ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे वे कभी किसी समय । मद्य मौढ्यमें आ धनंजय । करते यज्ञका दंभमय । सारा स्वांग ॥ ८३ ॥ न कुंड न मंडप न वेदी । न उचित साधन समृद्धी । तथा उसकी न कुछ विधी । जिससे द्वेष ही सदा ॥ ८४ ॥ देव ब्राह्मणोंके नामका मान । गंध भी उसे न होता सहन । तब वहां आयेगा कैसे कौन । अपने मनसे ॥ ८५ ॥ बछियाका बनाकर भूत । गायके सम्मुख रख नित । चूस लेते हैं दूध सतत । धूर्त जैसे ॥ ८६ ॥ वैसे यज्ञका लेकर नाम । जगको दिखाकर धरम । लोगोंके चूस लेते हैं दाम । उपहार रूप ॥ ८७ ॥ सोचके अपना उत्कर्ष । होममें जो कुछ विशेष । उससे वे सर्व-नाश । चाहते औरोंका ॥ ८८ ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषंतोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥ आसुरी बर्तावसे अंतरात्माको दुःख होता है— आगे आगे भेरी फिर निशान । लगाके अपना दीक्षितपन । जगमें करते आप घोषण । भले रे हम भले ॥ ८९ ॥ ऐसे महत्त्वसे तब ये अधम । अहंतासे बनते महा-महिम । मानो काले पुटसे बनता तम । घोर अमावस काली ॥ ३९० ॥ इससे होती मूढता दृढ । बढती उद्दंडता उद्दंड । चढते अहंकारपे गाढ । पुट अविवेकके ॥ ९१ ॥ फिर दूसरोंकी भाष । करनेमें पूर्ण नाश । बल चढता विशेष । सामर्थ्यका ॥ ९२ ॥ भरके काम औ' क्रोध अहंता बल दर्पसे । मेरा स्व-पर देहोंमें करते द्वेष मत्सर ॥ १८ ॥ ६६१ देवासुर-संपद्विभाग-योग