ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहूं मैं कितना तुझे अर्जुन । आसुरीके ऐसे पागलपन । सूंघा करते गगन-सुमन । ऐसे ही वे ॥ ६३ ॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । प्रसक्ताः कामभोगेषु पतंति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥ मोह-आंधीमें फंसकर तमांधमें चकर काटते रहते हैं— ज्वरमें भरके जैसे । भ्रमता है रोगी वैसे । बांधता है संकल्पसे । मनोरथ सारे ॥ ६४ ॥ अज्ञान-धूलमें भरकर । आशाकी आंधीमें उडकर । नभमें घूमते गरगर । मनोरथोंके ॥ ६५ ॥ अनियमित आकाशके मेघ । या सागरके तरंग अभंग । वैसे कामना कामके तरंग । उठते अखंड ॥ ६६ ॥ ऐसी ही जो कामनायें अती । हृदयमें लगायें रहती । उसी परसे खींची जाती । कमल-कलियां ॥ ६७ ॥ या पाषाणके सिरपर । पड फूटते हैं गागर । जीवन वैसे निरंतर । होता है फूटा ॥ ६८ ॥ बढती जाती जैसे रात । बढता है तम सतत । जीवमें ऐसे मोह नित । बंधता जाता है ॥ ६९॥ तथा बढता जैसे मोह । बनता विषयोंका गृह । विषयोंके लेते हैं थाह । पातक सारे ॥ ३७० ॥ अपने बलसे जब पाप । आते जहां एकत्र समीप । सभी नरक आते हैं आप । जीवनमें ही ॥ ७१ ॥ इसीलिये जान तू पार्थ । पालते जो कु-मनोरथ । बसते नरकमें नित । असुरलोग ॥ ७२ ॥ भ्रममें भरके ऐसे जकडे मोह-जालमें । गिरते विषयासक्त नरकमें अमंगल ॥ १६ ॥ ६५९ दैवासुर-संपद्विभाग-योग