ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजान कर पतिका मत । उसपे चलके सतत । सहज पाती आत्म-हित । पतिव्रता जैसे ॥ ५६ ॥ अथवा श्रीगुरुका वचन । करके नित परिपालन । कर लेना है आत्म-मंचन । अपना वैसे ॥ ५७ ॥ अंधेरेमें रखा कोई सामान । प्राप्त करलेना हो तो अर्जुन । सदा दीप करते हैं जान । आगे वैसे ॥ ५८ ॥ पुरुषार्थोंका संपूर्ण । स्वामी होना तो अर्जुन । श्रुति स्मृतिके वचन । मानना वंद्य ॥ ५९ ॥ शास्त्र कहता यदि कुछ तजना । राज्य सुख भोग भी तृण मानना । विष लेने कहता तो ना कहना । शब्द भी विरुद्ध ॥ ४६० ॥ ऐसी जिसकी वेदकी निष्ठा । स्थिर हुई तो देख सुभटा । होगी कैसी आहितकी भेट । कहां किसको ॥ ६१ ॥ अहितसे जो निकालती । हित करके जो बढाती । ऐसी दूसरी न दीखती । श्रुति-मातासी ॥ ६२ ॥ कराती यह ब्रह्मसे मिलन । न करना कभी अवहेलन । कर तू इसका सदा अर्जुन । विशेष आश्रय ॥ ६३ ॥ आज तू यहां है पार्थ । शास्त्रोंको सुनले सार्थ । जन्म लिया है हितार्थ । धर्म-कार्यके ॥ ६४ ॥ तथा धर्मानुज नामसे । बोध होता सहजतासे । इससे भिन्न कुछ ऐसे । करना नहीं ॥ ६५ ॥ कार्याकार्यका विवेक । करना शास्त्रोंको देख । अकृत्य जो कुछ देख । तजना उसे ॥ ६६ ॥ तथा जो कुछ है करणीय । दृढतासे उसका आश्रय । करके संपन्न धनंजय । करना उसको ॥ ६७ ॥ विश्व-प्रामाण्यकी जो है मुरी । आज तेरे हाथमें सुबुद्धी । लोक-संग्रहार्थ तू त्रिशुद्धी । योग्य है इससे ॥ ६८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६८