भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जैसे गंगाका ही उदक । ले जाते भिन्न मार्गसे देख । तब मल एक शुद्धि एक । आता जैसे ॥ ९६ ॥ तपका स्वरूप— तथा तीन गुणोंसे तप । हुवा है यहां तीन रूप । करनेसे एक है पाप । उद्धरता दूजा ॥ ९७ ॥ तपके यहां तीन प्रकार । हुए हैं जैसे पांडुकुमार । यह जाननेमें ही सुकर । जान तू तप क्या है ॥ ९८ ॥ कहते हैं यहां तप किसको । समझाता हूं मैं यह तुझको । फिर उसके तीन प्रकारको । कहूंगा मैं ॥ ९९ ॥ तप है यहां जो सम्यक । वह भी त्रिविध रूपक । शारीरिक औ' मानसिक । तथा वाचिक भी ॥ २०० ॥ अब त्रिविध-तपमें सुन । शारीरिक तपका लक्षण । जिसे जो प्रिय हो उसे मान । शंभु या श्रीहरि ॥ १ ॥ देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥ शारीरिक तप सात्विक— जिसको प्रिय देवालय । यात्रादि करनेमें समय । आठौ प्रहर जैसे हैं पाय । चले काल-चक्रसे ॥ २ ॥ देवांगणकी रखने स्वच्छता । पूजोपचारमें नित रहता । तत्पर हो वह सब करता । हाथकी शोभा जान ॥ ३ ॥ लिंग या मूर्ति है देखता । अष्टांग प्रणाम करता । जैसे स्वाभाविक गिरता । कोई वस्तु ॥ ४ ॥ तथा विधि-विधानसे सतत । रहते जो वृद्ध गुणी निरत । प्राज्ञ ब्राह्मण आदिकी जो नित । करता सेवा ॥ ५ ॥ गुरु-देवादिकी पूजा स्वच्छता वीर्य-संग्रह । अहिंसा ऋजुता जान देहका तप है कहा ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८८