भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 724

जीवन भोगके लिये है और सारा झूठ है— विश्व अनादि चलता आता । ईश्वर है इसका नियंता । उसके आगे निर्णय होता । न्याय अन्यायका ॥ ९५ ॥ वेद जिसको अन्यायी कहता । उसे नरक भोगना पड़ता । उसकी दृष्टिसे जो न्यायी होता । भोगता वह स्वर्ग ॥ ९६ ॥ ऐसी है जो विश्व-व्यवस्था । अनादि कालसे ही पार्था । यह सब पूर्ण है वृथा । कहते ये लोग ॥ ९७ ॥ यज्ञ-मूढ जो यागमें फंसे । मूर्ति-लिंगमें पागल वैसे । फंसाये हैं योगी गेरुवेसे । समाधि-भ्रममें ॥ ९८ ॥ यहां अपने ही सामर्थ्यसे । भोगता है जो मिलता है उसे । इसके बिन कौन क्या कैसे । पुण्य है दूजा ॥ ९९ ॥ अनेक भोग जुटा न सकनेसे । अपनी शरीरकी दुर्बलतासे । त्रस्त होना बिन विषय-सुखसे । यह है पाप ॥ ३०० ॥ संपन्नौंकी जो हत्या करना । इसको यदि पाप मानना । संपदा सब हाथमें आना । यह नहीं क्या पुण्य ॥ १ ॥ सबलका निर्बलको खाना । इसको यदि अन्याय माना । क्यों न हुवा कहो निःसंतान । मत्स्य जात ॥ २ ॥ तथा दोनों कुलोंको देख कर । कौमार्यमें ही शुभ लग्नपर । ब्याहना उचित तो धनुर्धर । प्रजा-हेतुसे ॥ ३ ॥ तब पशु-पक्षादि जो है जाति । उनकी अपरमित संतति । उनको किसने हे प्रतिपत्ति । किये हैं विवाह ॥ ४ ॥ चोरीसे जो धन है आया । किसको कहां विष भया । पर-दारासे बल किया । हुआ है कौन कोढी ॥ ५ ॥ तथा ईश्वर स्वामी होता । धर्माधर्मका भोग देता । जो करता वह भोगता । पर लोकमें ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ६५२