भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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कालिमा छोडेगा कभी कोयला । तथा होगा कभी काग उजला । राक्षस विरत होगा निर्मला । मांसाहारसे ॥ ८५ ॥ किंतु आसुरी जीवमें मात्र । शुचित्व न होता तिल-मात्र । जैसे न होता कभी पवित्र । पात्र मद्यका ॥ ८६ ॥ पूर्ण करना शास्त्र-विधिकी आस । या पूर्वजोंकी परंपरा विशेष । वैसे ही धर्माचरणकी वे भाष । जानते ही नहीं ॥ ८७ ॥ जैसे बकरीका चरना । अथवा वायुका दौड़ना । तथा आगका है जलना । जो मिला सो ॥ ८८ ॥ वैसे चलते सदा स्वैर । आगे बढ़ कर असुर । सत्यसे रख कर वैर । बरतते वे ॥ ८९ ॥ वृश्चिक अपने डंकसे । यदि गुदगुदा सकनेसे । बोला जायगा असुरोंसे । शायद सत्य ॥ २९० ॥ अपान-द्वारसे जब । सुगंध ले सके सब । सत्य पा सकेंगे सब । असुर लोग ॥ ९१ ॥ बिन कारणके जन । स्वभावसे ही है दुर्जन । उनके बोल विलक्षण । कहता हूं मैं ॥ ९२ ॥ अजी ! ऊंटका होना हैं चांग । कहो कौनसा रहता अंग । वैसे हैं असुरोंका प्रसंग । कहता ओघसे ॥ ९३ ॥ मुख जैसे रहता धुंवारा । धुंवा उगलता दिन सारा । इस भांति रहती वाग्धारा । उनकी सदा ॥ ९४ ॥ असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥ कहते जग झूठा है निराधार निरीश्वर । काम-मूलक है सारा बना संयोगसे यह ॥ ८ ॥ ३५१ देवासुर-संपद्विभाग-योग