ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
किंतु परत्र औ' देव न दीखता । इसीलिये वह सब होता वृथा । तथा कर्त्ता जब है मर जाता । भोगेगा कहां कौन ॥ ७ ॥ सुखी है इंद्र उर्वशीके संगमें । रहता है जैसे अमरावतीमें । वैसे मानता है कीडा कीचडमें । अपनेको भी ॥ ८ ॥ इसलिये है नरक स्वर्ग । नहीं है पाप-पुण्यका भाग । दोनों स्थानमें है सुख-भोग । कामका ही ॥ ९ ॥ इसी कारणसे काम । रत स्त्री-पुरुष युग्म । मिलने लेता है जन्म । जग संपूर्ण ॥ ३१० ॥ तथा जो जो अभिलाषा करता । स्वार्थके लिये उसको पोसता । जिससे परस्पर द्वेष होता । काम करता नाश ॥ ११ ॥ तमी काम बिन कुछ भी नहीं । जगके मूलमें कुछ भी कहीं । इसभांति बोलते हैं जो यही । आसुरी लोग ॥ १२ ॥ रहने दो यह व्यर्थ भाषण । बढाता नहीं इसका व्याख्यान । होती है इससे निष्फल जान । वाचा-शक्ति ॥ १३ ॥ एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥ लोक-क्षयके लिये ही आसुरी लोगोंका जन्म होता है— तथा ईश्वरका तिरस्कार । यही होता इनका विचार । विश्वमें नहीं कोई ईश्वर । यह निश्चय उनका ॥ १४ ॥ अथवा खुलकर बाहर । देहमें पाखंड भरकर । नास्तिकताकी अस्थि अंदर । रोपते हैं ॥ १५ ॥ लेकर दृष्टिको ऐसी नष्टात्मा ज्ञान-हीन जो । नाशार्थ विश्वके सारे निकले रिपु हिंसक ॥ ९ ॥ ३५३ दैवासुर-संपद्विभागयोग
स्वर्गके लिये नहीं आदर । न नरकका तिरस्कार । जला है यह वासनांकुर । उनके मनमें ॥ १६ ॥ केवल खोडा-रूप यह शरीर । गंदे पानीका बुल्ला-सा बनकर । विषय-कीचमें उठ फूटकर । मिट जायेगा ॥ १७ ॥ नासने होते जब जल चर । वहां पहुंचते तब धीवर । या गिरना होता जब शरीर । उदय होते रोग ॥ १८ ॥ उदय होना धूमकेतुके जैसे । जगके अहित हेतु होना वैसे । जनमते ये असुर-लोग वैसे । लोक-क्षय हेतु ॥ १९ ॥ उदय होने पर अशुभ । उसमें फूटते जैसे कोंभ । वैसे पापका ये कीर्ति-स्तंभ । चलते फिरते हैं ॥ ३२० ॥ जो मिलता वह सब जलाना । आगका अन्य कुछ भी न जानना । वैसे सबका विरोध ही करना । इनका स्वभाव ॥ २१ ॥ इसका कारण यही है अर्जुन । आरंभ करते उत्साहसे जान । कहता इस उत्साहका कारण । सुन तू अब ॥ २२ ॥ काममाश्रित्य दुष्पूरं दंभमानमदान्विताः । मोहाद् गृहीत्वासद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥ आसुरी-वृत्ति धर्म-धेनूका आहार तोड़ती है — पानीसे न भरता धीवरका जाल । ईंधन पर्याप्त न माने अग्नि ज्वाल । वैसे अतृप्त रहता काम कराल । सदैव भूखा ही ॥ २३ ॥ ऐसे कामका ले आश्रय । जीव भावसे धनंजय । दंभ मानका समुदाय । जुटाता है ॥ २४ ॥ काम दुर्भर जो सेके मानी दांभिक मत्त हो । हठके बलसे मूढ करते पाप निर्घृण ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ६५४
वैसे ही मद-भरा कुंजर । उसीमें चढ़ा मद्यका ज्वर । तब बढ़ जाता मद-भार । बुढापेका ॥ २५ ॥ बनता तब हठका स्थान । करता मूढ़ताका धरण । फिर क्या करना है वर्णन । उसके निश्चयका ॥ २६ ॥ पर-ताप जिससे घड़ता । दूसरोंका जीव कुचलता । उन्हीं कामोंमें गढ़ जाता । जीव-भावसे ॥ २७ ॥ अपने कियेका फिर बखान । तथा जगको दे धिःकार दान । दश दिशामें करें प्रसारण । आशा-जाल ॥ २८ ॥ ऐसे विकारसे भर । पाप-कर्म कर घोर । धर्म-धेनुका आहार । तोडते हैं ॥ २९ ॥ चिंतामपरिमेयां च प्रलयांतामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥ काम-प्रचोदनसे कर्म-प्रवृत्ति— इसी सामग्रिपे चलती । उनकी जो कर्मकी गती । मृत्युसे भी नहीं छूटती । चिंता उनकी ॥ ३३० ॥ पातालसे भी होती जो निम्न । ऊंचाईमें छोटा है गगन । विशालतामें है त्रिभुवन । अणुसा लगता ॥ ३१ ॥ योग-पटका जैसे स्मरण । जीवमें असीम विबंधन । साथ देता मृत्यु तक जान । पतिव्रता जैसे ॥ ३२ ॥ चिंता वह ऐसी अपार । बढ़ाता जाता निरंतर । हृदयमें भर असार । विषयाधिक ॥ ३३ ॥ स्त्रियोंका गाना सुनना । उन्हें आंखोंसे देखना । सर्वेंद्रिय आलिंगना । स्त्रियोंके ही ॥ ३४ ॥ असीम करते चिंता मृत्युसे भी न छूटती । कामोपभोगमें चूर मानो सर्वस्व है वह ॥ ११ ॥ ६५५ दैवासुर-संपद्विभाग-योग
अमृत भी निछावर करना । ऐसा ख्र सुनही है स्त्रीके बिना । करता है ऐसा उसका मन । निश्चय पार्थ ॥ ३५ ॥ फिर भी भोगके कारण । दौडते हैं तीनों भवन । दस दिशाओंमें अर्जुन । उसके परे भी ॥ ३६ ॥ आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥ १२ ॥ सुख-भोगके लिये पापसे धन-संचय— आमिष कौरकी बडी आशासे । न सोच निगलता मीन जैसे । होती है विषयाशा उन्हे वैसे । पांडुकुमार ॥ ३७ ॥ नहीं होती कभी वांछित प्राप्ति । किंतु करोडोंकी आशा-संतति । बढ़ते बढ़ते है वह होती । कोश-कीटक ॥ ३८ ॥ तथा फैलाते जो अभिलाश । पूर्ण न होता बनता द्वेष । ऐसा काम-क्रोध ही विशेष । बनता पुरुषार्थ ॥ ३९ ॥ दिनमें चलना रातमें जागना । जैसे होता चौकीदारका जीना । दिन-राति विश्रांति नहीं जाना । उसी भांति ॥ ३४० ॥ ऊंची चोटीसे काम है ढकेलता । नीचे क्रोध पत्थरपे पटकता । फिर भी राग-द्वेष नहीं छूटता । विषयोंसे उसका ॥ ४१ ॥ हृदयमें ऐसे विषयोंकी भूख । जुटाये विषय-साधन अनेक । भोगके लिये जो अति आवश्यक । किंतु द्रव्य है कहां ॥ ४२ ॥ तभी भोग-पूर्तिमें हो आसक्त । जुट जाते हैं धन-संचयार्थ । तथा लूटते हैं विश्वको नित । मनमाने जो ॥ ४३ ॥ एकको मारते समय साधकर । तो दूसरेका सर्वस्व ही छीनकर । तीसरेके लिये बनाते हैं आखर । अपाय तंत्र ॥ ४४ ॥ आशाके कसके पाश डूबे हैं काम-क्रोधमें । चाहते सुख-भोगार्थ पापसे धन-संचय ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६५१
जाल पाश तीर कुकर । भाला बाज छुरा लेकर । चला मानो चिडियामार । शिकार करने ॥ ४५ ॥ पालनेके लिये एक पेट । चिडियों पर ढाते संकट । ऐसा ही आचरण निकृष्ट । करते ये लोग ॥ ४६ ॥ कर पर-प्राण घात । कमाकर लाते वित्त । उससे हो कैसे चित्त । संतुष्ट किसका ॥ ४७ ॥ इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् । इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥ भोगार्थ असीम आशा और वैर— कहता है आज अर्जुन । कर लिया सबका धन । सहज अपने स्वाधीन । धन्य हूं मैं ॥ ४८ ॥ आत्म-श्लाघा भाव यह उत्पन्न । होनेसे बहता उसका मन । लूटूंगा कल औरोंका भी धन । कहता ऐसे ॥ ४९ ॥ ऐसे यह जुटाया मैने इतना । इसका आधार बनाके अपना । लाभमें पाऊंगा रही सही नाना । संपदा विश्वकी ॥ ३५० ॥ ऐसा विश्वका सब धन । करूंगा अपने स्वाधीन । फिर जिसके हो नयन । मिटा दूंगा ॥ ५१ ॥ असौ मया हतः शत्रुईनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥ मारे मैंने शत्रु जो कुछ । मारूंगा कल बचे जो तुच्छ । करूंगा शासन बन उच्च । अकेला ही मैं ॥ ५२ ॥ जुटाये आज ये लाभ जुटेंगे और भी कल । यह है वह भी होगा मेरी ही सब संपदा ॥ १३ ॥ मैने वह शत्रु मारा मारूंगा दूसरा फिर । स्वामी मैं और मैं भोक्ता सुखी मैं सिद्ध मैं बली ॥ १४ ॥ (31) ६५७ देवासुर-संपद्विभाग-योग
बनके रहेंगे यदि मेरे दास । नहीं तो करूंगा मैं उनका नाश । अथवा मानो विश्वमें मैं हूं ईश । चराचरका सब ॥ ५३ ॥ इस भोग-भूमिका मैं प्रधान । सब सुख-भोगका मैं हूं स्थान । इंद्र भी देखके मनही मन । करेगा ईर्षा ॥ ५४ ॥ चाहूंगा मैं काया वाचा मन । होगा वह निश्चित संपन्न । मेरे बिना नहीं कोई जान । ऐसा आज्ञा-सिद्ध ॥ ५५ ॥ न देखा जब तक मेरा बल । तब तक बली है वह काल । मैं हूं सुखका सदन निश्चल । एक ही एक ॥ ५६ ॥ आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥ आसुरी लोगोंके अभिमानका रूप — होगा कुबेर महा संपन्न । किंतु नहीं है मेरे समान । संपन्नतामें मेरे समान । लक्ष्मीपति भी नहीं ॥ ५७ ॥ मेरे कुलकी उज्ज्वलता । जाति-गोतमें जो श्रेष्ठता । उसके सन्मुख अल्पता । दीखती ब्रह्माकी भी ॥ ५८ ॥ अपनी बढाई वे इस प्रकार । ईश्वरादिको भी व्यर्थ मानकर । अपनेको सर्व-श्रेष्ठ बताकर । करते रहते हैं ॥ ५९ ॥ लोप हुवा अब अभिचार । करूंगा उसका जीर्णोद्धार । प्रतिष्ठा करूंगा पर-मार । यज्ञकी अब ॥ ३६० ॥ मेरे गुण-गीत जो गायेंगे । नाट्यादिसे मुझे रिझायेंगे । जो मांगेंगे उसे वह देंगे । सभी वस्तु ॥ ६१ ॥ मादक अन्न पेय पानमें । प्रमदाओंके आलिंगनमें । बनूंगा मैं तीनों भुवनमें । आनंद-रूप ॥ ६२ ॥ मैं हूं कुलीन संपन्न कौन है मुझसा कहां । यज्ञ-दान-विलासी मैं मानते अज्ञ मोहसे ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी १५८
कहूं मैं कितना तुझे अर्जुन । आसुरीके ऐसे पागलपन । सूंघा करते गगन-सुमन । ऐसे ही वे ॥ ६३ ॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । प्रसक्ताः कामभोगेषु पतंति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥ मोह-आंधीमें फंसकर तमांधमें चकर काटते रहते हैं— ज्वरमें भरके जैसे । भ्रमता है रोगी वैसे । बांधता है संकल्पसे । मनोरथ सारे ॥ ६४ ॥ अज्ञान-धूलमें भरकर । आशाकी आंधीमें उडकर । नभमें घूमते गरगर । मनोरथोंके ॥ ६५ ॥ अनियमित आकाशके मेघ । या सागरके तरंग अभंग । वैसे कामना कामके तरंग । उठते अखंड ॥ ६६ ॥ ऐसी ही जो कामनायें अती । हृदयमें लगायें रहती । उसी परसे खींची जाती । कमल-कलियां ॥ ६७ ॥ या पाषाणके सिरपर । पड फूटते हैं गागर । जीवन वैसे निरंतर । होता है फूटा ॥ ६८ ॥ बढती जाती जैसे रात । बढता है तम सतत । जीवमें ऐसे मोह नित । बंधता जाता है ॥ ६९॥ तथा बढता जैसे मोह । बनता विषयोंका गृह । विषयोंके लेते हैं थाह । पातक सारे ॥ ३७० ॥ अपने बलसे जब पाप । आते जहां एकत्र समीप । सभी नरक आते हैं आप । जीवनमें ही ॥ ७१ ॥ इसीलिये जान तू पार्थ । पालते जो कु-मनोरथ । बसते नरकमें नित । असुरलोग ॥ ७२ ॥ भ्रममें भरके ऐसे जकडे मोह-जालमें । गिरते विषयासक्त नरकमें अमंगल ॥ १६ ॥ ६५९ दैवासुर-संपद्विभाग-योग
वहां असि-पत्रके तरुवर । पलते अंगारके डोंगर । तपे हुए तेलके सागर । उछलते हैं ॥ ७३ ॥ यातनाके जो नित नये प्रकार । समझानेके वहां यही आधार । मिलते हैं जो सदैव भयंकर । नरक-लोकमें ॥ ७४ ॥ ऐसे नरकके लिये भयंकर । जनम लिये जो लेके अधिकार । करते हैं वे भ्रममे पड़कर । यज्ञ याग ॥ ७५ ॥ वैसे यज्ञादिककी है जो क्रिया । देती अपना फल धनंजय । किंतु नाटकका-सा स्वांग लिया । पाया कुफल ॥ ७६ ॥ पतिका करके जो आश्रय । प्रियकरकी होकर प्रिय । मनमें मानती धनंजय । सौभाग्यवती आप ॥ ७७ ॥ आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजंते नामयज्ञैस्ते दंभेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥ उपहार लूटनेके लिये यज्ञ करते हैं— अपने आपको मन ही मन । पूजके अपना महंतपन । फूलता जाता है असाधारण । अहंमन्यतामें ॥ ७८ ॥ नहीं जानते झुकना कैसे । लोहेके ढले हुये स्तंभ जैसे । या गगन-चुंबी शिखर जैसे । खडे हैं पाषाणके ॥ ७९ ॥ अपनी ही सज्जनतासे आप । मनमें ही संतुष्ट हो अमाप । तिनकासा मानते परंतप । सारे विश्वको ॥ ३८० ॥ धनकी मदिरा फिर । पीनेसे मस्त हो कर । कृत्याकृत्य भूलकर । सबसे होते भिन्न ॥ ८१ ॥ जहां जुटी संपदा इस भांति । वहां यज्ञकी बात कैसे आती । किंतु पगलेको क्या न सूझती । किस समय ॥ ८२ ॥ स्वयं-पूजित गर्विष्ठ मदांध धन-मानमें । नामके करते यज्ञ दंभसे अन्यवस्थित ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६०
जैसे वे कभी किसी समय । मद्य मौढ्यमें आ धनंजय । करते यज्ञका दंभमय । सारा स्वांग ॥ ८३ ॥ न कुंड न मंडप न वेदी । न उचित साधन समृद्धी । तथा उसकी न कुछ विधी । जिससे द्वेष ही सदा ॥ ८४ ॥ देव ब्राह्मणोंके नामका मान । गंध भी उसे न होता सहन । तब वहां आयेगा कैसे कौन । अपने मनसे ॥ ८५ ॥ बछियाका बनाकर भूत । गायके सम्मुख रख नित । चूस लेते हैं दूध सतत । धूर्त जैसे ॥ ८६ ॥ वैसे यज्ञका लेकर नाम । जगको दिखाकर धरम । लोगोंके चूस लेते हैं दाम । उपहार रूप ॥ ८७ ॥ सोचके अपना उत्कर्ष । होममें जो कुछ विशेष । उससे वे सर्व-नाश । चाहते औरोंका ॥ ८८ ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषंतोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥ आसुरी बर्तावसे अंतरात्माको दुःख होता है— आगे आगे भेरी फिर निशान । लगाके अपना दीक्षितपन । जगमें करते आप घोषण । भले रे हम भले ॥ ८९ ॥ ऐसे महत्त्वसे तब ये अधम । अहंतासे बनते महा-महिम । मानो काले पुटसे बनता तम । घोर अमावस काली ॥ ३९० ॥ इससे होती मूढता दृढ । बढती उद्दंडता उद्दंड । चढते अहंकारपे गाढ । पुट अविवेकके ॥ ९१ ॥ फिर दूसरोंकी भाष । करनेमें पूर्ण नाश । बल चढता विशेष । सामर्थ्यका ॥ ९२ ॥ भरके काम औ' क्रोध अहंता बल दर्पसे । मेरा स्व-पर देहोंमें करते द्वेष मत्सर ॥ १८ ॥ ६६१ देवासुर-संपद्विभाग-योग
ऐसे अहंकार बल । मिल करके सकल । दर्प सागर उछल- । आता असीम ॥ ९३ ॥ ऐसे उछलता हुवा दर्प । बढ़ाता काम-पित्त-प्रकोप । पाकर उसका फिर ताप । भड़कता क्रोधाग्नि ॥ ९४ ॥ तब मानो जेठका जलाता आतप । तथा तेल घीका साथ ले हो प्रकोप । होता अग्नि-वायुका तांडव-प्रताप । उसी भांति ॥ ९५ ॥ अहंकारके साथ बल । दर्प काम-क्रोधसे मिल । प्रकट हुवा जिस स्थल । पांडुकुमार ॥ ९६ ॥ ले अपना वे आदेश । रखेंगे क्या रीता शेष । करनेमें सर्व-नाश । कौनसा कहां ॥ ९७ ॥ पहले वे धनुर्धर । अपना मांस रुधिर । देंगे सब परमार । अभिचारार्थ ॥ ९८ ॥ जहां जलते हैं सब तन । उसमें जो “मैं” होता अर्जुन । उस “मैं” आत्मापे आक्रमण । होता है वह ॥ ९९ ॥ तथा ऐसा अभिचार होता कहां । उपद्रव उसके हो जहां तहां । मैं रूप चैतन्य होता वहां वहां । उसे होती पीड़ा ॥ ४०० ॥ रहते हैं जो अभिचारसे भिन्न । उनपे दोष-दृष्टिके पाषाण । फेंकते रहते हैं जो अर्जुन । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥ तभी मैं उनको दंड देता हूँ— सती तथा जो है सज्जन । दानशील याज्ञिक जन । तपस्वी अद्भुत महान । संन्यासी भी ॥ २ ॥ भक्त या होते हैं महात्मा । होते जो मेरा निज-धाम । आधार लेता नित धर्म । उनके सदनका ॥ ३ ॥ द्वेषसे भर ऐसों पर । कालकूटसे भरकर । अपशब्दोंके तीखे तीर । चलाते रहते हैं ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६२
तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥ इसभांति सभी प्रकारसे । बरतते हैं मेरे शत्रुसे । सुन तू मैं उन पापियोंसे । कैसे निपटता हूं ॥ ५ ॥ मानव-देहका ले आश्रय । करते हैं जगतका क्षय । वह पदवी मैं धनंजय । छीन लेता हूं ॥ ६ ॥ तथा फेंकता क्लेश-ग्रामके घूरे पर । अथवा भव-पुरके पन-घाट पर । उस तम-योनिमें ऐसे मूढोंको फिर । देता हूं जन्म ॥ ७ ॥ फिर आहारके नामसे जहां । घास भी नहीं उगता है वहां । व्याघ्र वृश्चिक सब आते कहां । वहां डालता ॥ ८ ॥ भूखके दुःखसे तडपते । अपने आपको तोड खाते । जनमते मरते रहते । उस स्थानपे ॥ ९ ॥ अपने ही विषसे जिनके । चर्म हैं जलते शरीरके । बिलमें रहते सिकुडके । सांप बन वह ॥ ४१० ॥ श्वास लेनेमें है जाता । जिनका समय पार्थ । आराम नहीं मिलता । उन दुर्जनोंको ॥ ११ ॥ ऐसे करोडों कल्प । गिननेमें है अल्प । उतना काल खप- । जाता उनका ॥ १२ ॥ उनको जिस स्थानपे है जाना । पहला पडाव है यह स्थान । आगेके होते हैं अति दारुण। दुःख उनके ॥ १३ ॥ आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौंतेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥ द्वेषी क्रूर तथा पापी जगमें हीन जो जन । उन्हें मैं फेंकता नित्य आसुरी योनिमें फिर ॥ १९ ॥ आसुरी योनियां पाके अनेक जन्म जन्ममें । मुझसे न मिले ही वे पाते जाते अधोगति ॥ २० ॥ ६६३ देवासुर-संपद्विभाग-योग
सुन उन्होंने इस भांति । कमाके आसुरी संपत्ति । पायी है ऐसी अधोगति । उसके बदलेमें ॥ १४ ॥ फिर व्याघ्रादि तामस । योनियोंमें है अल्पसा । देहधारण ढारस । मिलता है ॥ १५ ॥ वह भी मैं फिर छीन लेता । तब तमका ढेर बनाता । अंधारभी काला हो जाता । वहां पहुंचके ॥ १६ ॥ आसुरी लोगोंके लिये ज्ञानेश्वरकी करुणा— तब उससे पाप भी घिनाता । नरक भी उससे भय खाता । थकान श्रमसे मूर्छित होता । थककर जो ॥ १७ ॥ इनसे मल भी मलता । ताप भी इनसे तपता । इनके नामसे डरता । महा भय भी ॥ १८ ॥ पाप भी इनसे उकताता । अशुभ इनसे है अशोभता । भ्रष्टत्व भी इनसे है डरता । भ्रष्टाचारसे ॥ १९ ॥ विश्वमें जो अति हीन । अधम तम अर्जुन । भोगते वे सब स्थान । तामस योनिके ॥ ४२० ॥ रोती है वाचा कहनेमें कथा । स्मरणसे मन पीछे हठता । मूर्खोंने कितना जोडा है पार्था । यह पाप सारा ॥ २१ ॥ इसलिये कहू ये असुर । संपत्ति पोसते भयंकर । होती ऐसी अधोगति घोर । केवल मात्र ॥ २२ ॥ इसलिये तुझे धनुर्धर । जहां संपदा होती आसुर । मुडना भी कभी उस ओर । है अनुचित ॥ २३ ॥ तथा दंभादि छ दोष । करते हैं जहां वास । तजना है सहवास । उनका सदैव ॥ २४ ॥ त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥ काम क्रोध तथा लोभ करते आत्म-नाश जो । तीन ये नरक-द्वार टालना इनको नित ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६४
काम-क्रोधसे सदा-सर्वत्र दूर रहना चाहिये— काम-क्रोध तथा लोभ । फूटते तीनोंमें कोंभ । फलता वहां अशुभ । जान तू यह ॥ २५ ॥ समस्त दुःखोंका अर्जुन । करानेके लिये दर्शन । नियुक्त किये हैं ये तीन । पथ-दर्शक ॥ २६ ॥ या पापियोंको नरक-भोगमें । पहुँचानेके लिये जगतमें । पातकोंकी वीर परिषदमें । श्रेष्ठ ये तीन ॥ २७ ॥ रौरवादि नरक महान् । सुनाते नहीं कमी पुराण । जब तक न उठते तीन । हृदयमें ये ॥ २८ ॥ अपाय होते इससे सुलभ । होता है यातनाओंका लाभ । “हानी” हानी नहीं होती अशुभ । हानी ये तीन ॥ २९ ॥ क्या कहू मैं धनुर्धर । कहे ये निकृष्ट चोर । तथा नरकका द्वार । खुला हुवा ॥ ४३० ॥ काम-क्रोध लोभमें जीव । पोसता है जो निज-भाव । सम्मान पाता है पांडव । नरक-सभामें ॥ ३१ ॥ इसीलिये तू पुनःपुन । काम-क्रोध लोभ ये तीन । दक्ष रहके निशिदिन । तजना पार्थ ॥ ३२ ॥ एतैर्विमुक्तः कौंतेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥ पहले छोड इनका साथ । फिर है धर्मादि पुरुषार्थ । करनेकी बात है पार्थ । सोचना सारी ॥ ३३ ॥ हृदयमें ये तीन हैं जागृत । तबतक भलाई होगी प्राप्त । ऐसी नहीं सुनी गयी है बात । देवोंसे भी ॥ ३४ ॥ तमके द्वार ये तीन टालके छूटता जब । कल्याणमार्गसे जाके पाता है गति उत्तम ॥ २२ ॥ ६६५ देवासुर-संपद्विभाग-योग
अपनेसे है जिसकी प्रीति । तथा है आत्म-नाशकी भीति । न करना उसको संगति । इन तीनोंकी ॥ ३५ ॥ गलेमें बांधा कर पाषाण । करें सिंधुका अतिक्रमण । या जीनेके लिये है भोजन । करना कालकूट ॥ ३६ ॥ इन काम-क्रोध लोभका साथ । कार्य सिद्धिमें ऐसा है सतत । इसीलिये जड़-मूलसे पार्थ । मिटाना इसे ॥ ३७ ॥ इन तीनोंकी जब । कड़ी टूटेगी तब । अपनी राह सब । होगी प्राप्त ॥ ३८ ॥ त्रिदोषके छोडनेसे शरीर । त्रिकूटिका मिटनेसे नगर । त्रिदाह मिटनेसे है अंतर । शांत होता वैसे ॥ ३९ ॥ वैसे कामादिक जो ये तीन । तजते वे सुख पाते जान । मोक्ष-मार्गमें वे ही सज्जन- । संग पाते हैं ॥ ४४० ॥ सत्संगसे फिर प्रबल । तथा ले सत्शास्त्रका बल । पार होते वन सकल । जन्म-मृत्युके ॥ ४१ ॥ जिसमें आत्मानंद पूर्ण । बसता है वह सदन । तथा पाता है वह पट्टन । गुरु-कृपाका ॥ ४२ ॥ प्रिय-वस्तुओंकी जो परिसीमा । मिलती है वहां माउली आत्मा । तथा नहीं बजता है डिंडिम । संसारका वहां ॥ ४३ ॥ ऐसे जो काम-क्रोध लोभ । झाड़कर खड़ा है तब । स्वामी बन पाता है लाभ । इतने सारे ॥ ४४ ॥ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परांगतिम् ॥ २३ ॥ नहीं भाता जिसे यह कुछ । कामादिक ही है सब कुछ । इसीमें जाता है श्वपच । आत्मघाती वह ॥ ४५ ॥ छोड जो शास्त्रका मार्ग करता स्वैर-वर्तन । न पाता सिद्धिका मार्ग तथा सुख न सद्गति ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६६
जगमें जो समान सरूप । हिताहित दिखाता है दीप । वह अमान्य करता बाप- । वेदको जो ॥ ४६ ॥ आसुरी स्वैराचारी इह-परमें सुख शांति नहीं पा सकता— नहीं करता विधिका पालन । न है जिसको आत्म-हित भान । बढ़ाता जाता है भूख नित अर्जुन । इंद्रियोंकी जो ॥ ४७ ॥ कामादिकका आश्रय नहीं छोड़ूँगा । अपने वचनका पालन करूंगा । कहकर स्वेच्छाचार रत रहेगा । कुमार्गी जो ॥ ४८ ॥ मुक्ति-प्रवाहका नीर । नहीं पा सकेगा वह नर । स्वप्नमें भी यह धनुर्धर । असंभव जान ॥ ४९ ॥ गया ही उसका पर-लोक । किंतु सुख भी वह ऐहिक । भोग नहीं सकता तू देख । भली भांति ॥ ४५० ॥ मछलीकी आशासे ब्राह्मण । बन गया जो धीवर मान । वहां भी उसे नास्तिक जान । न लेंगे अपनेमें ॥ ५१ ॥ विषयका लोभ धरकर । खोता पारलौकिक जो नर । उसको यहांसे भी सत्वर । ले जाती मृत्यु ॥ ५२ ॥ ऐसे पर-लोकमें ना स्वर्ग । यहां भी नहीं सुखोपभोग । तब आयेगा कैसा प्रसंग । मोक्षका वहां ॥ ५३ ॥ तमी करके काम का बल । सुख-भोग चाहते सकल । वे दोनोंमें होते हैं विफल । न होता उद्धार ॥ ५४ ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥ वेद आज्ञाके अनुसार कर्तव्य करते जा— इस कारणसे अर्जुन । चाहता जो अपना कल्याण । वेदकी आज्ञाका उल्लंघन । न करें कभी ॥ ५५ ॥ व्यवस्था जान लेनेमें यहां कार्य अकार्यकी । जानके शास्त्रकी आज्ञा कर तू सब कर्मको ॥ २४ ॥ ३६७ देवासुर-संपद्विभाग-योग
जान कर पतिका मत । उसपे चलके सतत । सहज पाती आत्म-हित । पतिव्रता जैसे ॥ ५६ ॥ अथवा श्रीगुरुका वचन । करके नित परिपालन । कर लेना है आत्म-मंचन । अपना वैसे ॥ ५७ ॥ अंधेरेमें रखा कोई सामान । प्राप्त करलेना हो तो अर्जुन । सदा दीप करते हैं जान । आगे वैसे ॥ ५८ ॥ पुरुषार्थोंका संपूर्ण । स्वामी होना तो अर्जुन । श्रुति स्मृतिके वचन । मानना वंद्य ॥ ५९ ॥ शास्त्र कहता यदि कुछ तजना । राज्य सुख भोग भी तृण मानना । विष लेने कहता तो ना कहना । शब्द भी विरुद्ध ॥ ४६० ॥ ऐसी जिसकी वेदकी निष्ठा । स्थिर हुई तो देख सुभटा । होगी कैसी आहितकी भेट । कहां किसको ॥ ६१ ॥ अहितसे जो निकालती । हित करके जो बढाती । ऐसी दूसरी न दीखती । श्रुति-मातासी ॥ ६२ ॥ कराती यह ब्रह्मसे मिलन । न करना कभी अवहेलन । कर तू इसका सदा अर्जुन । विशेष आश्रय ॥ ६३ ॥ आज तू यहां है पार्थ । शास्त्रोंको सुनले सार्थ । जन्म लिया है हितार्थ । धर्म-कार्यके ॥ ६४ ॥ तथा धर्मानुज नामसे । बोध होता सहजतासे । इससे भिन्न कुछ ऐसे । करना नहीं ॥ ६५ ॥ कार्याकार्यका विवेक । करना शास्त्रोंको देख । अकृत्य जो कुछ देख । तजना उसे ॥ ६६ ॥ तथा जो कुछ है करणीय । दृढतासे उसका आश्रय । करके संपन्न धनंजय । करना उसको ॥ ६७ ॥ विश्व-प्रामाण्यकी जो है मुरी । आज तेरे हाथमें सुबुद्धी । लोक-संग्रहार्थ तू त्रिशुद्धी । योग्य है इससे ॥ ६८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६८
सोलहवे अध्यायका ज्ञानेश्वर कृत समालोचन— ऐसे आसुरी भाव संपूर्ण । तथा उसके सब लक्षण । कहे मुक्त होनेके साधन । कृष्णने पार्थसे ॥ ६९ ॥ इस पर वह पुत्र पांडुका । पूछेगा भाव अपने जीवका । सुनो वह सब दे चैतन्यका । कान बनाकर ॥ ४७० ॥ व्यास कृपासे संजय सुनाता । तथा इसे कुरु-नृप सुनता । श्रीगुरु कृपासे मैं सुनाता । इसको यहां ॥ ७१ ॥ आप संत-जन मेरी ओर । कृपा-वर्षा करें यहां पर । मैं आपकी मान्यतानुसार । बनूंगा स्वामी ॥ ७२ ॥ इसीलिये निज अवधान । मुझको देना पसायदान । जिससे बनूं सामर्थ्यवान । कहता ज्ञानदेव ॥ ७३ ॥ गीता श्लोक २४ ज्ञानेश्वरी ओवी ४७३ ॐ ६६९ देवासुर-संपद्विभाग-योग
१७ श्रद्धा - निरूपण - योग गणेशरूप गुरुवंदन— विश्व-विकसित-मुद्रा । छोड तेरी योग-निद्रा । नमन जीव-गणेंद्रा । सद्गुरु तुझे ॥ १ ॥ त्रिगुण-पुरमें जो घिरा गया । जीवत्व दुर्गमें अटका गया । वह आत्मा-शत्रुने छुडालिया । तेरे स्मरणसे ॥ २ ॥ तभी शिवसे करके तुलना । जान लिया तू है अति महान । मुमुक्षु - जीव करता तारण । तभी तू है हलका ॥ ३ ॥ तेरे विषयमें जो मूढ़ । उनको है तू वक्र-तुंड । ज्ञानियोंके लिये अखंड । सन्मुख ही तू ॥ ४ ॥ देखनेमें छोटी देवकी दृष्टि । किंतु मिलनोन्मिलनमें सृष्टि । करती सृष्टि लय दोनों गोष्टि । सहज लीलासे ॥ ५ ॥ प्रवृत्ति कर्णकी हलचलसे । छूटे मद गंधानिलसे । पूजा करते नील कमलसे । जीव-भ्रमरोंके ॥ ६ ॥ निवृत्ति कर्णके हिलनेसे फिर । पूजा वह सहज व्यर्थ होकर । दिखाता तब अपना अलंकार । खुले शरीरका ॥ ७ ॥ मानो वामांगीका लास्य विलास । जो है वही जगद्रूप आभास । तांडव नृत्य-कलाका विलास । दिखाता है तू ॥ ८ ॥ देख होता है यह चकित । होता है तू जिसका भी आप्त । आप्त व्यवहारसे विरत । होता है वह ॥ ९ ॥
मिटाता तू बंधनका ठाव । तमी तू जगद्बंधु यह भाव । तेरे लिये योग्य यह वैभव- । युत नाम ॥ १० ॥ द्वैतके नामसे जिसको । देह भी न रहे उसको । अपनासा किये तुमको । देवराय ॥ ११ ॥ पानेके लिये तुझको । दौड़ते जाते उनको । रखता सदा दूरको । अपनेसे तू ॥ १२ ॥ ध्यानसे लाता है जो मनमें । न होता तू उसके गांवमें । तुझे भूलता तो स्व-बोधमें । उसका होता तू ॥ १३ ॥ तू सिद्ध है जो न जानता । दिखाता वह सर्वज्ञता । वेदोंकी भी ऐसी जो वार्ता । नहीं सुनता तू ॥ १४ ॥ तेरा राशि-नाम है मौन । तब कैसे करूं स्तवन । देखना सब मिथ्या जान । नमन वैसे कैसे ॥ १५ ॥ यदि मैं सेवक बनना चाहता । भेद करनेसे मैं द्रोही बनता । इसलिये कुछ भी नहीं हो पाता । आपका मैं ॥ १६ ॥ सर्वथा कुछ भी नहीं होना । तुझ अद्वयकी प्राप्ति होना । तेरा यह मार्ग मैंने जाना । आराध्य-लिंग ॥ १७ ॥ अपनेको पूर्ण विलीन । करके रसमें लवण । भजना है वैसे नमन । मौनसे मेरा ॥ १८ ॥ रीता कुंभ जैसे सिंधुमें जाता । तथा पूर्ण भरके निकलता । अथवा दीप संगसे है बनता । बात भी दीप ॥ १९ ॥ करके तुझे मैं प्रणिपात । पूर्ण हुवा श्रीनिवृत्तिनाथ । करूंगा अब वह गीतार्थ । प्रकट मैं देव ॥ २० ॥ सोलवे अध्यायका समारोप और सत्रहवीकी भूमिका— सोलहवे अध्यायके अंतमें । उसके समाप्तिके श्लोकमें । ऐसा कहा निश्चितपनमें । परमात्माने ॥ २१ ॥ कार्याकार्यकी है जो व्यवस्था । आचरण करनेमें पार्था । मानना तुझे शास्त्र सर्वथा । प्रमाण एक ॥ २२ ॥ ६७१ श्रद्धा-निरूपण-योग
तब अर्जुनका मानस । कहता यह ऐसा कैसा । शास्त्रके बिना नहीं ऐसा । कर्मसे मुक्ति ॥ २३ ॥ तक्षकके फन परसे । निकाल लेना मणि कैसे । अथवा तोडें बाल कैसे । सिंहकी नाकका ॥ २४ ॥ मणि तब उसमें पिरोना । तथा अलंकारसे सजना । नहीं तो क्या वैसे ही रहना । खुले गलेसे ॥ २५ ॥ शास्त्रोंकी जो मत-भिन्नता । उसे कहो कौन जानता । होगी कैसी एक-वाक्यता । फलदायी उसकी ॥ २६ ॥ होने पर भी एक-वाक्यता । होगी क्या आचरण शक्यता । तथा जीवन होगा विस्तृत । इतना कैसे ॥ २७ ॥ तथा शास्त्र अर्थ देश काल । इन चारोंका जो एक फल । मिलेगा ऐसा योग सकल । किसको कब ॥ २८ ॥ तभी शास्त्रोचित घड़ना । असंभव है यह जान । अज्ञानी जो मुमुक्षु जन । उसकी गति क्या ? ॥ २९ ॥ पूछनेमें यह अर्जुन । करता है प्रस्ताव जान । आरंभ कहांसे कथन । करनेका ॥ ३० ॥ सबके विषयमें जो वितृष्ण । तथा सकल कलामें प्रवीण । कृष्णको आश्चर्य है जो कृष्ण । अर्जुनत्वमें ॥ ३१ ॥ शौर्यसे जुड़ा हुवा आधार । तथा सोम-वंशका शृंगार । सुखादिके लिये उपकार । जिसकी लीला ॥ ३२ ॥ प्रज्ञाका है जो प्रियतम । ब्रह्म विद्याका है विश्राम । सहचर औ' मनोधर्म । देवका है जो ॥ ३३ ॥ अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥ अर्जुनने कहा शास्त्रकी विधिको छोड श्रद्धासे पूजते जन । कौन सी उनकी निष्ठा सत्व या रज या तम ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ६७२