ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे जो नहीं दुखाता । जो सुनता सुख पाता । ऐसा ही वह बोलता । साधुतासे ॥ १७ ॥ पानी तो वृक्षको दिया जाता । किंतु पासका घास उगता । ऐसे है एकसे कहा जाता । होता सबका सुख ॥ १८ ॥ जैसे अमृतकी गंगा बहकर । करती है वह प्राणोंको अमर । स्नानसे पाप ताप विनाश कर । देती है शांति ॥ १९ ॥ वैसे है अविवेकको मिटाता । अपना अनादित्व दिलाता । पीयूषसा रुचि न विघडाता । सुननेवालेकी ॥ २२० ॥ जब कोई है पूछता । तब है ऐसा बोलता । या आवर्तन करता । नाम या निगम ॥ २१ ॥ ऋग्वेदादि जो है तीन । जा बसते वाग्भुवन । बनता जैसे वदन । ब्रह्मशाला ॥ २२ ॥ नहीं तो कोई भी नांव । शैव अथवा वैष्णव । बनाता वाचा वाग्भव । तप मानके ॥ २३ ॥ मानसिक तप, सात्विक— अब तप जो मानसिक । यह भी कहता हूं देख । कहे लोक-नाथ नायक । इस समय ॥ २४ ॥ मनःप्रसादःसौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥ सरोवरको यदि तरंग । तजते हैं आकाशको मेघ । या चंदन-वनको आग । उसी भांति ॥ २५ ॥ नाना कला-वैषम्य चंद्र । तजती चिंतायें नरेंद्र । अथवा है क्षीर समुद्र । मंदराचल ॥ २६ ॥ प्रसन्न वृत्ति सौम्यत्व आत्म-चिंतन संयम । भावना रखना शुद्ध मनका तप है कहा ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ६९०