ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे गुण लक्षण पूर्ण । होता है सात्विक भोजन । आयुष्यको देता है त्राण । नित्य-नया जो ॥ ३१ ॥ इस भांति है वह सात्विक रस । देहमें बरसता रात दिवस । जिससे आयुष्य नदी स-उल्लास । बढ़ती देहमें ॥ ३२ ॥ उनके सत्वका है पोषण । होता इसी अन्नके कारण । दिनके उन्नतिका साधन । भानु होता जैसे ॥ ३३ ॥ तथा शरीर और मन । समर्थ करता है अन्न । तब रोगका क्या कारण । रहता यहां ॥ ३४ ॥ होता जब सात्विक भोग्य । तब भोगते हैं आरोग्य । शरीरको मिला सौभाग्य । उदय होकर ॥ ३५ ॥ लेन देन होता सुखका । तथा उत्कर्ष भलाईका । बढ़ता स्नेह आनंदका । इससे सदैव ॥ ३६ ॥ ऐसा है सात्विक आहार । परिणाममें है मधुर । करता महा उपकार । अंतर्बाह्य ॥ ३७ ॥ राजसिक आहारका विवेचन— राजसकी जिसमें है प्रीति । जिस रसमें उसकी रति । करूंगा उसकी अभिव्यक्ति । प्रसंगसे अब ॥ ३८ ॥ कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥ कालकूट मृत्यु बिन । इतना कटु है मान । या चूनेसे भी अर्जुन । अधिक आम्ल ॥ ३९ ॥ आटेमें पानीके समान । कर नमकका मिलान । इसी भांति रसमें मान । डालते नमक ॥ १४० ॥ खारा सूखा कटू तीखा खट्टा अत्युष्ण दाहक । दुःख शोक तथा रोग देता आहार राजस ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८२