भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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रुचि है कैसे खानेवालेकी । निष्पत्ति होती वैसे अन्नकी । तथा रुचि होती है गुणोंकी । दासी जान ॥ २१ ॥ जीव जो है कर्त्ता औ, भोक्ता । गुणोंसे वह स्वभावता । प्राप्त करके त्रिविधता । बरतता है ॥ २२ ॥ इसीलिये त्रिविध आहार । यज्ञ करता तीन प्रकार । तप दान आदि भी व्यापार । त्रिविध जान ॥ २३ ॥ पहले आहार लक्षण । कहता हूं सुन अर्जुन । स्पष्टतासे कर वर्णन । इस समय ॥ २४ ॥ आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ॥ ८ ॥ सात्विक आहारका विवेचन— सात्विक गुणकी ओर जब । दैवसे भोक्ता पढ़ता तब । उसका रस बढ़ता सब । मधुर रसमें ॥ २५ ॥ होते हैं जो रस-भरित । मधुर रसके पदार्थ । तथा मधुर स्निग्ध पार्थ । परिपक्व सहज ॥ २६ ॥ आकारमें होते सुंदर । स्पर्शमें भी होते मधुर । जीभको स्नेह मधुर । उसका स्पर्श ॥ २७ ॥ रससे जो भरित । द्रव-भावसे युक्त । अग्नि-स्पर्शसे मुक्त । ढीली छालका ॥ २८ ॥ अल्प-गात्र परिणाम महत्तर । होता जैसे गुरु-मुखका अक्षर । वैसे दीखता अल्प होता अपार । तृप्ति देनेमें ॥ २९ ॥ रुचिमें होता जैसे मधुर । स्वास्थ्यमें भी होता हितकर । ऐसा अन्न होता प्रियकर । सात्विकोंको ॥ १३० ॥ सत्व प्रीति सुख स्वास्थ्य आयुष्य बल-वर्धक । रसाल मधुर स्निग्ध स्थिर आहार सात्विक ॥ ८ ॥ ६८१ श्रद्धा-निरूपण-योग