भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अपनेसे है जिसकी प्रीति । तथा है आत्म-नाशकी भीति । न करना उसको संगति । इन तीनोंकी ॥ ३५ ॥ गलेमें बांधा कर पाषाण । करें सिंधुका अतिक्रमण । या जीनेके लिये है भोजन । करना कालकूट ॥ ३६ ॥ इन काम-क्रोध लोभका साथ । कार्य सिद्धिमें ऐसा है सतत । इसीलिये जड़-मूलसे पार्थ । मिटाना इसे ॥ ३७ ॥ इन तीनोंकी जब । कड़ी टूटेगी तब । अपनी राह सब । होगी प्राप्त ॥ ३८ ॥ त्रिदोषके छोडनेसे शरीर । त्रिकूटिका मिटनेसे नगर । त्रिदाह मिटनेसे है अंतर । शांत होता वैसे ॥ ३९ ॥ वैसे कामादिक जो ये तीन । तजते वे सुख पाते जान । मोक्ष-मार्गमें वे ही सज्जन- । संग पाते हैं ॥ ४४० ॥ सत्संगसे फिर प्रबल । तथा ले सत्शास्त्रका बल । पार होते वन सकल । जन्म-मृत्युके ॥ ४१ ॥ जिसमें आत्मानंद पूर्ण । बसता है वह सदन । तथा पाता है वह पट्टन । गुरु-कृपाका ॥ ४२ ॥ प्रिय-वस्तुओंकी जो परिसीमा । मिलती है वहां माउली आत्मा । तथा नहीं बजता है डिंडिम । संसारका वहां ॥ ४३ ॥ ऐसे जो काम-क्रोध लोभ । झाड़कर खड़ा है तब । स्वामी बन पाता है लाभ । इतने सारे ॥ ४४ ॥ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परांगतिम् ॥ २३ ॥ नहीं भाता जिसे यह कुछ । कामादिक ही है सब कुछ । इसीमें जाता है श्वपच । आत्मघाती वह ॥ ४५ ॥ छोड जो शास्त्रका मार्ग करता स्वैर-वर्तन । न पाता सिद्धिका मार्ग तथा सुख न सद्गति ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६६