भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तथा प्रवास या पीडासे । थका मांदा जो मिला उसे । देता है वह शुश्रूषासे । सुख और शांति ॥ ६ ॥ सभी तीर्थका जो आधार । माता पिताका है शरीर । उनपर है निछावर । होता सेवामें ॥ ७ ॥ वैसे ही संसार जैसा दारुण । मिलते ही जो हरता थकान । ज्ञान-दानमें वह सकरुण । भजता गुरु ॥ ८ ॥ तथा अग्निमें जो स्वधर्मकी । मलिनता देह-अहंताकी । मिटाना पुट देके आवृत्तिकी । पुनः पुनः पार्थ ॥ ९ ॥ भूतजातमें वह वस्तुको जान । करता परोपकार औ' नमन । स्त्री-विषयमें करता क्षण क्षण । निग्रह मनका ॥ २१० ॥ जन्मके ही प्रसंग । स्पर्श हुवा स्त्री अंग । आगे है जन्म सांग । रखना शुद्ध ॥ ११ ॥ भूतजातमें एक । वस्तुको वह देख । नहीं जो तृण तक । करता भंग ॥ १२ ॥ इस भांतिका जब आचरण । करता रहता जिसका तन । तब उसमें खिला यह जान । शारीरिक तप ॥ १३ ॥ करना यह सब पार्थ । देहसे ही है विशेषता । तभी मैं उसको कहता । तप शारीरिक ॥ १४ ॥ एवं शारीरिक जो तप । दिखाया है उसका रूप । कहता हूं सुन निष्पाप । तप वाङ्मय ॥ १५ ॥ अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५॥ वाणीका तप सात्विक— लोहेका आकार तूक । न घटाकर कनक । करता कैसे है देख । पारस वैसे ॥ १६ ॥ हितार्थ बोलना सत्य प्रेमसे न खले कभी । स्वाध्याय करना नित्य वाणीका तप है कहा ॥ १५ ॥ ६८९ (३३) श्रद्धा-निरूपण-योग