भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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विद्या सभी वे पढ़ते । यज्ञ-क्रियायें करते । ऐसे वे जाके रहते । देव-लोकमें ॥ ७७ ॥ तथा श्रद्धा जो राजस । लेकर बने वीरेश । भजते हैं वे राक्षस । यक्षादिक सब ॥ ७८ ॥ श्रद्धा लेकर जो तामस । आये कहूंगा तेरे पास । केवल वे अति कर्कश । बने पापका ढेर ॥ ७९ ॥ जीव-वध कर अमंगल । बलि देके भूत-प्रेत कुल । स्मशानमें जाके संध्याकाल । पूजते जो ॥ ८० ॥ तमो-गुणका लेकर सार । बनाये जाते हैं जो नर । जान वे तमोगुणका घर । श्रद्धाका जो ॥ ८१ ॥ ऐसे हैं ये तीन लक्षण । जगमें दीखते हैं जान । यह मैं कहता अर्जुन । इसीलिये तुझे ॥ ८२ ॥ सात्विक श्रद्धावाला मनुष्य शास्त्रोंका अनुकरण करता है— यह जो है सात्विक श्रद्धा । जतन करना प्रबुद्धा । तथा है दोनोंके विरुद्ध । खड़ी करना ॥ ८३ ॥ यह सात्विक मति जिसकी । जोपासना करता उसकी । उसको नहीं मोक्ष-सिद्धिकी । कमी भीति ॥ ८४ ॥ नहीं सीखा वह ब्रह्म-सूत्र । तथा नहीं पढा कोई शास्त्र । सिद्धांत नहीं होता स्वतंत्र । उनके पास ॥ ८५ ॥ किंतु श्रुति-स्मृतिका अर्थ । बनते हैं वे स्वयं मूर्त । अनुष्ठानसे वे यथार्थ । देते हैं जगतको ॥ ८६ ॥ उनके आचरणके जो चरण । देख सात्विकी श्रद्धा अनुकरण । करके पाते फल असाधारण । निश्चित रूपसे ॥ ८७ ॥ दीप जलाता कोई कष्टसे जैसे । दूसरा दीप जला लेता उससे । दीप करेगा क्या कमी प्रकाशसे । उसको वंचित ॥ ८८ ॥ तथा किसीने धन अपार । व्यय कर बांधा अच्छा घर । अतिथि उसमें रह कर । सुख नहीं पाता क्या ? ॥ ८९ ॥ ६७७ श्रद्धा-निरूपण-योग