ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआसुरी-गुणोंकी ओर संकेत— दुःख क्लेशकी जो पुष्ट लता । दोष-कांटोंसे भरी है पार्थ । वह अपनी व्याख्यामें लाता । आसुरी जो ॥ १३ ॥ त्याज्यको तजनेके हित । जान लेता है उपयुक्त । इसीलिये दे तू स्व-चित्त । सुननेमें यह ॥ १४ ॥ यह है नरक-व्यथा घोर । लाये दोष अति भयंकर । एकत्र किये हैं ये असुर- । संपदा रूप ॥ १५ ॥ नाना विष वर्गका कर गठन । बनाया जाता कालकूट महान । वैसे सभी दोषोंका कर मिलन । बनी आसुरी संपदा ॥ १६ ॥ दंभो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । अज्ञानंचाभिमानस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥ ४ ॥ १ आसुरी-गुण, दंभ— आसुरी दोषमें ख्यात । गर्जेके जिसका पार्थ । नाम चलता सतत । दंभ ऐसा ॥ १७ ॥ अपनी जननी है पावन । रहती जो तीर्थके समान । किंतु जनमें करना नग्न । पतन कारण होता ॥ १८ ॥ या विद्या गुरुपदेशमें प्राप्त । चौराहे पर किया प्रदर्शित । इच्छा भी होती अनिष्ट हेत । वैसे ही जो ॥ १९ ॥ डूबनेको महा-पूरमें । पहुंचाती पैल तीरमें । वह नाव बांधे शिरमें । डुबो देती है ॥ २२० ॥ जीवनका जो साधन । अधिक खाया तो अन्न । वही जीवनीय अन्न । होता है विष ॥ २१ ॥ वैसे ही दृश्य-अदृश्यका मित्र । तारक होता है धर्म सर्वत्र । प्रसिद्ध करनेसे जो सर्वत्र । शत्रु बन जाता ॥ २२ ॥ अहंता दंभ अज्ञान क्रोध दर्प कठोरता । आया जो गुण ये लेके आसुरी संपदा वह ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४४