ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपतंगको दीप नहीं भाता । जुगनूको सूर्य क्लेश देता । तथा पंखेरू द्वेष करता । महासागरका ॥ ३४ ॥ वैसा अहं नामका मोह । ईश्वरसे करता द्रोह । वेदसे माने ऐसा डाह । मानो है सौत ॥ ३५ ॥ स्वयं मान्यताका दुष्ट भाव । अभिमानसे बनता देव । रौरवका पथ है पांडव । जो चलता आया ॥ ३६ ॥
४ आसुरी-गुण, क्रोध—
वैसे ही दूसरोंका सुख । जलता है सदा देख । बढे जैसे क्रोधका विष । मनोदशा यह ॥ ३७ ॥ तपा तेल जल पा कर शीतल । भड़क उठता जैसे महाज्वाल । या चंद्रमाको देखकर उदर-ज्वाल । उठती सियारके ॥ ३८ ॥ विश्वका जीवन जिससे उजलता । वह सूर्योदय देख विश्व खिलता । किंतु है उलूकका नयन फूटता । पापीके जैसे ॥ ३९ ॥ प्रातःकाळ सुख है विश्वका । किंतु मृत्युसा दुःख है चोरका । कालकूट बनता दूधका । सांपमें जैसे ॥ २४० ॥ अगाध सागर जल । पीकर वड़वानल । भडकता बन ज्वाल । न पाता शांति ॥ ४१ ॥ वैसे विद्या विनोद विभव । देखकर अन्योंका सुदैव । भडकता जाता शेष भाव । वह है क्रोध ॥ ४२ ॥
५ आसुरी-भाव, कठोरता—
तथा मन जिसका व्याल-विवर । आंखें मानो विष-बाणके अंकुर । बोलना जैसे बरसते अंगार । जलते हुए ॥ ४३ ॥ ऐसे जिसके क्रिया जात । तीखे जैसे आरेके दांत । सबाङ्ग खरोंचता नित । पारुष सबको ॥ ४४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६४६