ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे ही मन और तन । यजन निश्चयके स्थान । होकर सदैव विलीन । न चाहते कुछ ॥ ७५ ॥ फल अभिलाषा तजकर नित । स्वधर्म बिन अन्यमें हो विरक्त । करता है यज्ञ-कार्य अलंकृत । सर्वांग पूर्ण ॥ ७६ ॥ देखते हैं दर्पणमें जैसे । अपनी ही आंखोंकी ओरसे । या हथेली पर रत्न जैसे । दीपसे देखते ॥ ७७ ॥ या उदित होते ही दिवाकर । दीखते नाना पथ चहूं ओर । वैसे देखके वेदका निर्धार । चलता वह ॥ ७८ ॥ वह कुंड मंडप वेदी । अन्य भी साधन समृद्धि । पाता जैसी कहती विधि । वैसे वह सकल ॥ ७९ ॥ जैसे सब अलंकार यथा स्थान । शरीर पर करते हैं धारण । वैसे रखता वह स्वस्थान । योजन पूर्वक ॥ १८० ॥ करना क्या इसका वर्णन । देती यज्ञ विद्याही दर्शन । मूर्तिमंत हो आयी स्वस्थान । यज्ञ-हेतुसे ॥ ८१ ॥ वैसे सांगोपांग । होता है जो याग । अहंकृति भाग । डुबाकर ॥ ८२ ॥ कहते हैं उत्तम लक्षण । तुलसी वृक्षका क्षण क्षण । न रख कोई आशा अर्जुन । फल पुष्प छायाकी ॥ ८३ ॥ या होता है जो फलाशा बिन । योजना पूर्ण यज्ञ निर्माण । ऐसे यज्ञ करना जान । यज्ञ सात्विक ॥ ८४ ॥ अभिसंधाय तु फलं दंभार्थमपि चैव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥ राजसिक यज्ञका विवेचन— कहना यह भी अर्जुन । यज्ञ वैसे ही सुलक्षण । जैसे राजाको निमंत्रण । श्राद्धमें जैसे ॥ ८५ ॥ फलका अनुसंधान रखके दंभपूर्वक । होता यजन लोगोंमें जान तू यज्ञ राजस ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८६