भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जाने दो कोई बांधता सरोवर । उसीकी तृषा हरता है क्या नीर । रसोई पाकानेवालेको ही घर । मिलता क्या अन्न ॥ ९० ॥ इससे अधिक क्या कहूंगा । गौतमकी लाई हुई गंगा । उससे वंचित है क्या जग । कह तू मुझसे ॥ ९१ ॥ तमी अपना अधिकार जान । करता जो शास्त्रोंका अनुष्ठान । श्रद्धासे उसका अनुकरण । कर तरता मूर्ख ॥ ९२ ॥ अशास्त्रविहितं घोरं तप्यंते ये तपो जनाः । दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥ अशास्त्रीय तामसिक श्रद्धा-तप— शास्त्रके नामसे भी जो पार्थ । न जानते आरंभकी बात । शास्त्रज्ञोंको रखते सतत । गांवके बाहर ॥ ९३ ॥ देख कर बडोंकी बात । करते हैं ठठोली तात । तथा देखके वे पंडित । बजाते चुटकियां ॥ ९४ ॥ करके बड़ा अभिमान । आचरते तपाचरण । दंभसे भरकर पूर्ण । पाखंड रचते ॥ ९५ ॥ दूसरोंके शरीरमें शस्त्र । चुभाके छील उसके गात्र । रक्तसे लेते प्रणीत-पात्र । भर भर कर ॥ ९६ ॥ वह रक्त आगमें गिराते । भूतके मुखमें भी लगाते । तथा बालकोंका बलि देते । उन भूतोंको ॥ ९७ ॥ आग्रहके बलपर । क्षुद्र देवताको धर । करते हैं सत्र घोर । अपाचारका ॥ ९८ ॥ अजी ! करके स्वपर पीडन । तम क्षेत्रमें बीज बोते जान । आगे पाते हैं वही वे अर्जुन । फलके रूपसे ॥ ९९ ॥ शास्त्र-निषिद्ध जो घोर दंभसे करते तप । अहंतासे भरे सारे काम राग बली जन ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६७८