ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजमी छूता अपवित्र । अन्नको उसका वस्त्र । तभी वह पाप-पात्र । बनता है ॥ ६५ ॥ फिर इसके उपरांत । खानेकी उसकी रीत । उदर-पूर्तिकी सतत । यातना मान ॥ ६६ ॥ शिर छेदनेसे क्या मिलता । अग्नि-प्रवेशसे जो बनता । उसको वह नित सहता । धनुर्धर ॥ ६७ ॥ इसीलिये जो तामस अन्न । उसके फलका क्या कथन । उसको खाना ही दुःख जान । कहता देव ॥ ६८ ॥ यज्ञके भी तीन प्रकार हैं— जैसे तामस आहार । वैसे हैं यज्ञके प्रकार । वे भी होते तीन प्रकार । कहता हूं सुन ॥ ६९ ॥ इन तीनोंमें प्रथम । सात्विक यज्ञका मर्म । सुन यह सुमहिम । शिरोमणि तू ॥ १७० ॥ अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥ सात्विक यज्ञका विवेचन— जैसे है एक प्रियोत्तम । उसके बिन न हो काम । ऐसे जिसका मनोधर्म । पतिव्रताका ॥ ७१ ॥ गंगा सिंधुको छोड़कर । नहीं जाती है किसी ओर । तथा आत्माको देखकर । वेद होते मौन ॥ ७२ ॥ तथा स्व-हितमें जो होती । सदा निरत चित्त-वृत्ति । नहीं रहती अहंकृति । फल हेतु यहां ॥ ७३ ॥ पहुंच कर वृक्षका मूल । लौटना न चाहता जल । सूख जाता है वहीं केवल । उसी मूलमें ॥ ७४ ॥ तजके फलकी आशा मानके करणीय है । विधिसे मनसे जो है करते यज्ञ सात्विक ॥ ११ ॥ ६८५ श्रद्धा-निरूपण-योग