ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे ही मद-भरा कुंजर । उसीमें चढ़ा मद्यका ज्वर । तब बढ़ जाता मद-भार । बुढापेका ॥ २५ ॥ बनता तब हठका स्थान । करता मूढ़ताका धरण । फिर क्या करना है वर्णन । उसके निश्चयका ॥ २६ ॥ पर-ताप जिससे घड़ता । दूसरोंका जीव कुचलता । उन्हीं कामोंमें गढ़ जाता । जीव-भावसे ॥ २७ ॥ अपने कियेका फिर बखान । तथा जगको दे धिःकार दान । दश दिशामें करें प्रसारण । आशा-जाल ॥ २८ ॥ ऐसे विकारसे भर । पाप-कर्म कर घोर । धर्म-धेनुका आहार । तोडते हैं ॥ २९ ॥ चिंतामपरिमेयां च प्रलयांतामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥ काम-प्रचोदनसे कर्म-प्रवृत्ति— इसी सामग्रिपे चलती । उनकी जो कर्मकी गती । मृत्युसे भी नहीं छूटती । चिंता उनकी ॥ ३३० ॥ पातालसे भी होती जो निम्न । ऊंचाईमें छोटा है गगन । विशालतामें है त्रिभुवन । अणुसा लगता ॥ ३१ ॥ योग-पटका जैसे स्मरण । जीवमें असीम विबंधन । साथ देता मृत्यु तक जान । पतिव्रता जैसे ॥ ३२ ॥ चिंता वह ऐसी अपार । बढ़ाता जाता निरंतर । हृदयमें भर असार । विषयाधिक ॥ ३३ ॥ स्त्रियोंका गाना सुनना । उन्हें आंखोंसे देखना । सर्वेंद्रिय आलिंगना । स्त्रियोंके ही ॥ ३४ ॥ असीम करते चिंता मृत्युसे भी न छूटती । कामोपभोगमें चूर मानो सर्वस्व है वह ॥ ११ ॥ ६५५ दैवासुर-संपद्विभाग-योग