भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 725, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 725

किंतु परत्र औ' देव न दीखता । इसीलिये वह सब होता वृथा । तथा कर्त्ता जब है मर जाता । भोगेगा कहां कौन ॥ ७ ॥ सुखी है इंद्र उर्वशीके संगमें । रहता है जैसे अमरावतीमें । वैसे मानता है कीडा कीचडमें । अपनेको भी ॥ ८ ॥ इसलिये है नरक स्वर्ग । नहीं है पाप-पुण्यका भाग । दोनों स्थानमें है सुख-भोग । कामका ही ॥ ९ ॥ इसी कारणसे काम । रत स्त्री-पुरुष युग्म । मिलने लेता है जन्म । जग संपूर्ण ॥ ३१० ॥ तथा जो जो अभिलाषा करता । स्वार्थके लिये उसको पोसता । जिससे परस्पर द्वेष होता । काम करता नाश ॥ ११ ॥ तमी काम बिन कुछ भी नहीं । जगके मूलमें कुछ भी कहीं । इसभांति बोलते हैं जो यही । आसुरी लोग ॥ १२ ॥ रहने दो यह व्यर्थ भाषण । बढाता नहीं इसका व्याख्यान । होती है इससे निष्फल जान । वाचा-शक्ति ॥ १३ ॥ एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥ लोक-क्षयके लिये ही आसुरी लोगोंका जन्म होता है— तथा ईश्वरका तिरस्कार । यही होता इनका विचार । विश्वमें नहीं कोई ईश्वर । यह निश्चय उनका ॥ १४ ॥ अथवा खुलकर बाहर । देहमें पाखंड भरकर । नास्तिकताकी अस्थि अंदर । रोपते हैं ॥ १५ ॥ लेकर दृष्टिको ऐसी नष्टात्मा ज्ञान-हीन जो । नाशार्थ विश्वके सारे निकले रिपु हिंसक ॥ ९ ॥ ३५३ दैवासुर-संपद्विभागयोग