भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 734, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 734

ऐसे अहंकार बल । मिल करके सकल । दर्प सागर उछल- । आता असीम ॥ ९३ ॥ ऐसे उछलता हुवा दर्प । बढ़ाता काम-पित्त-प्रकोप । पाकर उसका फिर ताप । भड़कता क्रोधाग्नि ॥ ९४ ॥ तब मानो जेठका जलाता आतप । तथा तेल घीका साथ ले हो प्रकोप । होता अग्नि-वायुका तांडव-प्रताप । उसी भांति ॥ ९५ ॥ अहंकारके साथ बल । दर्प काम-क्रोधसे मिल । प्रकट हुवा जिस स्थल । पांडुकुमार ॥ ९६ ॥ ले अपना वे आदेश । रखेंगे क्या रीता शेष । करनेमें सर्व-नाश । कौनसा कहां ॥ ९७ ॥ पहले वे धनुर्धर । अपना मांस रुधिर । देंगे सब परमार । अभिचारार्थ ॥ ९८ ॥ जहां जलते हैं सब तन । उसमें जो “मैं” होता अर्जुन । उस “मैं” आत्मापे आक्रमण । होता है वह ॥ ९९ ॥ तथा ऐसा अभिचार होता कहां । उपद्रव उसके हो जहां तहां । मैं रूप चैतन्य होता वहां वहां । उसे होती पीड़ा ॥ ४०० ॥ रहते हैं जो अभिचारसे भिन्न । उनपे दोष-दृष्टिके पाषाण । फेंकते रहते हैं जो अर्जुन । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥ तभी मैं उनको दंड देता हूँ— सती तथा जो है सज्जन । दानशील याज्ञिक जन । तपस्वी अद्भुत महान । संन्यासी भी ॥ २ ॥ भक्त या होते हैं महात्मा । होते जो मेरा निज-धाम । आधार लेता नित धर्म । उनके सदनका ॥ ३ ॥ द्वेषसे भर ऐसों पर । कालकूटसे भरकर । अपशब्दोंके तीखे तीर । चलाते रहते हैं ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६२