ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहां असि-पत्रके तरुवर । पलते अंगारके डोंगर । तपे हुए तेलके सागर । उछलते हैं ॥ ७३ ॥ यातनाके जो नित नये प्रकार । समझानेके वहां यही आधार । मिलते हैं जो सदैव भयंकर । नरक-लोकमें ॥ ७४ ॥ ऐसे नरकके लिये भयंकर । जनम लिये जो लेके अधिकार । करते हैं वे भ्रममे पड़कर । यज्ञ याग ॥ ७५ ॥ वैसे यज्ञादिककी है जो क्रिया । देती अपना फल धनंजय । किंतु नाटकका-सा स्वांग लिया । पाया कुफल ॥ ७६ ॥ पतिका करके जो आश्रय । प्रियकरकी होकर प्रिय । मनमें मानती धनंजय । सौभाग्यवती आप ॥ ७७ ॥ आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजंते नामयज्ञैस्ते दंभेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥ उपहार लूटनेके लिये यज्ञ करते हैं— अपने आपको मन ही मन । पूजके अपना महंतपन । फूलता जाता है असाधारण । अहंमन्यतामें ॥ ७८ ॥ नहीं जानते झुकना कैसे । लोहेके ढले हुये स्तंभ जैसे । या गगन-चुंबी शिखर जैसे । खडे हैं पाषाणके ॥ ७९ ॥ अपनी ही सज्जनतासे आप । मनमें ही संतुष्ट हो अमाप । तिनकासा मानते परंतप । सारे विश्वको ॥ ३८० ॥ धनकी मदिरा फिर । पीनेसे मस्त हो कर । कृत्याकृत्य भूलकर । सबसे होते भिन्न ॥ ८१ ॥ जहां जुटी संपदा इस भांति । वहां यज्ञकी बात कैसे आती । किंतु पगलेको क्या न सूझती । किस समय ॥ ८२ ॥ स्वयं-पूजित गर्विष्ठ मदांध धन-मानमें । नामके करते यज्ञ दंभसे अन्यवस्थित ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६०