भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 722, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 722

आसुरी संपदाका वर्णन— अब जो मैं आसुरी सृष्टि । तथा वहांकी सभी गोष्ठी । कहता हूं दे पूर्ण दृष्टि । अवधानकी ॥ ७५ ॥ जैसे है बिन वाद्यका नाद । नहीं आता कोई भी साद । या बिन पुष्पका सुगंध । नहीं आता वैसे ॥ ७६ ॥ वैसे ही प्रकृति यह असुर । अकेली नहीं होती है गोचर । जब मिलता एकाधा शरीर । दीखती वह ॥ ७७ ॥ करनेसे जैसे घर्षण । देती लकड़ी अग्नि कण । प्राणि देहसे निर्माण । होता है इसका ॥ ७८ ॥ बढता है जैसे ऊस । वैसे ही बढता है रस । देहाकार होता वैसा । प्राणियोंका ॥ ७९ ॥ अब जैसे जिनका तन । रूप लेता जाता अर्जुन । होती है दोष वृद्धि जान । आसुरी जो ॥ २८० ॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥ कृत्याकृत्यका अज्ञान— तथा पुण्यके लिये हो प्रवृत्ति । या पापके विषयमें निवृत्ति । जाननेमें इसको है विरक्ति । होती मनमें ॥ ८१ ॥ अजी ! आने जाने में रखना भी द्वार । घर बांधनेके नशेमें भूल कर । मर जाता है घरमें ही फंस कर । कोशकीट जैसे ॥ ८२ ॥ दी हुई पूंजी आयेगी या नहीं । यह भी जो कभी देखता नहीं । और देता है चोरको वैसी ही । पूंजी मूर्ख ॥ ८३ ॥ तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति । नहीं जानती आसुरी-वृत्ति । स्वप्नमें भी शुचिताकी रीति । जानते नहीं ॥ ८४ ॥ कृत्य अकृत्य क्या कैसे न जाने आसुरी जन । न स्वच्छता न आचार जानते वे न सत्य भी ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ६५०