भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 743

मिटाता तू बंधनका ठाव । तमी तू जगद्बंधु यह भाव । तेरे लिये योग्य यह वैभव- । युत नाम ॥ १० ॥ द्वैतके नामसे जिसको । देह भी न रहे उसको । अपनासा किये तुमको । देवराय ॥ ११ ॥ पानेके लिये तुझको । दौड़ते जाते उनको । रखता सदा दूरको । अपनेसे तू ॥ १२ ॥ ध्यानसे लाता है जो मनमें । न होता तू उसके गांवमें । तुझे भूलता तो स्व-बोधमें । उसका होता तू ॥ १३ ॥ तू सिद्ध है जो न जानता । दिखाता वह सर्वज्ञता । वेदोंकी भी ऐसी जो वार्ता । नहीं सुनता तू ॥ १४ ॥ तेरा राशि-नाम है मौन । तब कैसे करूं स्तवन । देखना सब मिथ्या जान । नमन वैसे कैसे ॥ १५ ॥ यदि मैं सेवक बनना चाहता । भेद करनेसे मैं द्रोही बनता । इसलिये कुछ भी नहीं हो पाता । आपका मैं ॥ १६ ॥ सर्वथा कुछ भी नहीं होना । तुझ अद्वयकी प्राप्ति होना । तेरा यह मार्ग मैंने जाना । आराध्य-लिंग ॥ १७ ॥ अपनेको पूर्ण विलीन । करके रसमें लवण । भजना है वैसे नमन । मौनसे मेरा ॥ १८ ॥ रीता कुंभ जैसे सिंधुमें जाता । तथा पूर्ण भरके निकलता । अथवा दीप संगसे है बनता । बात भी दीप ॥ १९ ॥ करके तुझे मैं प्रणिपात । पूर्ण हुवा श्रीनिवृत्तिनाथ । करूंगा अब वह गीतार्थ । प्रकट मैं देव ॥ २० ॥ सोलवे अध्यायका समारोप और सत्रहवीकी भूमिका— सोलहवे अध्यायके अंतमें । उसके समाप्तिके श्लोकमें । ऐसा कहा निश्चितपनमें । परमात्माने ॥ २१ ॥ कार्याकार्यकी है जो व्यवस्था । आचरण करनेमें पार्था । मानना तुझे शास्त्र सर्वथा । प्रमाण एक ॥ २२ ॥ ६७१ श्रद्धा-निरूपण-योग