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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

जैसे वे कभी किसी समय । मद्य मौढ्यमें आ धनंजय । करते यज्ञका दंभमय । सारा स्वांग ॥ ८३ ॥ न कुंड न मंडप न वेदी । न उचित साधन समृद्धी । तथा उसकी न कुछ विधी । जिससे द्वेष ही सदा ॥ ८४ ॥ देव ब्राह्मणोंके नामका मान । गंध भी उसे न होता सहन । तब वहां आयेगा कैसे कौन । अपने मनसे ॥ ८५ ॥ बछियाका बनाकर भूत । गायके सम्मुख रख नित । चूस लेते हैं दूध सतत । धूर्त जैसे ॥ ८६ ॥ वैसे यज्ञका लेकर नाम । जगको दिखाकर धरम । लोगोंके चूस लेते हैं दाम । उपहार रूप ॥ ८७ ॥ सोचके अपना उत्कर्ष । होममें जो कुछ विशेष । उससे वे सर्व-नाश । चाहते औरोंका ॥ ८८ ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषंतोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥ आसुरी बर्तावसे अंतरात्माको दुःख होता है— आगे आगे भेरी फिर निशान । लगाके अपना दीक्षितपन । जगमें करते आप घोषण । भले रे हम भले ॥ ८९ ॥ ऐसे महत्त्वसे तब ये अधम । अहंतासे बनते महा-महिम । मानो काले पुटसे बनता तम । घोर अमावस काली ॥ ३९० ॥ इससे होती मूढता दृढ । बढती उद्दंडता उद्दंड । चढते अहंकारपे गाढ । पुट अविवेकके ॥ ९१ ॥ फिर दूसरोंकी भाष । करनेमें पूर्ण नाश । बल चढता विशेष । सामर्थ्यका ॥ ९२ ॥ भरके काम औ' क्रोध अहंता बल दर्पसे । मेरा स्व-पर देहोंमें करते द्वेष मत्सर ॥ १८ ॥ ६६१ देवासुर-संपद्विभाग-योग

ऐसे अहंकार बल । मिल करके सकल । दर्प सागर उछल- । आता असीम ॥ ९३ ॥ ऐसे उछलता हुवा दर्प । बढ़ाता काम-पित्त-प्रकोप । पाकर उसका फिर ताप । भड़कता क्रोधाग्नि ॥ ९४ ॥ तब मानो जेठका जलाता आतप । तथा तेल घीका साथ ले हो प्रकोप । होता अग्नि-वायुका तांडव-प्रताप । उसी भांति ॥ ९५ ॥ अहंकारके साथ बल । दर्प काम-क्रोधसे मिल । प्रकट हुवा जिस स्थल । पांडुकुमार ॥ ९६ ॥ ले अपना वे आदेश । रखेंगे क्या रीता शेष । करनेमें सर्व-नाश । कौनसा कहां ॥ ९७ ॥ पहले वे धनुर्धर । अपना मांस रुधिर । देंगे सब परमार । अभिचारार्थ ॥ ९८ ॥ जहां जलते हैं सब तन । उसमें जो “मैं” होता अर्जुन । उस “मैं” आत्मापे आक्रमण । होता है वह ॥ ९९ ॥ तथा ऐसा अभिचार होता कहां । उपद्रव उसके हो जहां तहां । मैं रूप चैतन्य होता वहां वहां । उसे होती पीड़ा ॥ ४०० ॥ रहते हैं जो अभिचारसे भिन्न । उनपे दोष-दृष्टिके पाषाण । फेंकते रहते हैं जो अर्जुन । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥ तभी मैं उनको दंड देता हूँ— सती तथा जो है सज्जन । दानशील याज्ञिक जन । तपस्वी अद्भुत महान । संन्यासी भी ॥ २ ॥ भक्त या होते हैं महात्मा । होते जो मेरा निज-धाम । आधार लेता नित धर्म । उनके सदनका ॥ ३ ॥ द्वेषसे भर ऐसों पर । कालकूटसे भरकर । अपशब्दोंके तीखे तीर । चलाते रहते हैं ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६२

तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥ इसभांति सभी प्रकारसे । बरतते हैं मेरे शत्रुसे । सुन तू मैं उन पापियोंसे । कैसे निपटता हूं ॥ ५ ॥ मानव-देहका ले आश्रय । करते हैं जगतका क्षय । वह पदवी मैं धनंजय । छीन लेता हूं ॥ ६ ॥ तथा फेंकता क्लेश-ग्रामके घूरे पर । अथवा भव-पुरके पन-घाट पर । उस तम-योनिमें ऐसे मूढोंको फिर । देता हूं जन्म ॥ ७ ॥ फिर आहारके नामसे जहां । घास भी नहीं उगता है वहां । व्याघ्र वृश्चिक सब आते कहां । वहां डालता ॥ ८ ॥ भूखके दुःखसे तडपते । अपने आपको तोड खाते । जनमते मरते रहते । उस स्थानपे ॥ ९ ॥ अपने ही विषसे जिनके । चर्म हैं जलते शरीरके । बिलमें रहते सिकुडके । सांप बन वह ॥ ४१० ॥ श्वास लेनेमें है जाता । जिनका समय पार्थ । आराम नहीं मिलता । उन दुर्जनोंको ॥ ११ ॥ ऐसे करोडों कल्प । गिननेमें है अल्प । उतना काल खप- । जाता उनका ॥ १२ ॥ उनको जिस स्थानपे है जाना । पहला पडाव है यह स्थान । आगेके होते हैं अति दारुण। दुःख उनके ॥ १३ ॥ आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौंतेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥ द्वेषी क्रूर तथा पापी जगमें हीन जो जन । उन्हें मैं फेंकता नित्य आसुरी योनिमें फिर ॥ १९ ॥ आसुरी योनियां पाके अनेक जन्म जन्ममें । मुझसे न मिले ही वे पाते जाते अधोगति ॥ २० ॥ ६६३ देवासुर-संपद्विभाग-योग

सुन उन्होंने इस भांति । कमाके आसुरी संपत्ति । पायी है ऐसी अधोगति । उसके बदलेमें ॥ १४ ॥ फिर व्याघ्रादि तामस । योनियोंमें है अल्पसा । देहधारण ढारस । मिलता है ॥ १५ ॥ वह भी मैं फिर छीन लेता । तब तमका ढेर बनाता । अंधारभी काला हो जाता । वहां पहुंचके ॥ १६ ॥ आसुरी लोगोंके लिये ज्ञानेश्वरकी करुणा— तब उससे पाप भी घिनाता । नरक भी उससे भय खाता । थकान श्रमसे मूर्छित होता । थककर जो ॥ १७ ॥ इनसे मल भी मलता । ताप भी इनसे तपता । इनके नामसे डरता । महा भय भी ॥ १८ ॥ पाप भी इनसे उकताता । अशुभ इनसे है अशोभता । भ्रष्टत्व भी इनसे है डरता । भ्रष्टाचारसे ॥ १९ ॥ विश्वमें जो अति हीन । अधम तम अर्जुन । भोगते वे सब स्थान । तामस योनिके ॥ ४२० ॥ रोती है वाचा कहनेमें कथा । स्मरणसे मन पीछे हठता । मूर्खोंने कितना जोडा है पार्था । यह पाप सारा ॥ २१ ॥ इसलिये कहू ये असुर । संपत्ति पोसते भयंकर । होती ऐसी अधोगति घोर । केवल मात्र ॥ २२ ॥ इसलिये तुझे धनुर्धर । जहां संपदा होती आसुर । मुडना भी कभी उस ओर । है अनुचित ॥ २३ ॥ तथा दंभादि छ दोष । करते हैं जहां वास । तजना है सहवास । उनका सदैव ॥ २४ ॥ त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥ काम क्रोध तथा लोभ करते आत्म-नाश जो । तीन ये नरक-द्वार टालना इनको नित ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६४

काम-क्रोधसे सदा-सर्वत्र दूर रहना चाहिये— काम-क्रोध तथा लोभ । फूटते तीनोंमें कोंभ । फलता वहां अशुभ । जान तू यह ॥ २५ ॥ समस्त दुःखोंका अर्जुन । करानेके लिये दर्शन । नियुक्त किये हैं ये तीन । पथ-दर्शक ॥ २६ ॥ या पापियोंको नरक-भोगमें । पहुँचानेके लिये जगतमें । पातकोंकी वीर परिषदमें । श्रेष्ठ ये तीन ॥ २७ ॥ रौरवादि नरक महान् । सुनाते नहीं कमी पुराण । जब तक न उठते तीन । हृदयमें ये ॥ २८ ॥ अपाय होते इससे सुलभ । होता है यातनाओंका लाभ । “हानी” हानी नहीं होती अशुभ । हानी ये तीन ॥ २९ ॥ क्या कहू मैं धनुर्धर । कहे ये निकृष्ट चोर । तथा नरकका द्वार । खुला हुवा ॥ ४३० ॥ काम-क्रोध लोभमें जीव । पोसता है जो निज-भाव । सम्मान पाता है पांडव । नरक-सभामें ॥ ३१ ॥ इसीलिये तू पुनःपुन । काम-क्रोध लोभ ये तीन । दक्ष रहके निशिदिन । तजना पार्थ ॥ ३२ ॥ एतैर्विमुक्तः कौंतेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥ पहले छोड इनका साथ । फिर है धर्मादि पुरुषार्थ । करनेकी बात है पार्थ । सोचना सारी ॥ ३३ ॥ हृदयमें ये तीन हैं जागृत । तबतक भलाई होगी प्राप्त । ऐसी नहीं सुनी गयी है बात । देवोंसे भी ॥ ३४ ॥ तमके द्वार ये तीन टालके छूटता जब । कल्याणमार्गसे जाके पाता है गति उत्तम ॥ २२ ॥ ६६५ देवासुर-संपद्विभाग-योग

अपनेसे है जिसकी प्रीति । तथा है आत्म-नाशकी भीति । न करना उसको संगति । इन तीनोंकी ॥ ३५ ॥ गलेमें बांधा कर पाषाण । करें सिंधुका अतिक्रमण । या जीनेके लिये है भोजन । करना कालकूट ॥ ३६ ॥ इन काम-क्रोध लोभका साथ । कार्य सिद्धिमें ऐसा है सतत । इसीलिये जड़-मूलसे पार्थ । मिटाना इसे ॥ ३७ ॥ इन तीनोंकी जब । कड़ी टूटेगी तब । अपनी राह सब । होगी प्राप्त ॥ ३८ ॥ त्रिदोषके छोडनेसे शरीर । त्रिकूटिका मिटनेसे नगर । त्रिदाह मिटनेसे है अंतर । शांत होता वैसे ॥ ३९ ॥ वैसे कामादिक जो ये तीन । तजते वे सुख पाते जान । मोक्ष-मार्गमें वे ही सज्जन- । संग पाते हैं ॥ ४४० ॥ सत्संगसे फिर प्रबल । तथा ले सत्शास्त्रका बल । पार होते वन सकल । जन्म-मृत्युके ॥ ४१ ॥ जिसमें आत्मानंद पूर्ण । बसता है वह सदन । तथा पाता है वह पट्टन । गुरु-कृपाका ॥ ४२ ॥ प्रिय-वस्तुओंकी जो परिसीमा । मिलती है वहां माउली आत्मा । तथा नहीं बजता है डिंडिम । संसारका वहां ॥ ४३ ॥ ऐसे जो काम-क्रोध लोभ । झाड़कर खड़ा है तब । स्वामी बन पाता है लाभ । इतने सारे ॥ ४४ ॥ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परांगतिम् ॥ २३ ॥ नहीं भाता जिसे यह कुछ । कामादिक ही है सब कुछ । इसीमें जाता है श्वपच । आत्मघाती वह ॥ ४५ ॥ छोड जो शास्त्रका मार्ग करता स्वैर-वर्तन । न पाता सिद्धिका मार्ग तथा सुख न सद्गति ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६६

जगमें जो समान सरूप । हिताहित दिखाता है दीप । वह अमान्य करता बाप- । वेदको जो ॥ ४६ ॥ आसुरी स्वैराचारी इह-परमें सुख शांति नहीं पा सकता— नहीं करता विधिका पालन । न है जिसको आत्म-हित भान । बढ़ाता जाता है भूख नित अर्जुन । इंद्रियोंकी जो ॥ ४७ ॥ कामादिकका आश्रय नहीं छोड़ूँगा । अपने वचनका पालन करूंगा । कहकर स्वेच्छाचार रत रहेगा । कुमार्गी जो ॥ ४८ ॥ मुक्ति-प्रवाहका नीर । नहीं पा सकेगा वह नर । स्वप्नमें भी यह धनुर्धर । असंभव जान ॥ ४९ ॥ गया ही उसका पर-लोक । किंतु सुख भी वह ऐहिक । भोग नहीं सकता तू देख । भली भांति ॥ ४५० ॥ मछलीकी आशासे ब्राह्मण । बन गया जो धीवर मान । वहां भी उसे नास्तिक जान । न लेंगे अपनेमें ॥ ५१ ॥ विषयका लोभ धरकर । खोता पारलौकिक जो नर । उसको यहांसे भी सत्वर । ले जाती मृत्यु ॥ ५२ ॥ ऐसे पर-लोकमें ना स्वर्ग । यहां भी नहीं सुखोपभोग । तब आयेगा कैसा प्रसंग । मोक्षका वहां ॥ ५३ ॥ तमी करके काम का बल । सुख-भोग चाहते सकल । वे दोनोंमें होते हैं विफल । न होता उद्धार ॥ ५४ ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥ वेद आज्ञाके अनुसार कर्तव्य करते जा— इस कारणसे अर्जुन । चाहता जो अपना कल्याण । वेदकी आज्ञाका उल्लंघन । न करें कभी ॥ ५५ ॥ व्यवस्था जान लेनेमें यहां कार्य अकार्यकी । जानके शास्त्रकी आज्ञा कर तू सब कर्मको ॥ २४ ॥ ३६७ देवासुर-संपद्विभाग-योग

जान कर पतिका मत । उसपे चलके सतत । सहज पाती आत्म-हित । पतिव्रता जैसे ॥ ५६ ॥ अथवा श्रीगुरुका वचन । करके नित परिपालन । कर लेना है आत्म-मंचन । अपना वैसे ॥ ५७ ॥ अंधेरेमें रखा कोई सामान । प्राप्त करलेना हो तो अर्जुन । सदा दीप करते हैं जान । आगे वैसे ॥ ५८ ॥ पुरुषार्थोंका संपूर्ण । स्वामी होना तो अर्जुन । श्रुति स्मृतिके वचन । मानना वंद्य ॥ ५९ ॥ शास्त्र कहता यदि कुछ तजना । राज्य सुख भोग भी तृण मानना । विष लेने कहता तो ना कहना । शब्द भी विरुद्ध ॥ ४६० ॥ ऐसी जिसकी वेदकी निष्ठा । स्थिर हुई तो देख सुभटा । होगी कैसी आहितकी भेट । कहां किसको ॥ ६१ ॥ अहितसे जो निकालती । हित करके जो बढाती । ऐसी दूसरी न दीखती । श्रुति-मातासी ॥ ६२ ॥ कराती यह ब्रह्मसे मिलन । न करना कभी अवहेलन । कर तू इसका सदा अर्जुन । विशेष आश्रय ॥ ६३ ॥ आज तू यहां है पार्थ । शास्त्रोंको सुनले सार्थ । जन्म लिया है हितार्थ । धर्म-कार्यके ॥ ६४ ॥ तथा धर्मानुज नामसे । बोध होता सहजतासे । इससे भिन्न कुछ ऐसे । करना नहीं ॥ ६५ ॥ कार्याकार्यका विवेक । करना शास्त्रोंको देख । अकृत्य जो कुछ देख । तजना उसे ॥ ६६ ॥ तथा जो कुछ है करणीय । दृढतासे उसका आश्रय । करके संपन्न धनंजय । करना उसको ॥ ६७ ॥ विश्व-प्रामाण्यकी जो है मुरी । आज तेरे हाथमें सुबुद्धी । लोक-संग्रहार्थ तू त्रिशुद्धी । योग्य है इससे ॥ ६८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६८

सोलहवे अध्यायका ज्ञानेश्वर कृत समालोचन— ऐसे आसुरी भाव संपूर्ण । तथा उसके सब लक्षण । कहे मुक्त होनेके साधन । कृष्णने पार्थसे ॥ ६९ ॥ इस पर वह पुत्र पांडुका । पूछेगा भाव अपने जीवका । सुनो वह सब दे चैतन्यका । कान बनाकर ॥ ४७० ॥ व्यास कृपासे संजय सुनाता । तथा इसे कुरु-नृप सुनता । श्रीगुरु कृपासे मैं सुनाता । इसको यहां ॥ ७१ ॥ आप संत-जन मेरी ओर । कृपा-वर्षा करें यहां पर । मैं आपकी मान्यतानुसार । बनूंगा स्वामी ॥ ७२ ॥ इसीलिये निज अवधान । मुझको देना पसायदान । जिससे बनूं सामर्थ्यवान । कहता ज्ञानदेव ॥ ७३ ॥ गीता श्लोक २४ ज्ञानेश्वरी ओवी ४७३ ॐ ६६९ देवासुर-संपद्विभाग-योग

१७ श्रद्धा - निरूपण - योग गणेशरूप गुरुवंदन— विश्व-विकसित-मुद्रा । छोड तेरी योग-निद्रा । नमन जीव-गणेंद्रा । सद्गुरु तुझे ॥ १ ॥ त्रिगुण-पुरमें जो घिरा गया । जीवत्व दुर्गमें अटका गया । वह आत्मा-शत्रुने छुडालिया । तेरे स्मरणसे ॥ २ ॥ तभी शिवसे करके तुलना । जान लिया तू है अति महान । मुमुक्षु - जीव करता तारण । तभी तू है हलका ॥ ३ ॥ तेरे विषयमें जो मूढ़ । उनको है तू वक्र-तुंड । ज्ञानियोंके लिये अखंड । सन्मुख ही तू ॥ ४ ॥ देखनेमें छोटी देवकी दृष्टि । किंतु मिलनोन्मिलनमें सृष्टि । करती सृष्टि लय दोनों गोष्टि । सहज लीलासे ॥ ५ ॥ प्रवृत्ति कर्णकी हलचलसे । छूटे मद गंधानिलसे । पूजा करते नील कमलसे । जीव-भ्रमरोंके ॥ ६ ॥ निवृत्ति कर्णके हिलनेसे फिर । पूजा वह सहज व्यर्थ होकर । दिखाता तब अपना अलंकार । खुले शरीरका ॥ ७ ॥ मानो वामांगीका लास्य विलास । जो है वही जगद्रूप आभास । तांडव नृत्य-कलाका विलास । दिखाता है तू ॥ ८ ॥ देख होता है यह चकित । होता है तू जिसका भी आप्त । आप्त व्यवहारसे विरत । होता है वह ॥ ९ ॥

मिटाता तू बंधनका ठाव । तमी तू जगद्बंधु यह भाव । तेरे लिये योग्य यह वैभव- । युत नाम ॥ १० ॥ द्वैतके नामसे जिसको । देह भी न रहे उसको । अपनासा किये तुमको । देवराय ॥ ११ ॥ पानेके लिये तुझको । दौड़ते जाते उनको । रखता सदा दूरको । अपनेसे तू ॥ १२ ॥ ध्यानसे लाता है जो मनमें । न होता तू उसके गांवमें । तुझे भूलता तो स्व-बोधमें । उसका होता तू ॥ १३ ॥ तू सिद्ध है जो न जानता । दिखाता वह सर्वज्ञता । वेदोंकी भी ऐसी जो वार्ता । नहीं सुनता तू ॥ १४ ॥ तेरा राशि-नाम है मौन । तब कैसे करूं स्तवन । देखना सब मिथ्या जान । नमन वैसे कैसे ॥ १५ ॥ यदि मैं सेवक बनना चाहता । भेद करनेसे मैं द्रोही बनता । इसलिये कुछ भी नहीं हो पाता । आपका मैं ॥ १६ ॥ सर्वथा कुछ भी नहीं होना । तुझ अद्वयकी प्राप्ति होना । तेरा यह मार्ग मैंने जाना । आराध्य-लिंग ॥ १७ ॥ अपनेको पूर्ण विलीन । करके रसमें लवण । भजना है वैसे नमन । मौनसे मेरा ॥ १८ ॥ रीता कुंभ जैसे सिंधुमें जाता । तथा पूर्ण भरके निकलता । अथवा दीप संगसे है बनता । बात भी दीप ॥ १९ ॥ करके तुझे मैं प्रणिपात । पूर्ण हुवा श्रीनिवृत्तिनाथ । करूंगा अब वह गीतार्थ । प्रकट मैं देव ॥ २० ॥ सोलवे अध्यायका समारोप और सत्रहवीकी भूमिका— सोलहवे अध्यायके अंतमें । उसके समाप्तिके श्लोकमें । ऐसा कहा निश्चितपनमें । परमात्माने ॥ २१ ॥ कार्याकार्यकी है जो व्यवस्था । आचरण करनेमें पार्था । मानना तुझे शास्त्र सर्वथा । प्रमाण एक ॥ २२ ॥ ६७१ श्रद्धा-निरूपण-योग

तब अर्जुनका मानस । कहता यह ऐसा कैसा । शास्त्रके बिना नहीं ऐसा । कर्मसे मुक्ति ॥ २३ ॥ तक्षकके फन परसे । निकाल लेना मणि कैसे । अथवा तोडें बाल कैसे । सिंहकी नाकका ॥ २४ ॥ मणि तब उसमें पिरोना । तथा अलंकारसे सजना । नहीं तो क्या वैसे ही रहना । खुले गलेसे ॥ २५ ॥ शास्त्रोंकी जो मत-भिन्नता । उसे कहो कौन जानता । होगी कैसी एक-वाक्यता । फलदायी उसकी ॥ २६ ॥ होने पर भी एक-वाक्यता । होगी क्या आचरण शक्यता । तथा जीवन होगा विस्तृत । इतना कैसे ॥ २७ ॥ तथा शास्त्र अर्थ देश काल । इन चारोंका जो एक फल । मिलेगा ऐसा योग सकल । किसको कब ॥ २८ ॥ तभी शास्त्रोचित घड़ना । असंभव है यह जान । अज्ञानी जो मुमुक्षु जन । उसकी गति क्या ? ॥ २९ ॥ पूछनेमें यह अर्जुन । करता है प्रस्ताव जान । आरंभ कहांसे कथन । करनेका ॥ ३० ॥ सबके विषयमें जो वितृष्ण । तथा सकल कलामें प्रवीण । कृष्णको आश्चर्य है जो कृष्ण । अर्जुनत्वमें ॥ ३१ ॥ शौर्यसे जुड़ा हुवा आधार । तथा सोम-वंशका शृंगार । सुखादिके लिये उपकार । जिसकी लीला ॥ ३२ ॥ प्रज्ञाका है जो प्रियतम । ब्रह्म विद्याका है विश्राम । सहचर औ' मनोधर्म । देवका है जो ॥ ३३ ॥ अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥ अर्जुनने कहा शास्त्रकी विधिको छोड श्रद्धासे पूजते जन । कौन सी उनकी निष्ठा सत्व या रज या तम ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ६७२

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शास्त्ररहित श्रद्धापूर्वक पूजनेवालोंकी क्या गति होती है?-- अर्जुन कहे तमाल-श्याम । इंद्रियोंसे गोचर तू ब्रह्म । करते हैं तेरे शब्द-ग्राम । साशंक हमको ॥ ३४ ॥ अन्य नहीं शास्त्रके बिन । जीवका स्व-मोक्ष साधन । ऐसे कहता तू श्रीकृष्ण । किसभांति ॥ ३५ ॥ यदि न मिलता ऐसा देश । तथा नहीं काल अवकाश । करना ऐसा शास्त्राभ्यास । वह भी दूर ॥ ३६ ॥ तथा अभ्यासके जो साधन । वह भी प्राप्त नहीं है जान । ऐसेमें करें क्या कैसे कौन । अभ्यास उसका ॥ ३७ ॥ अनुकूल नहीं प्राचीन । प्रज्ञाका साथ जिसे जान । दूर है शास्त्र-संपादन । उसके लिये ॥ ३८ ॥ अजी ! मानते शास्त्रका विषय । नहीं मिलता एक भी आश्रय । इसीलिये जिन्होंने छोड दिया । शास्त्रका विचार ॥ ३९ ॥ किंतु निर्धार कर शास्त्र । अर्थानुष्ठानसे पवित्र । वास करते जो पात्र । सुख पूर्वक ॥ ४० ॥ उनका-सा हमको होना । ऐसे सोच चित्तमें जान । करते हैं आलंबन । उस मार्गका ॥ ४१ ॥ देखके पाठके अक्षर । करे बालक अनुसर । अंधा चलता आगे कर । भलेको जैसे ॥ ४२ ॥ वैसे सर्व शास्त्र निपुण । उनका देख आचरण । चलते हैं जान प्रमाण । श्रद्धासे आप ॥ ४३ ॥ फिर शिवाविक पूजन । तथा भूम्यादि महादान । अग्नि-होत्रादि जो यजन । करते श्रद्धासे ॥ ४४ ॥ उन्हे कह सत्य रज तम । किसमें गिनता पुरुषोत्तम । मिले उनको कौन गति हम । जाने कैसे ॥ ४५ ॥ वैकुंठ पीठका तब लिंग । निगम-पद्मका जो पराग । जिसकी अंग छाया है जग । जीवित जान ॥ ४६ ॥ (३२) ६७३: श्रद्धा-निरूपण-ओवि

कालसे सहज प्रचंड । तथा जो लोकोत्तर प्रौढ़ । अद्वितीय परम गूढ़ । आनंद-घन जो ॥ ४७ ॥ इन गुणोंसे कीर्तिमान । जहां यह सामर्थ्य पूर्ण बोलता ऐसे जो श्रीकृष्ण । स्वमुखसे यहां ॥ ४८ ॥ भगवान उवाच त्रिविधा भवति श्रध्दा देहिनां सा स्वभावजा । सात्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥ श्रध्दा भी तीन प्रकारकी होती है— कहता है श्रीहरि पार्थ ! तेरा भाव है मुझे ज्ञात । बाधक होती है बात । शास्त्राभ्यासकी ॥ ४९ ॥ केवल साधन मान श्रद्धा । पाना चाहो तो परम-पद । नहीं वह वैसे प्रबुद्ध । अज्ञात बात ॥ ५० ॥ श्रद्धा कहनेसे ही पार्थ । नहीं पायेगा सकलार्थ । द्विज क्या अंत्यजके साथ । न होगा अंत्यज ॥ ५१ ॥ हुवा भी यदि गंगोदक । मद्यके मटकेमें रख । लायेगा तो हो सके देख । पी सकता क्या ? ॥ ५२ ॥ चंदन होता है शीतल । किंतु अग्नि-ज्वालसे मिल । पकडा हुवा हाथ जल- । जायेगा न ? ॥ ५३ ॥ हीन कस सोनेके साथ । पुट दिया तो वह पार्थ । देगा शुद्ध सोनेका अर्थ । कभी वह ? ॥ ५४ ॥ ऐसे है श्रद्धाका जो स्वरूप । होता शुद्ध अपनेमें आप । किंतु मिलता है परंतप । जीवको जब ॥ ५५ ॥ श्रीभगवानने कहा पाता स्वभावसे प्राणि श्रद्धा तीन प्रकारकी । सुन सात्विक है होती तथा राजस तामस ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ६७५

स्वभावसे ही प्राणि जात । अनादि पापके पड हाथ । बन गये त्रिगुणके साथ । एक रूपसे ॥ ५६ ॥ उसमें पाते वे अवनति । तथा चाहते हैं वे उन्नति । होती है तब वैसी ही वृत्ति । जीवोंकी सब ॥ ५७ ॥ वृत्ति-सा तब संकल्प करते । संकल्प-सा सब कर्म करते । तथा कर्मानुसार ही करते । शरीर-धारण ॥ ५८ ॥ बीज मिटकर वृक्ष होता । फिर वृक्ष बीजमें समाता । कल्पोंसे ऐसे चलता आता । किंतु न नाशता वृक्ष ॥ ५९ ॥ उसी भांति है यहां अपार । होता रहता है जन्मांतर । त्रिगुणत्व अव्यभिचार । प्राणियोंके साथ ॥ ६० ॥ इसीलिये प्राणियोंके साथ । रहती है श्रद्धा जो सतत । जैसे होते गुण वैसे पार्थ । यह जान तू ॥ ६१ ॥ बढता कभी सत्वशुद्ध । ज्ञानकी चाह होती सिद्ध । किंतु दोनों होते विरुद्ध । यहां तब ॥ ६२ ॥ होती तब सत्य विषयक । श्रद्धा जो मोक्ष-फल दायक । किंतु रज तम सहायक । होंगे क्या कभी ॥ ६३ ॥ सत्वके बलको तोड कर । चढता रज आकाश पर । होती तब श्रद्धा कूडा घर । कर्म-उसका झाडू ॥ ६४ ॥ फिर उठती तमकी आग । करती है वह श्रद्धा भंग । तब चाहता विषय-भोग । भोगनेमें निषिद्ध ॥ ६५ ॥ सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ऐसे है सत्व रज तम । श्रद्धा-रूप जान सुधर्म । नहीं रखता जीव ग्राम । इससे कुछ भिन्न ॥ ६६ ॥ स्वभाव जिसका जैसे श्रद्धा वैसे मिले उसे । श्रद्धासे ही बना जीव श्रद्धा-सा वह भी रहा ॥ ३ ६७५ श्रद्धा-निरूपण-योग

इसीलिये श्रद्धा स्वाभाविक । रहती सदा त्रिगुणात्मक । रज तम तथा है सात्विक । भेद यहां जो ॥ ६७ ॥ जिस भांति है जीवन उदक । किंतु होता है विषमें मारक । अथवा होता है मिर्चमें तीव्र । ईखमें मधुर ॥ ६८ ॥ ऐसे पाता है जो जनम । या मरण साथ ले तम । उसका होता परिणाम । उसीका रूप ॥ ६९ ॥ जैसे काजल या हो मसी । उसमें न भिन्नता ऐसी । वैसे ही श्रद्धा जो तामसी । या तममें नहीं ॥ ७० ॥ वैसे श्रद्धा तमोगुणीमें । होती है तमके रूपमें । पूर्ण रूपसे सात्विकीमें । होती है सात्विक ॥ ७१ ॥ ऐसे है यह सकल । बसा है ब्रह्मांड गोल । श्रद्धा-मात्रसे केवल । ढाल करके ॥ ७२ ॥ किंतु गुणत्रयके कारण । किया त्रिविध-रूप धारण । श्रद्धाने भी यह साधारण । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥ फूलसे जैसे वृक्ष जाना जाता । या बोलसे मानस जाना जाता । या सुख दुःखसे जाना-जाता । पूर्व-संचित ॥ ७४ ॥ वैसे अब पांडुकुमार । जानना श्रद्धाके प्रकार । कहता हूं लक्ष्य दे कर । सुन तू सब ॥ ७५ ॥ यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः । प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजंते तामसा जनाः ॥ ४ ॥ श्रद्धाका विविध रूप— जिनकी सात्विक श्रद्धा । लेकर बनता बांधा । सदैव उनकी मेधा । रहती स्वर्गपे ॥ ७६ ॥ सत्वस्थ पूजते देव यक्ष राक्षस राजस । मृत प्रेतादि जो सारे पूजते लोग तामस ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ३७६

विद्या सभी वे पढ़ते । यज्ञ-क्रियायें करते । ऐसे वे जाके रहते । देव-लोकमें ॥ ७७ ॥ तथा श्रद्धा जो राजस । लेकर बने वीरेश । भजते हैं वे राक्षस । यक्षादिक सब ॥ ७८ ॥ श्रद्धा लेकर जो तामस । आये कहूंगा तेरे पास । केवल वे अति कर्कश । बने पापका ढेर ॥ ७९ ॥ जीव-वध कर अमंगल । बलि देके भूत-प्रेत कुल । स्मशानमें जाके संध्याकाल । पूजते जो ॥ ८० ॥ तमो-गुणका लेकर सार । बनाये जाते हैं जो नर । जान वे तमोगुणका घर । श्रद्धाका जो ॥ ८१ ॥ ऐसे हैं ये तीन लक्षण । जगमें दीखते हैं जान । यह मैं कहता अर्जुन । इसीलिये तुझे ॥ ८२ ॥ सात्विक श्रद्धावाला मनुष्य शास्त्रोंका अनुकरण करता है— यह जो है सात्विक श्रद्धा । जतन करना प्रबुद्धा । तथा है दोनोंके विरुद्ध । खड़ी करना ॥ ८३ ॥ यह सात्विक मति जिसकी । जोपासना करता उसकी । उसको नहीं मोक्ष-सिद्धिकी । कमी भीति ॥ ८४ ॥ नहीं सीखा वह ब्रह्म-सूत्र । तथा नहीं पढा कोई शास्त्र । सिद्धांत नहीं होता स्वतंत्र । उनके पास ॥ ८५ ॥ किंतु श्रुति-स्मृतिका अर्थ । बनते हैं वे स्वयं मूर्त । अनुष्ठानसे वे यथार्थ । देते हैं जगतको ॥ ८६ ॥ उनके आचरणके जो चरण । देख सात्विकी श्रद्धा अनुकरण । करके पाते फल असाधारण । निश्चित रूपसे ॥ ८७ ॥ दीप जलाता कोई कष्टसे जैसे । दूसरा दीप जला लेता उससे । दीप करेगा क्या कमी प्रकाशसे । उसको वंचित ॥ ८८ ॥ तथा किसीने धन अपार । व्यय कर बांधा अच्छा घर । अतिथि उसमें रह कर । सुख नहीं पाता क्या ? ॥ ८९ ॥ ६७७ श्रद्धा-निरूपण-योग

जाने दो कोई बांधता सरोवर । उसीकी तृषा हरता है क्या नीर । रसोई पाकानेवालेको ही घर । मिलता क्या अन्न ॥ ९० ॥ इससे अधिक क्या कहूंगा । गौतमकी लाई हुई गंगा । उससे वंचित है क्या जग । कह तू मुझसे ॥ ९१ ॥ तमी अपना अधिकार जान । करता जो शास्त्रोंका अनुष्ठान । श्रद्धासे उसका अनुकरण । कर तरता मूर्ख ॥ ९२ ॥ अशास्त्रविहितं घोरं तप्यंते ये तपो जनाः । दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥ अशास्त्रीय तामसिक श्रद्धा-तप— शास्त्रके नामसे भी जो पार्थ । न जानते आरंभकी बात । शास्त्रज्ञोंको रखते सतत । गांवके बाहर ॥ ९३ ॥ देख कर बडोंकी बात । करते हैं ठठोली तात । तथा देखके वे पंडित । बजाते चुटकियां ॥ ९४ ॥ करके बड़ा अभिमान । आचरते तपाचरण । दंभसे भरकर पूर्ण । पाखंड रचते ॥ ९५ ॥ दूसरोंके शरीरमें शस्त्र । चुभाके छील उसके गात्र । रक्तसे लेते प्रणीत-पात्र । भर भर कर ॥ ९६ ॥ वह रक्त आगमें गिराते । भूतके मुखमें भी लगाते । तथा बालकोंका बलि देते । उन भूतोंको ॥ ९७ ॥ आग्रहके बलपर । क्षुद्र देवताको धर । करते हैं सत्र घोर । अपाचारका ॥ ९८ ॥ अजी ! करके स्वपर पीडन । तम क्षेत्रमें बीज बोते जान । आगे पाते हैं वही वे अर्जुन । फलके रूपसे ॥ ९९ ॥ शास्त्र-निषिद्ध जो घोर दंभसे करते तप । अहंतासे भरे सारे काम राग बली जन ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६७८

पडा है समुद्रमें पार्थ । तैरने नहीं जो समर्थ । तथा नहीं उसके हाथ । और पांव भी ॥ १०० ॥ या वैद्यका द्वेष कर । औषध ठुकरा कर । होगा कैसे रोग दूर । किसीका कभी ॥ १ ॥ करके आंखोंसे विरोध । उन्हें फोडले प्रतिशोध । पड़ा रहता बन अंध । कोनेमें कहीं ॥ २ ॥ इसी प्रकार ये असुर । शास्त्रोंका करके धिःकार । करते हैं बन-संचार । अविवेकसे ॥ ३ ॥ काम जो कराता वह करते । क्रोध मरवाते उसे मारते । मुझे दुःखके गढेमें गाढ़ते । सभी ये लोग ॥ ४ ॥ कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥ अपने या पराये देहको । देते हैं वे दुःख जो उसको । भोगना होता मुझ आत्माको । पांडुकुमार ॥ ५ ॥ वाचाके भी अंचलसे । स्पर्श न करता जिसे । तजनेके लिये उसे । कहना पडा ॥ ६ ॥ स्पर्शसे जैसे प्रेत हटाते । शब्दसे चांडालको तजते । हाथ लगाकर जैसे धोते । मलको वैसे ॥ ७ ॥ वहां शुद्धिके ही हेतुसे । लेप नहीं मानते वैसे । उन्हे तजनेके हेतुसे । कहा यह यहां ॥ ८ ॥ होगा तुझे जब दर्शन । असुरोंका तब अर्जुन । करना मेरा ही स्मरण । प्रायश्चित्त रूप ॥ ९ ॥ तभी श्रद्धा जो सात्विक । जीव-भावसे हो एक । जतन करना नेक । सर्वतोपरी ॥ ११० ॥ गलाते मुझ आत्माको सोखके देह-धातुको । ऐसे विवेक-हीनोंकी निष्ठा है जान आसुरी ॥ ६ ॥ ६७९ श्रद्धा-निरुपण-योग

करना सदैव ऐसा संग । सत्व-पोषणका हो अंग । तथा सत्व-वृद्धिका हो भाग । लेना ऐसा अन्न ॥ ११ ॥ साधकके लिये आहारका महत्व— जो है अति-स्वाभाविक । स्वभाव वृद्धि कारक । आहारसे नहीं नेक । साधन शक्त ॥ १२ ॥ प्रत्यक्ष देख तू यहां वीर । भला मनुष्य सुरा पीकर । करता कैसे मत्त होकर । उसी क्षणमें ॥ १३ ॥ अथवा जो मनमाने अन्न-सेवन । करता तब वात-पित्तके कारण । या नव-ज्वरमें दूध होता अर्जुन । दुःख-दायक ॥ १४ ॥ अथवा अमृत जैसे । टालता मरण वैसे । तथा है विष लेनेसे । आती मृत्यू ॥ १५ ॥ वैसे ही लेनेसे जो आहार । लेता है धातु वही आकार । धातु जैसे वैसे ही अंतर । करता भाव पुष्ठ ॥ १६ ॥ या तपनेसै जैसे बर्तन । तपता अंदर जल जान । वैसे धातु वश है अर्जुन । चित्त-वृत्ति ॥ १७ ॥ इसीलिये सात्विक सेवन । करनेसे होगा वृद्धि सत्व-गुण । तथा रज तम रसका सेवन । बढाता है वही ॥ १८ ॥ तमी कौन सात्विक आहार । रज तमका क्या क्या आकार । कहता हूं यह धनुर्धर । आदरसे सुन ॥ १९ ॥ आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥ आहारका विविध रूप— उसी भांतिसे है आहार । हुए कैसे तीन प्रकार । तुझसे यह धनुर्धर । कहूंगा सुन ॥ १२० ॥ आहार भी सभीका है तीन भांति यथा रुचि । यज्ञ दान तपमें भी कहता भेद तू सुन ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८०