ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसडा गला तथा झूठना उसमें न अहित माना । चरती जैसे भैंस जाना वैसे खाता ॥ ५४ ॥ यातयामं गतरसं पूतिपर्युषितं च यत् । उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥ सबेरेका पका हुवा अन्न । दोपहरका दूसरे दिन । ऐसे लेता है वह भोजन । प्रेमसे तामस ॥ ५५ ॥ या आधा ही पका हुवा । या संपूर्ण जला हुवा । रस हीन बना हुवा । ऐसा वह खाता ॥ ५६ ॥ हुई जब रस-निष्पत्ति । मिठासकी हो अभिव्यक्ति । वह अन्न ऐसी प्रतीति । नहीं करता तामस ॥ ५७ ॥ कभी किसी प्रसंगसे । अच्छा अन्न मिलनेसे । बैठता है व्याघ्र जैसे । सडने तक ॥ ५८ ॥ पक कर हुवा बहु दिन । हुवा है वह स्वादसे हीन । सूखा या सडा हुवा अन्न । खाता वह प्रीतिसे ॥ ५९ ॥ ऐसे सड़ा हुवा अन्न । कीचड़सा करता सान । सबके साथही भोजन । करता एकत्र ॥ १६० ॥ ऐसे घिनौना वह जो खाता । उसे सुख भोजन मानता । इससे भी संतुष्ट नहीं होता । वह पापी ॥ ६१ ॥ देख तू यह चमत्कार । शास्त्र-निषिद्ध देखकर । निषिद्ध ही एकेक कर । लेता कुपथ्य ॥ ६२ ॥ अपेयका वह पान । अभोज्यका भोजन । करनेमें है अर्जुन । होता उतावला ॥ ६३ ॥ ऐसे तामस अन्न युक्त । होता है ऐसी आशा-युक्त । इसका फल भी तुरंत । मिलता उसको ॥ ६४ ॥ रस हीन तथा ठंडा बासी दुर्गंध-युक्त जो निषिद्ध और उच्छिष्ट आहार तामस-प्रिय ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी : ६८४