भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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होता जो ऐसे नमकीन । राजसका प्रिय भोजन । निगलता अग्नि समान । उष्ण अतिशय ॥ ४१ ॥ भाफके छोर पर जैसे । रसके बात लगानेसे । बल पायेंगे दीप वैसे । भोजन उष्ण ॥ ४२ ॥ आंधीको पीछे ढकेलेगा । या साबल चुभ जायेगा । ऐसा तीता वह खायेगा । घावके बिन चुभता जो ॥ ४३ ॥ राखसा जो होता रूक्ष । व्यंजन होता है रूक्ष । जिव्हा दंशसा जो रूक्ष । भाता है उसे ॥ ४४ ॥ परस्परमें दांत । टकरायेेंगे साथ । ऐसे वस्तुसे पार्थ । तोषता वह ॥ ४५ ॥ पहले ही जो चटपटा होता । उसमें सरसों आदि पड़ता । जब उसको मुखमें डालता । नाकमें जाती बाफ ॥ ४६ ॥ आगको भी जो चुप करता । ऐसे बनता जो रायता । राजसको प्राणसे भी भाता । ऐसे व्यंजन ॥ ४७ ॥ कम मान जीभकी चुभन । जीभका वह पागल बन । भरता वह आगसा अन्न । अपने उदरमें ॥ ४८ ॥ भड़कती इससे आग अंदर । चैन न आता भूमि या सेज पर । पानीका पात्र नहीं होता है दूर । मुखसे कभी ॥ ४९ ॥ नहीं खाया था वह आहार । सोया हुवा व्याधि अजगर । चेतानेमें डाला मद्यसार । उदरमें अपने ॥ १५० ॥ होडमें उमडता परस्पर । एक साथ रोगोंको दे आधार । फलता ऐसे राजस आहार । दुःख रूप केवल ॥ ५१ ॥ ऐसे राजस आहार । दिखाया है धनुर्धर । परिणामका विचार । सविस्तृत ॥ ५२ ॥ तामसिक आहारका विवेचन— अब तामस जिसे खाता । उसे कैसा आहार भाता । उसको अब मैं कहता । न कर तू घृणा ॥ ५३ ॥ ६८३ श्रद्धा-निरूपण-योग