ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७ श्रद्धा - निरूपण - योग गणेशरूप गुरुवंदन— विश्व-विकसित-मुद्रा । छोड तेरी योग-निद्रा । नमन जीव-गणेंद्रा । सद्गुरु तुझे ॥ १ ॥ त्रिगुण-पुरमें जो घिरा गया । जीवत्व दुर्गमें अटका गया । वह आत्मा-शत्रुने छुडालिया । तेरे स्मरणसे ॥ २ ॥ तभी शिवसे करके तुलना । जान लिया तू है अति महान । मुमुक्षु - जीव करता तारण । तभी तू है हलका ॥ ३ ॥ तेरे विषयमें जो मूढ़ । उनको है तू वक्र-तुंड । ज्ञानियोंके लिये अखंड । सन्मुख ही तू ॥ ४ ॥ देखनेमें छोटी देवकी दृष्टि । किंतु मिलनोन्मिलनमें सृष्टि । करती सृष्टि लय दोनों गोष्टि । सहज लीलासे ॥ ५ ॥ प्रवृत्ति कर्णकी हलचलसे । छूटे मद गंधानिलसे । पूजा करते नील कमलसे । जीव-भ्रमरोंके ॥ ६ ॥ निवृत्ति कर्णके हिलनेसे फिर । पूजा वह सहज व्यर्थ होकर । दिखाता तब अपना अलंकार । खुले शरीरका ॥ ७ ॥ मानो वामांगीका लास्य विलास । जो है वही जगद्रूप आभास । तांडव नृत्य-कलाका विलास । दिखाता है तू ॥ ८ ॥ देख होता है यह चकित । होता है तू जिसका भी आप्त । आप्त व्यवहारसे विरत । होता है वह ॥ ९ ॥