ॥ २४ ॥ या घोड़ा जो भादुरी लोगोंका । ओछा मानता गज इंद्रका । गिरगिट जो कांटों परका । स्वर्ग भी बौना ॥ २५ ॥ या तृणका जो ईंधन । भड़कता है गगन । डबरे बसा मीन । माने सिंधु तुच्छ ॥ २६ ॥ फूलता है वह क्षीधन । विद्या स्तुति पाकर मान । एक दिनका ही पराश्न । फुलाता अल्पको जैसे ॥ २७ ॥ जैसे मेघ छाया देख तोड़ता । दुर्दैवी घरका आसरा पार्था । मृग-जल देखकर तोड़ता । पानीका डबरा ॥ २८ ॥ और कहूं मैं कितना । संपत्ति-योगसे नाना । मदमें उन्मत्त होना । कहलाता दर्प ॥ २९ ॥ ३ आसुरी-गुण, अभिमान— तथा वेदमें जिसका विश्वास । विश्वका पूजनीय ईश । विश्वमें एक ही महा तेजस । सूर्य मात्र ॥ २३० ॥ विश्वमें जो है स्पर्धास्पद । एक ही सार्वभौम पद । न मरना है निर्विवाद । विश्वको भाता ॥ ३१ ॥ इसीलिये यदि उत्साहसे । इसका वर्णन करनेसे फूलता वह अभिमानसे । तथा रखता डाह ॥ ३२ ॥ कहता निकालूंगा ईशको । गरल पिलाऊंगा वेदको । खपाता है अपने बलको । स्व-गौरवार्थ ॥ ३३ ॥ ६४५ देवासुर-संपद्विभाग-योग

पतंगको दीप नहीं भाता । जुगनूको सूर्य क्लेश देता । तथा पंखेरू द्वेष करता । महासागरका ॥ ३४ ॥ वैसा अहं नामका मोह । ईश्वरसे करता द्रोह । वेदसे माने ऐसा डाह । मानो है सौत ॥ ३५ ॥ स्वयं मान्यताका दुष्ट भाव । अभिमानसे बनता देव । रौरवका पथ है पांडव । जो चलता आया ॥ ३६ ॥

४ आसुरी-गुण, क्रोध—

वैसे ही दूसरोंका सुख । जलता है सदा देख । बढे जैसे क्रोधका विष । मनोदशा यह ॥ ३७ ॥ तपा तेल जल पा कर शीतल । भड़क उठता जैसे महाज्वाल । या चंद्रमाको देखकर उदर-ज्वाल । उठती सियारके ॥ ३८ ॥ विश्वका जीवन जिससे उजलता । वह सूर्योदय देख विश्व खिलता । किंतु है उलूकका नयन फूटता । पापीके जैसे ॥ ३९ ॥ प्रातःकाळ सुख है विश्वका । किंतु मृत्युसा दुःख है चोरका । कालकूट बनता दूधका । सांपमें जैसे ॥ २४० ॥ अगाध सागर जल । पीकर वड़वानल । भडकता बन ज्वाल । न पाता शांति ॥ ४१ ॥ वैसे विद्या विनोद विभव । देखकर अन्योंका सुदैव । भडकता जाता शेष भाव । वह है क्रोध ॥ ४२ ॥

५ आसुरी-भाव, कठोरता—

तथा मन जिसका व्याल-विवर । आंखें मानो विष-बाणके अंकुर । बोलना जैसे बरसते अंगार । जलते हुए ॥ ४३ ॥ ऐसे जिसके क्रिया जात । तीखे जैसे आरेके दांत । सबाङ्ग खरोंचता नित । पारुष सबको ॥ ४४ ॥

ज्ञानेश्वरी ६४६

मानवोंमें उसको अधम जान । कठोरताका ही जो अवतरण । सुन तू अब कहता हूं लक्षण । अज्ञानका मैं ॥ ४५ ॥ ६ आसुरी-भाव, अज्ञान— शीत उष्णादि स्पर्श जैसे । न जानता पाषाण वैसे । या रात्र और दिवससे । अनभिज्ञ जात्यंध ॥ ४६ ॥ उठता अग्नि जैसे खाता । खाद्याखाद्य नहीं जानता । या पारस नहीं जानता । लोह या सोना ॥ ४७ ॥ या नाना रसोंमें जैसे । डूबती कड़ची जैसे । किंतु रसास्वाद ऐसे । जानती नहीं ॥ ४८ ॥ अथवा जैसे वायु होता । मार्गामार्ग नहीं जानता । वैसे कृत्याकृत्यमें होता । वह अंधा ॥ ४९ ॥ जैसे यह स्वच्छ है मैला । यह नहीं जानता बाल । जिसे देखता वह केवल । डालता मुखमें ॥ २५० ॥ खिचडी कर वैसे पाप-पुण्यकी । खाते हुए नहीं बुद्धिमें उसकी । भला बुरा यह नहीं जाननेकी । ऐसी जो दशा ॥ ५१ ॥ उसका नाम है अज्ञान । इस बोलसे नहीं भिन्न । ऐसे छ दोषोंका लक्षण । कहे सब ॥ ५२ ॥ आसुरी संपदा जीवन विनाशक होती है— ऐसे छ दोषोंसे भरकर पूर्ण । आसुरी संपदा हुई बलवान । छोटीसी शुभांगीमें जैसे अर्जुन । हो विषय अतिशय ॥ ५३ ॥ अथवा तीन अग्निकी पंक्ती । देखनेमें छोटीसी लगती । किंतु है विश्वकी प्राणाहूती । ओछी उसको ॥ ५४ ॥ या विधाताको जाकर शरण । त्रिदोषसे न चुकता मरण । उन तीनोंके ये दूने हैं जान । छह दोष ॥ ५५ ॥ ६४७ दैवासुर-संपद्‌विभाग-योग

इन छह दोषोंसे संपूर्ण । बनाया है आसुरी भवन । इसलिये अल्प न अर्जुन । आसुरी संपदा ॥ ५६ ॥ या क्रूर ग्रहोंका मिलन । होता एक राशिमें जान । या निंदकके पास पूर्ण । आते सब पाप ॥ ५७ ॥ या मरनेवालेके अंग । ग्रासते जैसे सभी रोग । या कुसमयमें दुर्योग । होते एकत्र ॥ ५८ ॥ या जीवन समाप्तिकी आती बेला । बकरीको डसता बिच्छू काला । वैसे ये छ ही दोष जिसे सकल । घेरते हैं ॥ ५९ ॥ विश्वासु जैसे चोरसे पकड़वाता । या थका हुवा महापूरमें फंसता । वैसे ही इन दोषोंसे अनिष्ट होता । मनुष्यका सदैव ॥ २६० ॥ यदि किसी मोक्ष-पथिक पर । इनका पडा इक छींटा भर । डुबाएगा उसे भव-सागर । न उठेगा वह ॥ ६१ ॥ उतरके अधम योनिकी । सीढी परसे जो अंतिमकी । स्थावर तक गति उसकी । पहुंचेगी ही ॥ ६२ ॥ छ दोष ये जिनमें । पाये जाते उनमें । बढ़ती संपदामें । आसुरी जो ॥ ६३ ॥ ऐसे हैं ये भिन्न । संपदा तू जान । कही स-लक्षण । तुझसे अब ॥ ६४ ॥ दैवी संपद्विमोक्षाय निबंधायासुरी मता । मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पांडव ॥ ५ ॥ तू दैवी संपत्तिका स्वामी है— इन दोनोंमें पहली । दैवी संपदा जो भली । मोक्ष-सूर्यसे उजली । प्रभात जान ॥ ६५ ॥ मुक्तता करती दैवी आसुरी बांधती जहां । पायी है संपदा तूने दैवी न कर सोच तू ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४८

अध्याय १२: भक्तियोग

तथा ये जो दूसरी । संपदा है आसुरी । मोह-लोहकी खरी । सांखली है ॥ ६६ ॥ यह सुन कर तू अर्जुन । भय खायेगा अपने मन । किंतु कभी रातसे क्या दिन । भय खाता है ॥ ६७ ॥ जो है यह आसुरी संपत्ति । उसीका बंधन हो सकती । आश्रित होती जिनकी मति । इन दोषोंकी ॥ ६८ ॥ किंतु यहां तू अर्जुन । उपरोक्त दैवी गुण । लेकर आया निधान । जन्मसे ही ॥ ६९ ॥ इसीलिये तू यहांका । स्वामी दैवी-संपदाका । बन, पायेगा मोक्षका । सुख शाश्वत ॥ २७० ॥ द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥ अनादिसे ये दो मार्ग चले आये हैं— ऐसे देव और असुर । संपदाके स्वामी जो नर । अनादिसे हैं चलकर । आये दो मार्ग ॥ ७१ ॥ जैसे है रातका अवसर । करते निशाचर व्यापार । तथा दिनमें सुव्यवहार । मनुष्यादिक ॥ ७२ ॥ वैसे ही अपना आचरण । करती है दोनों सृष्टि जान । दैवी तथा आसुरी अर्जुन । जन्म लेकर ॥ ७३ ॥ वैसे भी दैवी सविस्तृत । ज्ञान कथनमें पार्थ । कहा है मैंने यथावत । पीछे ही सब ॥ ७४ ॥ जीवोंकी सृष्टि दो भांति दैवी तथैव आसुरी । सविस्तार कही दैवी आसुरी कहता सुन ॥ ६ ॥ ६४९ देवासुर-संपद्विभाग-योग

आसुरी संपदाका वर्णन— अब जो मैं आसुरी सृष्टि । तथा वहांकी सभी गोष्ठी । कहता हूं दे पूर्ण दृष्टि । अवधानकी ॥ ७५ ॥ जैसे है बिन वाद्यका नाद । नहीं आता कोई भी साद । या बिन पुष्पका सुगंध । नहीं आता वैसे ॥ ७६ ॥ वैसे ही प्रकृति यह असुर । अकेली नहीं होती है गोचर । जब मिलता एकाधा शरीर । दीखती वह ॥ ७७ ॥ करनेसे जैसे घर्षण । देती लकड़ी अग्नि कण । प्राणि देहसे निर्माण । होता है इसका ॥ ७८ ॥ बढता है जैसे ऊस । वैसे ही बढता है रस । देहाकार होता वैसा । प्राणियोंका ॥ ७९ ॥ अब जैसे जिनका तन । रूप लेता जाता अर्जुन । होती है दोष वृद्धि जान । आसुरी जो ॥ २८० ॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥ कृत्याकृत्यका अज्ञान— तथा पुण्यके लिये हो प्रवृत्ति । या पापके विषयमें निवृत्ति । जाननेमें इसको है विरक्ति । होती मनमें ॥ ८१ ॥ अजी ! आने जाने में रखना भी द्वार । घर बांधनेके नशेमें भूल कर । मर जाता है घरमें ही फंस कर । कोशकीट जैसे ॥ ८२ ॥ दी हुई पूंजी आयेगी या नहीं । यह भी जो कभी देखता नहीं । और देता है चोरको वैसी ही । पूंजी मूर्ख ॥ ८३ ॥ तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति । नहीं जानती आसुरी-वृत्ति । स्वप्नमें भी शुचिताकी रीति । जानते नहीं ॥ ८४ ॥ कृत्य अकृत्य क्या कैसे न जाने आसुरी जन । न स्वच्छता न आचार जानते वे न सत्य भी ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ६५०

कालिमा छोडेगा कभी कोयला । तथा होगा कभी काग उजला । राक्षस विरत होगा निर्मला । मांसाहारसे ॥ ८५ ॥ किंतु आसुरी जीवमें मात्र । शुचित्व न होता तिल-मात्र । जैसे न होता कभी पवित्र । पात्र मद्यका ॥ ८६ ॥ पूर्ण करना शास्त्र-विधिकी आस । या पूर्वजोंकी परंपरा विशेष । वैसे ही धर्माचरणकी वे भाष । जानते ही नहीं ॥ ८७ ॥ जैसे बकरीका चरना । अथवा वायुका दौड़ना । तथा आगका है जलना । जो मिला सो ॥ ८८ ॥ वैसे चलते सदा स्वैर । आगे बढ़ कर असुर । सत्यसे रख कर वैर । बरतते वे ॥ ८९ ॥ वृश्चिक अपने डंकसे । यदि गुदगुदा सकनेसे । बोला जायगा असुरोंसे । शायद सत्य ॥ २९० ॥ अपान-द्वारसे जब । सुगंध ले सके सब । सत्य पा सकेंगे सब । असुर लोग ॥ ९१ ॥ बिन कारणके जन । स्वभावसे ही है दुर्जन । उनके बोल विलक्षण । कहता हूं मैं ॥ ९२ ॥ अजी ! ऊंटका होना हैं चांग । कहो कौनसा रहता अंग । वैसे हैं असुरोंका प्रसंग । कहता ओघसे ॥ ९३ ॥ मुख जैसे रहता धुंवारा । धुंवा उगलता दिन सारा । इस भांति रहती वाग्धारा । उनकी सदा ॥ ९४ ॥ असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥ कहते जग झूठा है निराधार निरीश्वर । काम-मूलक है सारा बना संयोगसे यह ॥ ८ ॥ ३५१ देवासुर-संपद्विभाग-योग

जीवन भोगके लिये है और सारा झूठ है— विश्व अनादि चलता आता । ईश्वर है इसका नियंता । उसके आगे निर्णय होता । न्याय अन्यायका ॥ ९५ ॥ वेद जिसको अन्यायी कहता । उसे नरक भोगना पड़ता । उसकी दृष्टिसे जो न्यायी होता । भोगता वह स्वर्ग ॥ ९६ ॥ ऐसी है जो विश्व-व्यवस्था । अनादि कालसे ही पार्था । यह सब पूर्ण है वृथा । कहते ये लोग ॥ ९७ ॥ यज्ञ-मूढ जो यागमें फंसे । मूर्ति-लिंगमें पागल वैसे । फंसाये हैं योगी गेरुवेसे । समाधि-भ्रममें ॥ ९८ ॥ यहां अपने ही सामर्थ्यसे । भोगता है जो मिलता है उसे । इसके बिन कौन क्या कैसे । पुण्य है दूजा ॥ ९९ ॥ अनेक भोग जुटा न सकनेसे । अपनी शरीरकी दुर्बलतासे । त्रस्त होना बिन विषय-सुखसे । यह है पाप ॥ ३०० ॥ संपन्नौंकी जो हत्या करना । इसको यदि पाप मानना । संपदा सब हाथमें आना । यह नहीं क्या पुण्य ॥ १ ॥ सबलका निर्बलको खाना । इसको यदि अन्याय माना । क्यों न हुवा कहो निःसंतान । मत्स्य जात ॥ २ ॥ तथा दोनों कुलोंको देख कर । कौमार्यमें ही शुभ लग्नपर । ब्याहना उचित तो धनुर्धर । प्रजा-हेतुसे ॥ ३ ॥ तब पशु-पक्षादि जो है जाति । उनकी अपरमित संतति । उनको किसने हे प्रतिपत्ति । किये हैं विवाह ॥ ४ ॥ चोरीसे जो धन है आया । किसको कहां विष भया । पर-दारासे बल किया । हुआ है कौन कोढी ॥ ५ ॥ तथा ईश्वर स्वामी होता । धर्माधर्मका भोग देता । जो करता वह भोगता । पर लोकमें ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ६५२

किंतु परत्र औ' देव न दीखता । इसीलिये वह सब होता वृथा । तथा कर्त्ता जब है मर जाता । भोगेगा कहां कौन ॥ ७ ॥ सुखी है इंद्र उर्वशीके संगमें । रहता है जैसे अमरावतीमें । वैसे मानता है कीडा कीचडमें । अपनेको भी ॥ ८ ॥ इसलिये है नरक स्वर्ग । नहीं है पाप-पुण्यका भाग । दोनों स्थानमें है सुख-भोग । कामका ही ॥ ९ ॥ इसी कारणसे काम । रत स्त्री-पुरुष युग्म । मिलने लेता है जन्म । जग संपूर्ण ॥ ३१० ॥ तथा जो जो अभिलाषा करता । स्वार्थके लिये उसको पोसता । जिससे परस्पर द्वेष होता । काम करता नाश ॥ ११ ॥ तमी काम बिन कुछ भी नहीं । जगके मूलमें कुछ भी कहीं । इसभांति बोलते हैं जो यही । आसुरी लोग ॥ १२ ॥ रहने दो यह व्यर्थ भाषण । बढाता नहीं इसका व्याख्यान । होती है इससे निष्फल जान । वाचा-शक्ति ॥ १३ ॥ एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥ लोक-क्षयके लिये ही आसुरी लोगोंका जन्म होता है— तथा ईश्वरका तिरस्कार । यही होता इनका विचार । विश्वमें नहीं कोई ईश्वर । यह निश्चय उनका ॥ १४ ॥ अथवा खुलकर बाहर । देहमें पाखंड भरकर । नास्तिकताकी अस्थि अंदर । रोपते हैं ॥ १५ ॥ लेकर दृष्टिको ऐसी नष्टात्मा ज्ञान-हीन जो । नाशार्थ विश्वके सारे निकले रिपु हिंसक ॥ ९ ॥ ३५३ दैवासुर-संपद्विभागयोग

स्वर्गके लिये नहीं आदर । न नरकका तिरस्कार । जला है यह वासनांकुर । उनके मनमें ॥ १६ ॥ केवल खोडा-रूप यह शरीर । गंदे पानीका बुल्ला-सा बनकर । विषय-कीचमें उठ फूटकर । मिट जायेगा ॥ १७ ॥ नासने होते जब जल चर । वहां पहुंचते तब धीवर । या गिरना होता जब शरीर । उदय होते रोग ॥ १८ ॥ उदय होना धूमकेतुके जैसे । जगके अहित हेतु होना वैसे । जनमते ये असुर-लोग वैसे । लोक-क्षय हेतु ॥ १९ ॥ उदय होने पर अशुभ । उसमें फूटते जैसे कोंभ । वैसे पापका ये कीर्ति-स्तंभ । चलते फिरते हैं ॥ ३२० ॥ जो मिलता वह सब जलाना । आगका अन्य कुछ भी न जानना । वैसे सबका विरोध ही करना । इनका स्वभाव ॥ २१ ॥ इसका कारण यही है अर्जुन । आरंभ करते उत्साहसे जान । कहता इस उत्साहका कारण । सुन तू अब ॥ २२ ॥ काममाश्रित्य दुष्पूरं दंभमानमदान्विताः । मोहाद् गृहीत्वासद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥ आसुरी-वृत्ति धर्म-धेनूका आहार तोड़ती है — पानीसे न भरता धीवरका जाल । ईंधन पर्याप्त न माने अग्नि ज्वाल । वैसे अतृप्त रहता काम कराल । सदैव भूखा ही ॥ २३ ॥ ऐसे कामका ले आश्रय । जीव भावसे धनंजय । दंभ मानका समुदाय । जुटाता है ॥ २४ ॥ काम दुर्भर जो सेके मानी दांभिक मत्त हो । हठके बलसे मूढ करते पाप निर्घृण ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ६५४

वैसे ही मद-भरा कुंजर । उसीमें चढ़ा मद्यका ज्वर । तब बढ़ जाता मद-भार । बुढापेका ॥ २५ ॥ बनता तब हठका स्थान । करता मूढ़ताका धरण । फिर क्या करना है वर्णन । उसके निश्चयका ॥ २६ ॥ पर-ताप जिससे घड़ता । दूसरोंका जीव कुचलता । उन्हीं कामोंमें गढ़ जाता । जीव-भावसे ॥ २७ ॥ अपने कियेका फिर बखान । तथा जगको दे धिःकार दान । दश दिशामें करें प्रसारण । आशा-जाल ॥ २८ ॥ ऐसे विकारसे भर । पाप-कर्म कर घोर । धर्म-धेनुका आहार । तोडते हैं ॥ २९ ॥ चिंतामपरिमेयां च प्रलयांतामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥ काम-प्रचोदनसे कर्म-प्रवृत्ति— इसी सामग्रिपे चलती । उनकी जो कर्मकी गती । मृत्युसे भी नहीं छूटती । चिंता उनकी ॥ ३३० ॥ पातालसे भी होती जो निम्न । ऊंचाईमें छोटा है गगन । विशालतामें है त्रिभुवन । अणुसा लगता ॥ ३१ ॥ योग-पटका जैसे स्मरण । जीवमें असीम विबंधन । साथ देता मृत्यु तक जान । पतिव्रता जैसे ॥ ३२ ॥ चिंता वह ऐसी अपार । बढ़ाता जाता निरंतर । हृदयमें भर असार । विषयाधिक ॥ ३३ ॥ स्त्रियोंका गाना सुनना । उन्हें आंखोंसे देखना । सर्वेंद्रिय आलिंगना । स्त्रियोंके ही ॥ ३४ ॥ असीम करते चिंता मृत्युसे भी न छूटती । कामोपभोगमें चूर मानो सर्वस्व है वह ॥ ११ ॥ ६५५ दैवासुर-संपद्विभाग-योग

अमृत भी निछावर करना । ऐसा ख्र सुनही है स्त्रीके बिना । करता है ऐसा उसका मन । निश्चय पार्थ ॥ ३५ ॥ फिर भी भोगके कारण । दौडते हैं तीनों भवन । दस दिशाओंमें अर्जुन । उसके परे भी ॥ ३६ ॥ आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥ १२ ॥ सुख-भोगके लिये पापसे धन-संचय— आमिष कौरकी बडी आशासे । न सोच निगलता मीन जैसे । होती है विषयाशा उन्हे वैसे । पांडुकुमार ॥ ३७ ॥ नहीं होती कभी वांछित प्राप्ति । किंतु करोडोंकी आशा-संतति । बढ़ते बढ़ते है वह होती । कोश-कीटक ॥ ३८ ॥ तथा फैलाते जो अभिलाश । पूर्ण न होता बनता द्वेष । ऐसा काम-क्रोध ही विशेष । बनता पुरुषार्थ ॥ ३९ ॥ दिनमें चलना रातमें जागना । जैसे होता चौकीदारका जीना । दिन-राति विश्रांति नहीं जाना । उसी भांति ॥ ३४० ॥ ऊंची चोटीसे काम है ढकेलता । नीचे क्रोध पत्थरपे पटकता । फिर भी राग-द्वेष नहीं छूटता । विषयोंसे उसका ॥ ४१ ॥ हृदयमें ऐसे विषयोंकी भूख । जुटाये विषय-साधन अनेक । भोगके लिये जो अति आवश्यक । किंतु द्रव्य है कहां ॥ ४२ ॥ तभी भोग-पूर्तिमें हो आसक्त । जुट जाते हैं धन-संचयार्थ । तथा लूटते हैं विश्वको नित । मनमाने जो ॥ ४३ ॥ एकको मारते समय साधकर । तो दूसरेका सर्वस्व ही छीनकर । तीसरेके लिये बनाते हैं आखर । अपाय तंत्र ॥ ४४ ॥ आशाके कसके पाश डूबे हैं काम-क्रोधमें । चाहते सुख-भोगार्थ पापसे धन-संचय ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६५१

जाल पाश तीर कुकर । भाला बाज छुरा लेकर । चला मानो चिडियामार । शिकार करने ॥ ४५ ॥ पालनेके लिये एक पेट । चिडियों पर ढाते संकट । ऐसा ही आचरण निकृष्ट । करते ये लोग ॥ ४६ ॥ कर पर-प्राण घात । कमाकर लाते वित्त । उससे हो कैसे चित्त । संतुष्ट किसका ॥ ४७ ॥ इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् । इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥ भोगार्थ असीम आशा और वैर— कहता है आज अर्जुन । कर लिया सबका धन । सहज अपने स्वाधीन । धन्य हूं मैं ॥ ४८ ॥ आत्म-श्लाघा भाव यह उत्पन्न । होनेसे बहता उसका मन । लूटूंगा कल औरोंका भी धन । कहता ऐसे ॥ ४९ ॥ ऐसे यह जुटाया मैने इतना । इसका आधार बनाके अपना । लाभमें पाऊंगा रही सही नाना । संपदा विश्वकी ॥ ३५० ॥ ऐसा विश्वका सब धन । करूंगा अपने स्वाधीन । फिर जिसके हो नयन । मिटा दूंगा ॥ ५१ ॥ असौ मया हतः शत्रुईनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥ मारे मैंने शत्रु जो कुछ । मारूंगा कल बचे जो तुच्छ । करूंगा शासन बन उच्च । अकेला ही मैं ॥ ५२ ॥ जुटाये आज ये लाभ जुटेंगे और भी कल । यह है वह भी होगा मेरी ही सब संपदा ॥ १३ ॥ मैने वह शत्रु मारा मारूंगा दूसरा फिर । स्वामी मैं और मैं भोक्ता सुखी मैं सिद्ध मैं बली ॥ १४ ॥ (31) ६५७ देवासुर-संपद्विभाग-योग

बनके रहेंगे यदि मेरे दास । नहीं तो करूंगा मैं उनका नाश । अथवा मानो विश्वमें मैं हूं ईश । चराचरका सब ॥ ५३ ॥ इस भोग-भूमिका मैं प्रधान । सब सुख-भोगका मैं हूं स्थान । इंद्र भी देखके मनही मन । करेगा ईर्षा ॥ ५४ ॥ चाहूंगा मैं काया वाचा मन । होगा वह निश्चित संपन्न । मेरे बिना नहीं कोई जान । ऐसा आज्ञा-सिद्ध ॥ ५५ ॥ न देखा जब तक मेरा बल । तब तक बली है वह काल । मैं हूं सुखका सदन निश्चल । एक ही एक ॥ ५६ ॥ आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥ आसुरी लोगोंके अभिमानका रूप — होगा कुबेर महा संपन्न । किंतु नहीं है मेरे समान । संपन्नतामें मेरे समान । लक्ष्मीपति भी नहीं ॥ ५७ ॥ मेरे कुलकी उज्ज्वलता । जाति-गोतमें जो श्रेष्ठता । उसके सन्मुख अल्पता । दीखती ब्रह्माकी भी ॥ ५८ ॥ अपनी बढाई वे इस प्रकार । ईश्वरादिको भी व्यर्थ मानकर । अपनेको सर्व-श्रेष्ठ बताकर । करते रहते हैं ॥ ५९ ॥ लोप हुवा अब अभिचार । करूंगा उसका जीर्णोद्धार । प्रतिष्ठा करूंगा पर-मार । यज्ञकी अब ॥ ३६० ॥ मेरे गुण-गीत जो गायेंगे । नाट्यादिसे मुझे रिझायेंगे । जो मांगेंगे उसे वह देंगे । सभी वस्तु ॥ ६१ ॥ मादक अन्न पेय पानमें । प्रमदाओंके आलिंगनमें । बनूंगा मैं तीनों भुवनमें । आनंद-रूप ॥ ६२ ॥ मैं हूं कुलीन संपन्न कौन है मुझसा कहां । यज्ञ-दान-विलासी मैं मानते अज्ञ मोहसे ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी १५८

कहूं मैं कितना तुझे अर्जुन । आसुरीके ऐसे पागलपन । सूंघा करते गगन-सुमन । ऐसे ही वे ॥ ६३ ॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । प्रसक्ताः कामभोगेषु पतंति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥ मोह-आंधीमें फंसकर तमांधमें चकर काटते रहते हैं— ज्वरमें भरके जैसे । भ्रमता है रोगी वैसे । बांधता है संकल्पसे । मनोरथ सारे ॥ ६४ ॥ अज्ञान-धूलमें भरकर । आशाकी आंधीमें उडकर । नभमें घूमते गरगर । मनोरथोंके ॥ ६५ ॥ अनियमित आकाशके मेघ । या सागरके तरंग अभंग । वैसे कामना कामके तरंग । उठते अखंड ॥ ६६ ॥ ऐसी ही जो कामनायें अती । हृदयमें लगायें रहती । उसी परसे खींची जाती । कमल-कलियां ॥ ६७ ॥ या पाषाणके सिरपर । पड फूटते हैं गागर । जीवन वैसे निरंतर । होता है फूटा ॥ ६८ ॥ बढती जाती जैसे रात । बढता है तम सतत । जीवमें ऐसे मोह नित । बंधता जाता है ॥ ६९॥ तथा बढता जैसे मोह । बनता विषयोंका गृह । विषयोंके लेते हैं थाह । पातक सारे ॥ ३७० ॥ अपने बलसे जब पाप । आते जहां एकत्र समीप । सभी नरक आते हैं आप । जीवनमें ही ॥ ७१ ॥ इसीलिये जान तू पार्थ । पालते जो कु-मनोरथ । बसते नरकमें नित । असुरलोग ॥ ७२ ॥ भ्रममें भरके ऐसे जकडे मोह-जालमें । गिरते विषयासक्त नरकमें अमंगल ॥ १६ ॥ ६५९ दैवासुर-संपद्विभाग-योग

वहां असि-पत्रके तरुवर । पलते अंगारके डोंगर । तपे हुए तेलके सागर । उछलते हैं ॥ ७३ ॥ यातनाके जो नित नये प्रकार । समझानेके वहां यही आधार । मिलते हैं जो सदैव भयंकर । नरक-लोकमें ॥ ७४ ॥ ऐसे नरकके लिये भयंकर । जनम लिये जो लेके अधिकार । करते हैं वे भ्रममे पड़कर । यज्ञ याग ॥ ७५ ॥ वैसे यज्ञादिककी है जो क्रिया । देती अपना फल धनंजय । किंतु नाटकका-सा स्वांग लिया । पाया कुफल ॥ ७६ ॥ पतिका करके जो आश्रय । प्रियकरकी होकर प्रिय । मनमें मानती धनंजय । सौभाग्यवती आप ॥ ७७ ॥ आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजंते नामयज्ञैस्ते दंभेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥ उपहार लूटनेके लिये यज्ञ करते हैं— अपने आपको मन ही मन । पूजके अपना महंतपन । फूलता जाता है असाधारण । अहंमन्यतामें ॥ ७८ ॥ नहीं जानते झुकना कैसे । लोहेके ढले हुये स्तंभ जैसे । या गगन-चुंबी शिखर जैसे । खडे हैं पाषाणके ॥ ७९ ॥ अपनी ही सज्जनतासे आप । मनमें ही संतुष्ट हो अमाप । तिनकासा मानते परंतप । सारे विश्वको ॥ ३८० ॥ धनकी मदिरा फिर । पीनेसे मस्त हो कर । कृत्याकृत्य भूलकर । सबसे होते भिन्न ॥ ८१ ॥ जहां जुटी संपदा इस भांति । वहां यज्ञकी बात कैसे आती । किंतु पगलेको क्या न सूझती । किस समय ॥ ८२ ॥ स्वयं-पूजित गर्विष्ठ मदांध धन-मानमें । नामके करते यज्ञ दंभसे अन्यवस्थित ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६०