भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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काम-क्रोधसे सदा-सर्वत्र दूर रहना चाहिये— काम-क्रोध तथा लोभ । फूटते तीनोंमें कोंभ । फलता वहां अशुभ । जान तू यह ॥ २५ ॥ समस्त दुःखोंका अर्जुन । करानेके लिये दर्शन । नियुक्त किये हैं ये तीन । पथ-दर्शक ॥ २६ ॥ या पापियोंको नरक-भोगमें । पहुँचानेके लिये जगतमें । पातकोंकी वीर परिषदमें । श्रेष्ठ ये तीन ॥ २७ ॥ रौरवादि नरक महान् । सुनाते नहीं कमी पुराण । जब तक न उठते तीन । हृदयमें ये ॥ २८ ॥ अपाय होते इससे सुलभ । होता है यातनाओंका लाभ । “हानी” हानी नहीं होती अशुभ । हानी ये तीन ॥ २९ ॥ क्या कहू मैं धनुर्धर । कहे ये निकृष्ट चोर । तथा नरकका द्वार । खुला हुवा ॥ ४३० ॥ काम-क्रोध लोभमें जीव । पोसता है जो निज-भाव । सम्मान पाता है पांडव । नरक-सभामें ॥ ३१ ॥ इसीलिये तू पुनःपुन । काम-क्रोध लोभ ये तीन । दक्ष रहके निशिदिन । तजना पार्थ ॥ ३२ ॥ एतैर्विमुक्तः कौंतेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥ पहले छोड इनका साथ । फिर है धर्मादि पुरुषार्थ । करनेकी बात है पार्थ । सोचना सारी ॥ ३३ ॥ हृदयमें ये तीन हैं जागृत । तबतक भलाई होगी प्राप्त । ऐसी नहीं सुनी गयी है बात । देवोंसे भी ॥ ३४ ॥ तमके द्वार ये तीन टालके छूटता जब । कल्याणमार्गसे जाके पाता है गति उत्तम ॥ २२ ॥ ६६५ देवासुर-संपद्विभाग-योग