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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

१७ श्रद्धा - निरूपण - योग गणेशरूप गुरुवंदन— विश्व-विकसित-मुद्रा । छोड तेरी योग-निद्रा । नमन जीव-गणेंद्रा । सद्गुरु तुझे ॥ १ ॥ त्रिगुण-पुरमें जो घिरा गया । जीवत्व दुर्गमें अटका गया । वह आत्मा-शत्रुने छुडालिया । तेरे स्मरणसे ॥ २ ॥ तभी शिवसे करके तुलना । जान लिया तू है अति महान । मुमुक्षु - जीव करता तारण । तभी तू है हलका ॥ ३ ॥ तेरे विषयमें जो मूढ़ । उनको है तू वक्र-तुंड । ज्ञानियोंके लिये अखंड । सन्मुख ही तू ॥ ४ ॥ देखनेमें छोटी देवकी दृष्टि । किंतु मिलनोन्मिलनमें सृष्टि । करती सृष्टि लय दोनों गोष्टि । सहज लीलासे ॥ ५ ॥ प्रवृत्ति कर्णकी हलचलसे । छूटे मद गंधानिलसे । पूजा करते नील कमलसे । जीव-भ्रमरोंके ॥ ६ ॥ निवृत्ति कर्णके हिलनेसे फिर । पूजा वह सहज व्यर्थ होकर । दिखाता तब अपना अलंकार । खुले शरीरका ॥ ७ ॥ मानो वामांगीका लास्य विलास । जो है वही जगद्रूप आभास । तांडव नृत्य-कलाका विलास । दिखाता है तू ॥ ८ ॥ देख होता है यह चकित । होता है तू जिसका भी आप्त । आप्त व्यवहारसे विरत । होता है वह ॥ ९ ॥

मिटाता तू बंधनका ठाव । तमी तू जगद्बंधु यह भाव । तेरे लिये योग्य यह वैभव- । युत नाम ॥ १० ॥ द्वैतके नामसे जिसको । देह भी न रहे उसको । अपनासा किये तुमको । देवराय ॥ ११ ॥ पानेके लिये तुझको । दौड़ते जाते उनको । रखता सदा दूरको । अपनेसे तू ॥ १२ ॥ ध्यानसे लाता है जो मनमें । न होता तू उसके गांवमें । तुझे भूलता तो स्व-बोधमें । उसका होता तू ॥ १३ ॥ तू सिद्ध है जो न जानता । दिखाता वह सर्वज्ञता । वेदोंकी भी ऐसी जो वार्ता । नहीं सुनता तू ॥ १४ ॥ तेरा राशि-नाम है मौन । तब कैसे करूं स्तवन । देखना सब मिथ्या जान । नमन वैसे कैसे ॥ १५ ॥ यदि मैं सेवक बनना चाहता । भेद करनेसे मैं द्रोही बनता । इसलिये कुछ भी नहीं हो पाता । आपका मैं ॥ १६ ॥ सर्वथा कुछ भी नहीं होना । तुझ अद्वयकी प्राप्ति होना । तेरा यह मार्ग मैंने जाना । आराध्य-लिंग ॥ १७ ॥ अपनेको पूर्ण विलीन । करके रसमें लवण । भजना है वैसे नमन । मौनसे मेरा ॥ १८ ॥ रीता कुंभ जैसे सिंधुमें जाता । तथा पूर्ण भरके निकलता । अथवा दीप संगसे है बनता । बात भी दीप ॥ १९ ॥ करके तुझे मैं प्रणिपात । पूर्ण हुवा श्रीनिवृत्तिनाथ । करूंगा अब वह गीतार्थ । प्रकट मैं देव ॥ २० ॥ सोलवे अध्यायका समारोप और सत्रहवीकी भूमिका— सोलहवे अध्यायके अंतमें । उसके समाप्तिके श्लोकमें । ऐसा कहा निश्चितपनमें । परमात्माने ॥ २१ ॥ कार्याकार्यकी है जो व्यवस्था । आचरण करनेमें पार्था । मानना तुझे शास्त्र सर्वथा । प्रमाण एक ॥ २२ ॥ ६७१ श्रद्धा-निरूपण-योग

तब अर्जुनका मानस । कहता यह ऐसा कैसा । शास्त्रके बिना नहीं ऐसा । कर्मसे मुक्ति ॥ २३ ॥ तक्षकके फन परसे । निकाल लेना मणि कैसे । अथवा तोडें बाल कैसे । सिंहकी नाकका ॥ २४ ॥ मणि तब उसमें पिरोना । तथा अलंकारसे सजना । नहीं तो क्या वैसे ही रहना । खुले गलेसे ॥ २५ ॥ शास्त्रोंकी जो मत-भिन्नता । उसे कहो कौन जानता । होगी कैसी एक-वाक्यता । फलदायी उसकी ॥ २६ ॥ होने पर भी एक-वाक्यता । होगी क्या आचरण शक्यता । तथा जीवन होगा विस्तृत । इतना कैसे ॥ २७ ॥ तथा शास्त्र अर्थ देश काल । इन चारोंका जो एक फल । मिलेगा ऐसा योग सकल । किसको कब ॥ २८ ॥ तभी शास्त्रोचित घड़ना । असंभव है यह जान । अज्ञानी जो मुमुक्षु जन । उसकी गति क्या ? ॥ २९ ॥ पूछनेमें यह अर्जुन । करता है प्रस्ताव जान । आरंभ कहांसे कथन । करनेका ॥ ३० ॥ सबके विषयमें जो वितृष्ण । तथा सकल कलामें प्रवीण । कृष्णको आश्चर्य है जो कृष्ण । अर्जुनत्वमें ॥ ३१ ॥ शौर्यसे जुड़ा हुवा आधार । तथा सोम-वंशका शृंगार । सुखादिके लिये उपकार । जिसकी लीला ॥ ३२ ॥ प्रज्ञाका है जो प्रियतम । ब्रह्म विद्याका है विश्राम । सहचर औ' मनोधर्म । देवका है जो ॥ ३३ ॥ अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥ अर्जुनने कहा शास्त्रकी विधिको छोड श्रद्धासे पूजते जन । कौन सी उनकी निष्ठा सत्व या रज या तम ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ६७२

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शास्त्ररहित श्रद्धापूर्वक पूजनेवालोंकी क्या गति होती है?-- अर्जुन कहे तमाल-श्याम । इंद्रियोंसे गोचर तू ब्रह्म । करते हैं तेरे शब्द-ग्राम । साशंक हमको ॥ ३४ ॥ अन्य नहीं शास्त्रके बिन । जीवका स्व-मोक्ष साधन । ऐसे कहता तू श्रीकृष्ण । किसभांति ॥ ३५ ॥ यदि न मिलता ऐसा देश । तथा नहीं काल अवकाश । करना ऐसा शास्त्राभ्यास । वह भी दूर ॥ ३६ ॥ तथा अभ्यासके जो साधन । वह भी प्राप्त नहीं है जान । ऐसेमें करें क्या कैसे कौन । अभ्यास उसका ॥ ३७ ॥ अनुकूल नहीं प्राचीन । प्रज्ञाका साथ जिसे जान । दूर है शास्त्र-संपादन । उसके लिये ॥ ३८ ॥ अजी ! मानते शास्त्रका विषय । नहीं मिलता एक भी आश्रय । इसीलिये जिन्होंने छोड दिया । शास्त्रका विचार ॥ ३९ ॥ किंतु निर्धार कर शास्त्र । अर्थानुष्ठानसे पवित्र । वास करते जो पात्र । सुख पूर्वक ॥ ४० ॥ उनका-सा हमको होना । ऐसे सोच चित्तमें जान । करते हैं आलंबन । उस मार्गका ॥ ४१ ॥ देखके पाठके अक्षर । करे बालक अनुसर । अंधा चलता आगे कर । भलेको जैसे ॥ ४२ ॥ वैसे सर्व शास्त्र निपुण । उनका देख आचरण । चलते हैं जान प्रमाण । श्रद्धासे आप ॥ ४३ ॥ फिर शिवाविक पूजन । तथा भूम्यादि महादान । अग्नि-होत्रादि जो यजन । करते श्रद्धासे ॥ ४४ ॥ उन्हे कह सत्य रज तम । किसमें गिनता पुरुषोत्तम । मिले उनको कौन गति हम । जाने कैसे ॥ ४५ ॥ वैकुंठ पीठका तब लिंग । निगम-पद्मका जो पराग । जिसकी अंग छाया है जग । जीवित जान ॥ ४६ ॥ (३२) ६७३: श्रद्धा-निरूपण-ओवि

कालसे सहज प्रचंड । तथा जो लोकोत्तर प्रौढ़ । अद्वितीय परम गूढ़ । आनंद-घन जो ॥ ४७ ॥ इन गुणोंसे कीर्तिमान । जहां यह सामर्थ्य पूर्ण बोलता ऐसे जो श्रीकृष्ण । स्वमुखसे यहां ॥ ४८ ॥ भगवान उवाच त्रिविधा भवति श्रध्दा देहिनां सा स्वभावजा । सात्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥ श्रध्दा भी तीन प्रकारकी होती है— कहता है श्रीहरि पार्थ ! तेरा भाव है मुझे ज्ञात । बाधक होती है बात । शास्त्राभ्यासकी ॥ ४९ ॥ केवल साधन मान श्रद्धा । पाना चाहो तो परम-पद । नहीं वह वैसे प्रबुद्ध । अज्ञात बात ॥ ५० ॥ श्रद्धा कहनेसे ही पार्थ । नहीं पायेगा सकलार्थ । द्विज क्या अंत्यजके साथ । न होगा अंत्यज ॥ ५१ ॥ हुवा भी यदि गंगोदक । मद्यके मटकेमें रख । लायेगा तो हो सके देख । पी सकता क्या ? ॥ ५२ ॥ चंदन होता है शीतल । किंतु अग्नि-ज्वालसे मिल । पकडा हुवा हाथ जल- । जायेगा न ? ॥ ५३ ॥ हीन कस सोनेके साथ । पुट दिया तो वह पार्थ । देगा शुद्ध सोनेका अर्थ । कभी वह ? ॥ ५४ ॥ ऐसे है श्रद्धाका जो स्वरूप । होता शुद्ध अपनेमें आप । किंतु मिलता है परंतप । जीवको जब ॥ ५५ ॥ श्रीभगवानने कहा पाता स्वभावसे प्राणि श्रद्धा तीन प्रकारकी । सुन सात्विक है होती तथा राजस तामस ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ६७५

स्वभावसे ही प्राणि जात । अनादि पापके पड हाथ । बन गये त्रिगुणके साथ । एक रूपसे ॥ ५६ ॥ उसमें पाते वे अवनति । तथा चाहते हैं वे उन्नति । होती है तब वैसी ही वृत्ति । जीवोंकी सब ॥ ५७ ॥ वृत्ति-सा तब संकल्प करते । संकल्प-सा सब कर्म करते । तथा कर्मानुसार ही करते । शरीर-धारण ॥ ५८ ॥ बीज मिटकर वृक्ष होता । फिर वृक्ष बीजमें समाता । कल्पोंसे ऐसे चलता आता । किंतु न नाशता वृक्ष ॥ ५९ ॥ उसी भांति है यहां अपार । होता रहता है जन्मांतर । त्रिगुणत्व अव्यभिचार । प्राणियोंके साथ ॥ ६० ॥ इसीलिये प्राणियोंके साथ । रहती है श्रद्धा जो सतत । जैसे होते गुण वैसे पार्थ । यह जान तू ॥ ६१ ॥ बढता कभी सत्वशुद्ध । ज्ञानकी चाह होती सिद्ध । किंतु दोनों होते विरुद्ध । यहां तब ॥ ६२ ॥ होती तब सत्य विषयक । श्रद्धा जो मोक्ष-फल दायक । किंतु रज तम सहायक । होंगे क्या कभी ॥ ६३ ॥ सत्वके बलको तोड कर । चढता रज आकाश पर । होती तब श्रद्धा कूडा घर । कर्म-उसका झाडू ॥ ६४ ॥ फिर उठती तमकी आग । करती है वह श्रद्धा भंग । तब चाहता विषय-भोग । भोगनेमें निषिद्ध ॥ ६५ ॥ सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ऐसे है सत्व रज तम । श्रद्धा-रूप जान सुधर्म । नहीं रखता जीव ग्राम । इससे कुछ भिन्न ॥ ६६ ॥ स्वभाव जिसका जैसे श्रद्धा वैसे मिले उसे । श्रद्धासे ही बना जीव श्रद्धा-सा वह भी रहा ॥ ३ ६७५ श्रद्धा-निरूपण-योग

इसीलिये श्रद्धा स्वाभाविक । रहती सदा त्रिगुणात्मक । रज तम तथा है सात्विक । भेद यहां जो ॥ ६७ ॥ जिस भांति है जीवन उदक । किंतु होता है विषमें मारक । अथवा होता है मिर्चमें तीव्र । ईखमें मधुर ॥ ६८ ॥ ऐसे पाता है जो जनम । या मरण साथ ले तम । उसका होता परिणाम । उसीका रूप ॥ ६९ ॥ जैसे काजल या हो मसी । उसमें न भिन्नता ऐसी । वैसे ही श्रद्धा जो तामसी । या तममें नहीं ॥ ७० ॥ वैसे श्रद्धा तमोगुणीमें । होती है तमके रूपमें । पूर्ण रूपसे सात्विकीमें । होती है सात्विक ॥ ७१ ॥ ऐसे है यह सकल । बसा है ब्रह्मांड गोल । श्रद्धा-मात्रसे केवल । ढाल करके ॥ ७२ ॥ किंतु गुणत्रयके कारण । किया त्रिविध-रूप धारण । श्रद्धाने भी यह साधारण । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥ फूलसे जैसे वृक्ष जाना जाता । या बोलसे मानस जाना जाता । या सुख दुःखसे जाना-जाता । पूर्व-संचित ॥ ७४ ॥ वैसे अब पांडुकुमार । जानना श्रद्धाके प्रकार । कहता हूं लक्ष्य दे कर । सुन तू सब ॥ ७५ ॥ यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः । प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजंते तामसा जनाः ॥ ४ ॥ श्रद्धाका विविध रूप— जिनकी सात्विक श्रद्धा । लेकर बनता बांधा । सदैव उनकी मेधा । रहती स्वर्गपे ॥ ७६ ॥ सत्वस्थ पूजते देव यक्ष राक्षस राजस । मृत प्रेतादि जो सारे पूजते लोग तामस ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ३७६

विद्या सभी वे पढ़ते । यज्ञ-क्रियायें करते । ऐसे वे जाके रहते । देव-लोकमें ॥ ७७ ॥ तथा श्रद्धा जो राजस । लेकर बने वीरेश । भजते हैं वे राक्षस । यक्षादिक सब ॥ ७८ ॥ श्रद्धा लेकर जो तामस । आये कहूंगा तेरे पास । केवल वे अति कर्कश । बने पापका ढेर ॥ ७९ ॥ जीव-वध कर अमंगल । बलि देके भूत-प्रेत कुल । स्मशानमें जाके संध्याकाल । पूजते जो ॥ ८० ॥ तमो-गुणका लेकर सार । बनाये जाते हैं जो नर । जान वे तमोगुणका घर । श्रद्धाका जो ॥ ८१ ॥ ऐसे हैं ये तीन लक्षण । जगमें दीखते हैं जान । यह मैं कहता अर्जुन । इसीलिये तुझे ॥ ८२ ॥ सात्विक श्रद्धावाला मनुष्य शास्त्रोंका अनुकरण करता है— यह जो है सात्विक श्रद्धा । जतन करना प्रबुद्धा । तथा है दोनोंके विरुद्ध । खड़ी करना ॥ ८३ ॥ यह सात्विक मति जिसकी । जोपासना करता उसकी । उसको नहीं मोक्ष-सिद्धिकी । कमी भीति ॥ ८४ ॥ नहीं सीखा वह ब्रह्म-सूत्र । तथा नहीं पढा कोई शास्त्र । सिद्धांत नहीं होता स्वतंत्र । उनके पास ॥ ८५ ॥ किंतु श्रुति-स्मृतिका अर्थ । बनते हैं वे स्वयं मूर्त । अनुष्ठानसे वे यथार्थ । देते हैं जगतको ॥ ८६ ॥ उनके आचरणके जो चरण । देख सात्विकी श्रद्धा अनुकरण । करके पाते फल असाधारण । निश्चित रूपसे ॥ ८७ ॥ दीप जलाता कोई कष्टसे जैसे । दूसरा दीप जला लेता उससे । दीप करेगा क्या कमी प्रकाशसे । उसको वंचित ॥ ८८ ॥ तथा किसीने धन अपार । व्यय कर बांधा अच्छा घर । अतिथि उसमें रह कर । सुख नहीं पाता क्या ? ॥ ८९ ॥ ६७७ श्रद्धा-निरूपण-योग

जाने दो कोई बांधता सरोवर । उसीकी तृषा हरता है क्या नीर । रसोई पाकानेवालेको ही घर । मिलता क्या अन्न ॥ ९० ॥ इससे अधिक क्या कहूंगा । गौतमकी लाई हुई गंगा । उससे वंचित है क्या जग । कह तू मुझसे ॥ ९१ ॥ तमी अपना अधिकार जान । करता जो शास्त्रोंका अनुष्ठान । श्रद्धासे उसका अनुकरण । कर तरता मूर्ख ॥ ९२ ॥ अशास्त्रविहितं घोरं तप्यंते ये तपो जनाः । दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥ अशास्त्रीय तामसिक श्रद्धा-तप— शास्त्रके नामसे भी जो पार्थ । न जानते आरंभकी बात । शास्त्रज्ञोंको रखते सतत । गांवके बाहर ॥ ९३ ॥ देख कर बडोंकी बात । करते हैं ठठोली तात । तथा देखके वे पंडित । बजाते चुटकियां ॥ ९४ ॥ करके बड़ा अभिमान । आचरते तपाचरण । दंभसे भरकर पूर्ण । पाखंड रचते ॥ ९५ ॥ दूसरोंके शरीरमें शस्त्र । चुभाके छील उसके गात्र । रक्तसे लेते प्रणीत-पात्र । भर भर कर ॥ ९६ ॥ वह रक्त आगमें गिराते । भूतके मुखमें भी लगाते । तथा बालकोंका बलि देते । उन भूतोंको ॥ ९७ ॥ आग्रहके बलपर । क्षुद्र देवताको धर । करते हैं सत्र घोर । अपाचारका ॥ ९८ ॥ अजी ! करके स्वपर पीडन । तम क्षेत्रमें बीज बोते जान । आगे पाते हैं वही वे अर्जुन । फलके रूपसे ॥ ९९ ॥ शास्त्र-निषिद्ध जो घोर दंभसे करते तप । अहंतासे भरे सारे काम राग बली जन ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६७८

पडा है समुद्रमें पार्थ । तैरने नहीं जो समर्थ । तथा नहीं उसके हाथ । और पांव भी ॥ १०० ॥ या वैद्यका द्वेष कर । औषध ठुकरा कर । होगा कैसे रोग दूर । किसीका कभी ॥ १ ॥ करके आंखोंसे विरोध । उन्हें फोडले प्रतिशोध । पड़ा रहता बन अंध । कोनेमें कहीं ॥ २ ॥ इसी प्रकार ये असुर । शास्त्रोंका करके धिःकार । करते हैं बन-संचार । अविवेकसे ॥ ३ ॥ काम जो कराता वह करते । क्रोध मरवाते उसे मारते । मुझे दुःखके गढेमें गाढ़ते । सभी ये लोग ॥ ४ ॥ कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥ अपने या पराये देहको । देते हैं वे दुःख जो उसको । भोगना होता मुझ आत्माको । पांडुकुमार ॥ ५ ॥ वाचाके भी अंचलसे । स्पर्श न करता जिसे । तजनेके लिये उसे । कहना पडा ॥ ६ ॥ स्पर्शसे जैसे प्रेत हटाते । शब्दसे चांडालको तजते । हाथ लगाकर जैसे धोते । मलको वैसे ॥ ७ ॥ वहां शुद्धिके ही हेतुसे । लेप नहीं मानते वैसे । उन्हे तजनेके हेतुसे । कहा यह यहां ॥ ८ ॥ होगा तुझे जब दर्शन । असुरोंका तब अर्जुन । करना मेरा ही स्मरण । प्रायश्चित्त रूप ॥ ९ ॥ तभी श्रद्धा जो सात्विक । जीव-भावसे हो एक । जतन करना नेक । सर्वतोपरी ॥ ११० ॥ गलाते मुझ आत्माको सोखके देह-धातुको । ऐसे विवेक-हीनोंकी निष्ठा है जान आसुरी ॥ ६ ॥ ६७९ श्रद्धा-निरुपण-योग

करना सदैव ऐसा संग । सत्व-पोषणका हो अंग । तथा सत्व-वृद्धिका हो भाग । लेना ऐसा अन्न ॥ ११ ॥ साधकके लिये आहारका महत्व— जो है अति-स्वाभाविक । स्वभाव वृद्धि कारक । आहारसे नहीं नेक । साधन शक्त ॥ १२ ॥ प्रत्यक्ष देख तू यहां वीर । भला मनुष्य सुरा पीकर । करता कैसे मत्त होकर । उसी क्षणमें ॥ १३ ॥ अथवा जो मनमाने अन्न-सेवन । करता तब वात-पित्तके कारण । या नव-ज्वरमें दूध होता अर्जुन । दुःख-दायक ॥ १४ ॥ अथवा अमृत जैसे । टालता मरण वैसे । तथा है विष लेनेसे । आती मृत्यू ॥ १५ ॥ वैसे ही लेनेसे जो आहार । लेता है धातु वही आकार । धातु जैसे वैसे ही अंतर । करता भाव पुष्ठ ॥ १६ ॥ या तपनेसै जैसे बर्तन । तपता अंदर जल जान । वैसे धातु वश है अर्जुन । चित्त-वृत्ति ॥ १७ ॥ इसीलिये सात्विक सेवन । करनेसे होगा वृद्धि सत्व-गुण । तथा रज तम रसका सेवन । बढाता है वही ॥ १८ ॥ तमी कौन सात्विक आहार । रज तमका क्या क्या आकार । कहता हूं यह धनुर्धर । आदरसे सुन ॥ १९ ॥ आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥ आहारका विविध रूप— उसी भांतिसे है आहार । हुए कैसे तीन प्रकार । तुझसे यह धनुर्धर । कहूंगा सुन ॥ १२० ॥ आहार भी सभीका है तीन भांति यथा रुचि । यज्ञ दान तपमें भी कहता भेद तू सुन ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८०

रुचि है कैसे खानेवालेकी । निष्पत्ति होती वैसे अन्नकी । तथा रुचि होती है गुणोंकी । दासी जान ॥ २१ ॥ जीव जो है कर्त्ता औ, भोक्ता । गुणोंसे वह स्वभावता । प्राप्त करके त्रिविधता । बरतता है ॥ २२ ॥ इसीलिये त्रिविध आहार । यज्ञ करता तीन प्रकार । तप दान आदि भी व्यापार । त्रिविध जान ॥ २३ ॥ पहले आहार लक्षण । कहता हूं सुन अर्जुन । स्पष्टतासे कर वर्णन । इस समय ॥ २४ ॥ आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ॥ ८ ॥ सात्विक आहारका विवेचन— सात्विक गुणकी ओर जब । दैवसे भोक्ता पढ़ता तब । उसका रस बढ़ता सब । मधुर रसमें ॥ २५ ॥ होते हैं जो रस-भरित । मधुर रसके पदार्थ । तथा मधुर स्निग्ध पार्थ । परिपक्व सहज ॥ २६ ॥ आकारमें होते सुंदर । स्पर्शमें भी होते मधुर । जीभको स्नेह मधुर । उसका स्पर्श ॥ २७ ॥ रससे जो भरित । द्रव-भावसे युक्त । अग्नि-स्पर्शसे मुक्त । ढीली छालका ॥ २८ ॥ अल्प-गात्र परिणाम महत्तर । होता जैसे गुरु-मुखका अक्षर । वैसे दीखता अल्प होता अपार । तृप्ति देनेमें ॥ २९ ॥ रुचिमें होता जैसे मधुर । स्वास्थ्यमें भी होता हितकर । ऐसा अन्न होता प्रियकर । सात्विकोंको ॥ १३० ॥ सत्व प्रीति सुख स्वास्थ्य आयुष्य बल-वर्धक । रसाल मधुर स्निग्ध स्थिर आहार सात्विक ॥ ८ ॥ ६८१ श्रद्धा-निरूपण-योग

ऐसे गुण लक्षण पूर्ण । होता है सात्विक भोजन । आयुष्यको देता है त्राण । नित्य-नया जो ॥ ३१ ॥ इस भांति है वह सात्विक रस । देहमें बरसता रात दिवस । जिससे आयुष्य नदी स-उल्लास । बढ़ती देहमें ॥ ३२ ॥ उनके सत्वका है पोषण । होता इसी अन्नके कारण । दिनके उन्नतिका साधन । भानु होता जैसे ॥ ३३ ॥ तथा शरीर और मन । समर्थ करता है अन्न । तब रोगका क्या कारण । रहता यहां ॥ ३४ ॥ होता जब सात्विक भोग्य । तब भोगते हैं आरोग्य । शरीरको मिला सौभाग्य । उदय होकर ॥ ३५ ॥ लेन देन होता सुखका । तथा उत्कर्ष भलाईका । बढ़ता स्नेह आनंदका । इससे सदैव ॥ ३६ ॥ ऐसा है सात्विक आहार । परिणाममें है मधुर । करता महा उपकार । अंतर्बाह्य ॥ ३७ ॥ राजसिक आहारका विवेचन— राजसकी जिसमें है प्रीति । जिस रसमें उसकी रति । करूंगा उसकी अभिव्यक्ति । प्रसंगसे अब ॥ ३८ ॥ कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥ कालकूट मृत्यु बिन । इतना कटु है मान । या चूनेसे भी अर्जुन । अधिक आम्ल ॥ ३९ ॥ आटेमें पानीके समान । कर नमकका मिलान । इसी भांति रसमें मान । डालते नमक ॥ १४० ॥ खारा सूखा कटू तीखा खट्टा अत्युष्ण दाहक । दुःख शोक तथा रोग देता आहार राजस ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८२

होता जो ऐसे नमकीन । राजसका प्रिय भोजन । निगलता अग्नि समान । उष्ण अतिशय ॥ ४१ ॥ भाफके छोर पर जैसे । रसके बात लगानेसे । बल पायेंगे दीप वैसे । भोजन उष्ण ॥ ४२ ॥ आंधीको पीछे ढकेलेगा । या साबल चुभ जायेगा । ऐसा तीता वह खायेगा । घावके बिन चुभता जो ॥ ४३ ॥ राखसा जो होता रूक्ष । व्यंजन होता है रूक्ष । जिव्हा दंशसा जो रूक्ष । भाता है उसे ॥ ४४ ॥ परस्परमें दांत । टकरायेेंगे साथ । ऐसे वस्तुसे पार्थ । तोषता वह ॥ ४५ ॥ पहले ही जो चटपटा होता । उसमें सरसों आदि पड़ता । जब उसको मुखमें डालता । नाकमें जाती बाफ ॥ ४६ ॥ आगको भी जो चुप करता । ऐसे बनता जो रायता । राजसको प्राणसे भी भाता । ऐसे व्यंजन ॥ ४७ ॥ कम मान जीभकी चुभन । जीभका वह पागल बन । भरता वह आगसा अन्न । अपने उदरमें ॥ ४८ ॥ भड़कती इससे आग अंदर । चैन न आता भूमि या सेज पर । पानीका पात्र नहीं होता है दूर । मुखसे कभी ॥ ४९ ॥ नहीं खाया था वह आहार । सोया हुवा व्याधि अजगर । चेतानेमें डाला मद्यसार । उदरमें अपने ॥ १५० ॥ होडमें उमडता परस्पर । एक साथ रोगोंको दे आधार । फलता ऐसे राजस आहार । दुःख रूप केवल ॥ ५१ ॥ ऐसे राजस आहार । दिखाया है धनुर्धर । परिणामका विचार । सविस्तृत ॥ ५२ ॥ तामसिक आहारका विवेचन— अब तामस जिसे खाता । उसे कैसा आहार भाता । उसको अब मैं कहता । न कर तू घृणा ॥ ५३ ॥ ६८३ श्रद्धा-निरूपण-योग

सडा गला तथा झूठना उसमें न अहित माना । चरती जैसे भैंस जाना वैसे खाता ॥ ५४ ॥ यातयामं गतरसं पूतिपर्युषितं च यत् । उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥ सबेरेका पका हुवा अन्न । दोपहरका दूसरे दिन । ऐसे लेता है वह भोजन । प्रेमसे तामस ॥ ५५ ॥ या आधा ही पका हुवा । या संपूर्ण जला हुवा । रस हीन बना हुवा । ऐसा वह खाता ॥ ५६ ॥ हुई जब रस-निष्पत्ति । मिठासकी हो अभिव्यक्ति । वह अन्न ऐसी प्रतीति । नहीं करता तामस ॥ ५७ ॥ कभी किसी प्रसंगसे । अच्छा अन्न मिलनेसे । बैठता है व्याघ्र जैसे । सडने तक ॥ ५८ ॥ पक कर हुवा बहु दिन । हुवा है वह स्वादसे हीन । सूखा या सडा हुवा अन्न । खाता वह प्रीतिसे ॥ ५९ ॥ ऐसे सड़ा हुवा अन्न । कीचड़सा करता सान । सबके साथही भोजन । करता एकत्र ॥ १६० ॥ ऐसे घिनौना वह जो खाता । उसे सुख भोजन मानता । इससे भी संतुष्ट नहीं होता । वह पापी ॥ ६१ ॥ देख तू यह चमत्कार । शास्त्र-निषिद्ध देखकर । निषिद्ध ही एकेक कर । लेता कुपथ्य ॥ ६२ ॥ अपेयका वह पान । अभोज्यका भोजन । करनेमें है अर्जुन । होता उतावला ॥ ६३ ॥ ऐसे तामस अन्न युक्त । होता है ऐसी आशा-युक्त । इसका फल भी तुरंत । मिलता उसको ॥ ६४ ॥ रस हीन तथा ठंडा बासी दुर्गंध-युक्त जो निषिद्ध और उच्छिष्ट आहार तामस-प्रिय ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी : ६८४

जमी छूता अपवित्र । अन्नको उसका वस्त्र । तभी वह पाप-पात्र । बनता है ॥ ६५ ॥ फिर इसके उपरांत । खानेकी उसकी रीत । उदर-पूर्तिकी सतत । यातना मान ॥ ६६ ॥ शिर छेदनेसे क्या मिलता । अग्नि-प्रवेशसे जो बनता । उसको वह नित सहता । धनुर्धर ॥ ६७ ॥ इसीलिये जो तामस अन्न । उसके फलका क्या कथन । उसको खाना ही दुःख जान । कहता देव ॥ ६८ ॥ यज्ञके भी तीन प्रकार हैं— जैसे तामस आहार । वैसे हैं यज्ञके प्रकार । वे भी होते तीन प्रकार । कहता हूं सुन ॥ ६९ ॥ इन तीनोंमें प्रथम । सात्विक यज्ञका मर्म । सुन यह सुमहिम । शिरोमणि तू ॥ १७० ॥ अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥ सात्विक यज्ञका विवेचन— जैसे है एक प्रियोत्तम । उसके बिन न हो काम । ऐसे जिसका मनोधर्म । पतिव्रताका ॥ ७१ ॥ गंगा सिंधुको छोड़कर । नहीं जाती है किसी ओर । तथा आत्माको देखकर । वेद होते मौन ॥ ७२ ॥ तथा स्व-हितमें जो होती । सदा निरत चित्त-वृत्ति । नहीं रहती अहंकृति । फल हेतु यहां ॥ ७३ ॥ पहुंच कर वृक्षका मूल । लौटना न चाहता जल । सूख जाता है वहीं केवल । उसी मूलमें ॥ ७४ ॥ तजके फलकी आशा मानके करणीय है । विधिसे मनसे जो है करते यज्ञ सात्विक ॥ ११ ॥ ६८५ श्रद्धा-निरूपण-योग

वैसे ही मन और तन । यजन निश्चयके स्थान । होकर सदैव विलीन । न चाहते कुछ ॥ ७५ ॥ फल अभिलाषा तजकर नित । स्वधर्म बिन अन्यमें हो विरक्त । करता है यज्ञ-कार्य अलंकृत । सर्वांग पूर्ण ॥ ७६ ॥ देखते हैं दर्पणमें जैसे । अपनी ही आंखोंकी ओरसे । या हथेली पर रत्न जैसे । दीपसे देखते ॥ ७७ ॥ या उदित होते ही दिवाकर । दीखते नाना पथ चहूं ओर । वैसे देखके वेदका निर्धार । चलता वह ॥ ७८ ॥ वह कुंड मंडप वेदी । अन्य भी साधन समृद्धि । पाता जैसी कहती विधि । वैसे वह सकल ॥ ७९ ॥ जैसे सब अलंकार यथा स्थान । शरीर पर करते हैं धारण । वैसे रखता वह स्वस्थान । योजन पूर्वक ॥ १८० ॥ करना क्या इसका वर्णन । देती यज्ञ विद्याही दर्शन । मूर्तिमंत हो आयी स्वस्थान । यज्ञ-हेतुसे ॥ ८१ ॥ वैसे सांगोपांग । होता है जो याग । अहंकृति भाग । डुबाकर ॥ ८२ ॥ कहते हैं उत्तम लक्षण । तुलसी वृक्षका क्षण क्षण । न रख कोई आशा अर्जुन । फल पुष्प छायाकी ॥ ८३ ॥ या होता है जो फलाशा बिन । योजना पूर्ण यज्ञ निर्माण । ऐसे यज्ञ करना जान । यज्ञ सात्विक ॥ ८४ ॥ अभिसंधाय तु फलं दंभार्थमपि चैव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥ राजसिक यज्ञका विवेचन— कहना यह भी अर्जुन । यज्ञ वैसे ही सुलक्षण । जैसे राजाको निमंत्रण । श्राद्धमें जैसे ॥ ८५ ॥ फलका अनुसंधान रखके दंभपूर्वक । होता यजन लोगोंमें जान तू यज्ञ राजस ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८६

राजा यदि घरमें आता । अन्य भी जो कार्य साधता । तथा है यश भी मिलता । होता है श्राद्ध ॥ ८६ ॥ करके ऐसा पूर्ण विचार । स्वर्ग मिलेगा मरने पर । तथा कीर्ति होगी यहां पर । यज्ञ दीक्षासे ॥ ८७ ॥ ऐसा फलाशासे केवल । किया यज्ञ-कर्म सकल । यश-कीर्ति जिसका मूल । यज्ञ है राजस ॥ ८८ ॥ विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम् । श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥ तामसिक यज्ञका विवेचन— पशु-पक्षियोंके व्याहमें कमी कहीं । कामके बिना ज्योतिषीका काम नहीं । वैसे तामसीके यज्ञमें सर्वत्र ही । आग्रहही मूल ॥ ८९ ॥ पवन राह नहीं चाहता । मरण मुहूर्त देखता । निषिद्धसे नहीं है डरता । अग्नि जैसे ॥ १९० ॥ वैसे हैं तामसके आचार । न मानता विधि-व्यवहार । इसीलिये वह धनुर्धर । होता उच्छृंखल ॥ ९१ ॥ विधि-विधान वहां नहीं होता । मंत्र-तंत्रका स्पर्श न रहता । अन्न मात्र भी वह नहीं देता । भैंस भी जो खाये ॥ ९२ ॥ शत्रु-बोध है जहां ब्राह्मण । वहां आयेगी कैसे दक्षिणा । आंधीमें आग साथ अर्जुन । ऐसे है वहां ॥ ९३ ॥ ऐसे वहां सभी व्यर्थ होता । श्रद्धाका मुख नहीं दीखता । वह घर जैसे लूटा जाता । निपुत्रिकका ॥ ९४ ॥ इस भांति होता यज्ञाभास । उसका नाम यज्ञ तामस । कहता है यह श्रीनिवास । धनुर्धरसे यहां ॥ ९५ ॥ न है विधि न है मंत्र अन्नोत्पत्ति नहीं जहां । नहीं श्रद्धा नहीं त्याग वह है यज्ञ तामस ॥ १३ ॥ ३८७ श्रद्धा-निरूपण-योग

जैसे गंगाका ही उदक । ले जाते भिन्न मार्गसे देख । तब मल एक शुद्धि एक । आता जैसे ॥ ९६ ॥ तपका स्वरूप— तथा तीन गुणोंसे तप । हुवा है यहां तीन रूप । करनेसे एक है पाप । उद्धरता दूजा ॥ ९७ ॥ तपके यहां तीन प्रकार । हुए हैं जैसे पांडुकुमार । यह जाननेमें ही सुकर । जान तू तप क्या है ॥ ९८ ॥ कहते हैं यहां तप किसको । समझाता हूं मैं यह तुझको । फिर उसके तीन प्रकारको । कहूंगा मैं ॥ ९९ ॥ तप है यहां जो सम्यक । वह भी त्रिविध रूपक । शारीरिक औ' मानसिक । तथा वाचिक भी ॥ २०० ॥ अब त्रिविध-तपमें सुन । शारीरिक तपका लक्षण । जिसे जो प्रिय हो उसे मान । शंभु या श्रीहरि ॥ १ ॥ देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥ शारीरिक तप सात्विक— जिसको प्रिय देवालय । यात्रादि करनेमें समय । आठौ प्रहर जैसे हैं पाय । चले काल-चक्रसे ॥ २ ॥ देवांगणकी रखने स्वच्छता । पूजोपचारमें नित रहता । तत्पर हो वह सब करता । हाथकी शोभा जान ॥ ३ ॥ लिंग या मूर्ति है देखता । अष्टांग प्रणाम करता । जैसे स्वाभाविक गिरता । कोई वस्तु ॥ ४ ॥ तथा विधि-विधानसे सतत । रहते जो वृद्ध गुणी निरत । प्राज्ञ ब्राह्मण आदिकी जो नित । करता सेवा ॥ ५ ॥ गुरु-देवादिकी पूजा स्वच्छता वीर्य-संग्रह । अहिंसा ऋजुता जान देहका तप है कहा ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८८

तथा प्रवास या पीडासे । थका मांदा जो मिला उसे । देता है वह शुश्रूषासे । सुख और शांति ॥ ६ ॥ सभी तीर्थका जो आधार । माता पिताका है शरीर । उनपर है निछावर । होता सेवामें ॥ ७ ॥ वैसे ही संसार जैसा दारुण । मिलते ही जो हरता थकान । ज्ञान-दानमें वह सकरुण । भजता गुरु ॥ ८ ॥ तथा अग्निमें जो स्वधर्मकी । मलिनता देह-अहंताकी । मिटाना पुट देके आवृत्तिकी । पुनः पुनः पार्थ ॥ ९ ॥ भूतजातमें वह वस्तुको जान । करता परोपकार औ' नमन । स्त्री-विषयमें करता क्षण क्षण । निग्रह मनका ॥ २१० ॥ जन्मके ही प्रसंग । स्पर्श हुवा स्त्री अंग । आगे है जन्म सांग । रखना शुद्ध ॥ ११ ॥ भूतजातमें एक । वस्तुको वह देख । नहीं जो तृण तक । करता भंग ॥ १२ ॥ इस भांतिका जब आचरण । करता रहता जिसका तन । तब उसमें खिला यह जान । शारीरिक तप ॥ १३ ॥ करना यह सब पार्थ । देहसे ही है विशेषता । तभी मैं उसको कहता । तप शारीरिक ॥ १४ ॥ एवं शारीरिक जो तप । दिखाया है उसका रूप । कहता हूं सुन निष्पाप । तप वाङ्मय ॥ १५ ॥ अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५॥ वाणीका तप सात्विक— लोहेका आकार तूक । न घटाकर कनक । करता कैसे है देख । पारस वैसे ॥ १६ ॥ हितार्थ बोलना सत्य प्रेमसे न खले कभी । स्वाध्याय करना नित्य वाणीका तप है कहा ॥ १५ ॥ ६८९ (३३) श्रद्धा-निरूपण-योग