भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 759, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 759

राजा यदि घरमें आता । अन्य भी जो कार्य साधता । तथा है यश भी मिलता । होता है श्राद्ध ॥ ८६ ॥ करके ऐसा पूर्ण विचार । स्वर्ग मिलेगा मरने पर । तथा कीर्ति होगी यहां पर । यज्ञ दीक्षासे ॥ ८७ ॥ ऐसा फलाशासे केवल । किया यज्ञ-कर्म सकल । यश-कीर्ति जिसका मूल । यज्ञ है राजस ॥ ८८ ॥ विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम् । श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥ तामसिक यज्ञका विवेचन— पशु-पक्षियोंके व्याहमें कमी कहीं । कामके बिना ज्योतिषीका काम नहीं । वैसे तामसीके यज्ञमें सर्वत्र ही । आग्रहही मूल ॥ ८९ ॥ पवन राह नहीं चाहता । मरण मुहूर्त देखता । निषिद्धसे नहीं है डरता । अग्नि जैसे ॥ १९० ॥ वैसे हैं तामसके आचार । न मानता विधि-व्यवहार । इसीलिये वह धनुर्धर । होता उच्छृंखल ॥ ९१ ॥ विधि-विधान वहां नहीं होता । मंत्र-तंत्रका स्पर्श न रहता । अन्न मात्र भी वह नहीं देता । भैंस भी जो खाये ॥ ९२ ॥ शत्रु-बोध है जहां ब्राह्मण । वहां आयेगी कैसे दक्षिणा । आंधीमें आग साथ अर्जुन । ऐसे है वहां ॥ ९३ ॥ ऐसे वहां सभी व्यर्थ होता । श्रद्धाका मुख नहीं दीखता । वह घर जैसे लूटा जाता । निपुत्रिकका ॥ ९४ ॥ इस भांति होता यज्ञाभास । उसका नाम यज्ञ तामस । कहता है यह श्रीनिवास । धनुर्धरसे यहां ॥ ९५ ॥ न है विधि न है मंत्र अन्नोत्पत्ति नहीं जहां । नहीं श्रद्धा नहीं त्याग वह है यज्ञ तामस ॥ १३ ॥ ३८७ श्रद्धा-निरूपण-योग