ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमृत भी निछावर करना । ऐसा ख्र सुनही है स्त्रीके बिना । करता है ऐसा उसका मन । निश्चय पार्थ ॥ ३५ ॥ फिर भी भोगके कारण । दौडते हैं तीनों भवन । दस दिशाओंमें अर्जुन । उसके परे भी ॥ ३६ ॥ आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥ १२ ॥ सुख-भोगके लिये पापसे धन-संचय— आमिष कौरकी बडी आशासे । न सोच निगलता मीन जैसे । होती है विषयाशा उन्हे वैसे । पांडुकुमार ॥ ३७ ॥ नहीं होती कभी वांछित प्राप्ति । किंतु करोडोंकी आशा-संतति । बढ़ते बढ़ते है वह होती । कोश-कीटक ॥ ३८ ॥ तथा फैलाते जो अभिलाश । पूर्ण न होता बनता द्वेष । ऐसा काम-क्रोध ही विशेष । बनता पुरुषार्थ ॥ ३९ ॥ दिनमें चलना रातमें जागना । जैसे होता चौकीदारका जीना । दिन-राति विश्रांति नहीं जाना । उसी भांति ॥ ३४० ॥ ऊंची चोटीसे काम है ढकेलता । नीचे क्रोध पत्थरपे पटकता । फिर भी राग-द्वेष नहीं छूटता । विषयोंसे उसका ॥ ४१ ॥ हृदयमें ऐसे विषयोंकी भूख । जुटाये विषय-साधन अनेक । भोगके लिये जो अति आवश्यक । किंतु द्रव्य है कहां ॥ ४२ ॥ तभी भोग-पूर्तिमें हो आसक्त । जुट जाते हैं धन-संचयार्थ । तथा लूटते हैं विश्वको नित । मनमाने जो ॥ ४३ ॥ एकको मारते समय साधकर । तो दूसरेका सर्वस्व ही छीनकर । तीसरेके लिये बनाते हैं आखर । अपाय तंत्र ॥ ४४ ॥ आशाके कसके पाश डूबे हैं काम-क्रोधमें । चाहते सुख-भोगार्थ पापसे धन-संचय ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६५१