ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 730, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंबनके रहेंगे यदि मेरे दास । नहीं तो करूंगा मैं उनका नाश । अथवा मानो विश्वमें मैं हूं ईश । चराचरका सब ॥ ५३ ॥ इस भोग-भूमिका मैं प्रधान । सब सुख-भोगका मैं हूं स्थान । इंद्र भी देखके मनही मन । करेगा ईर्षा ॥ ५४ ॥ चाहूंगा मैं काया वाचा मन । होगा वह निश्चित संपन्न । मेरे बिना नहीं कोई जान । ऐसा आज्ञा-सिद्ध ॥ ५५ ॥ न देखा जब तक मेरा बल । तब तक बली है वह काल । मैं हूं सुखका सदन निश्चल । एक ही एक ॥ ५६ ॥ आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥ आसुरी लोगोंके अभिमानका रूप — होगा कुबेर महा संपन्न । किंतु नहीं है मेरे समान । संपन्नतामें मेरे समान । लक्ष्मीपति भी नहीं ॥ ५७ ॥ मेरे कुलकी उज्ज्वलता । जाति-गोतमें जो श्रेष्ठता । उसके सन्मुख अल्पता । दीखती ब्रह्माकी भी ॥ ५८ ॥ अपनी बढाई वे इस प्रकार । ईश्वरादिको भी व्यर्थ मानकर । अपनेको सर्व-श्रेष्ठ बताकर । करते रहते हैं ॥ ५९ ॥ लोप हुवा अब अभिचार । करूंगा उसका जीर्णोद्धार । प्रतिष्ठा करूंगा पर-मार । यज्ञकी अब ॥ ३६० ॥ मेरे गुण-गीत जो गायेंगे । नाट्यादिसे मुझे रिझायेंगे । जो मांगेंगे उसे वह देंगे । सभी वस्तु ॥ ६१ ॥ मादक अन्न पेय पानमें । प्रमदाओंके आलिंगनमें । बनूंगा मैं तीनों भुवनमें । आनंद-रूप ॥ ६२ ॥ मैं हूं कुलीन संपन्न कौन है मुझसा कहां । यज्ञ-दान-विलासी मैं मानते अज्ञ मोहसे ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी १५८