ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजाल पाश तीर कुकर । भाला बाज छुरा लेकर । चला मानो चिडियामार । शिकार करने ॥ ४५ ॥ पालनेके लिये एक पेट । चिडियों पर ढाते संकट । ऐसा ही आचरण निकृष्ट । करते ये लोग ॥ ४६ ॥ कर पर-प्राण घात । कमाकर लाते वित्त । उससे हो कैसे चित्त । संतुष्ट किसका ॥ ४७ ॥ इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् । इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥ भोगार्थ असीम आशा और वैर— कहता है आज अर्जुन । कर लिया सबका धन । सहज अपने स्वाधीन । धन्य हूं मैं ॥ ४८ ॥ आत्म-श्लाघा भाव यह उत्पन्न । होनेसे बहता उसका मन । लूटूंगा कल औरोंका भी धन । कहता ऐसे ॥ ४९ ॥ ऐसे यह जुटाया मैने इतना । इसका आधार बनाके अपना । लाभमें पाऊंगा रही सही नाना । संपदा विश्वकी ॥ ३५० ॥ ऐसा विश्वका सब धन । करूंगा अपने स्वाधीन । फिर जिसके हो नयन । मिटा दूंगा ॥ ५१ ॥ असौ मया हतः शत्रुईनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥ मारे मैंने शत्रु जो कुछ । मारूंगा कल बचे जो तुच्छ । करूंगा शासन बन उच्च । अकेला ही मैं ॥ ५२ ॥ जुटाये आज ये लाभ जुटेंगे और भी कल । यह है वह भी होगा मेरी ही सब संपदा ॥ १३ ॥ मैने वह शत्रु मारा मारूंगा दूसरा फिर । स्वामी मैं और मैं भोक्ता सुखी मैं सिद्ध मैं बली ॥ १४ ॥ (31) ६५७ देवासुर-संपद्विभाग-योग