भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तमी वाचाके चौराहे पर । फैलाया तो धर्मका विस्तार । कहलाता दंभ धनुर्धर । अधर्म-रूप ॥ २३ ॥ २ आसुरी-गुण, दर्प— किंतु मूर्खकी जिव्हा पर । फैलाया तो धर्मका विस्तार । कहलाता दंभ धनुर्धर । वह ब्रह्म सभाको ॥ २४ ॥ या घोड़ा जो भादुरी लोगोंका । ओछा मानता गज इंद्रका । गिरगिट जो कांटों परका । स्वर्ग भी बौना ॥ २५ ॥ या तृणका जो ईंधन । भड़कता है गगन । डबरे बसा मीन । माने सिंधु तुच्छ ॥ २६ ॥ फूलता है वह क्षीधन । विद्या स्तुति पाकर मान । एक दिनका ही पराश्न । फुलाता अल्पको जैसे ॥ २७ ॥ जैसे मेघ छाया देख तोड़ता । दुर्दैवी घरका आसरा पार्था । मृग-जल देखकर तोड़ता । पानीका डबरा ॥ २८ ॥ और कहूं मैं कितना । संपत्ति-योगसे नाना । मदमें उन्मत्त होना । कहलाता दर्प ॥ २९ ॥ ३ आसुरी-गुण, अभिमान— तथा वेदमें जिसका विश्वास । विश्वका पूजनीय ईश । विश्वमें एक ही महा तेजस । सूर्य मात्र ॥ २३० ॥ विश्वमें जो है स्पर्धास्पद । एक ही सार्वभौम पद । न मरना है निर्विवाद । विश्वको भाता ॥ ३१ ॥ इसीलिये यदि उत्साहसे । इसका वर्णन करनेसे फूलता वह अभिमानसे । तथा रखता डाह ॥ ३२ ॥ कहता निकालूंगा ईशको । गरल पिलाऊंगा वेदको । खपाता है अपने बलको । स्व-गौरवार्थ ॥ ३३ ॥ ६४५ देवासुर-संपद्विभाग-योग