ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० दैवी-गुण, स्थैर्य— सूत्र तंतु जब टूट जाता । गुड़ियाका थै थै रुक जाता । वैसे प्राण-जयसे टूटता । कर्मेंद्रियोंका खेल ॥ ८३ ॥ या अस्त होते ही दिनकर । रुकता किरणोंका प्रसार । वैसे मनो-जयसे व्यापार । ज्ञानेंद्रियोंका ॥ ८४ ॥ ऐसे मन-प्राणका संयम । करता है इंद्रियां अक्षम । यह है अचांचल्यका मर्म । जानना यहां ॥ ८५ ॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता । भवंति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥ २१ दैवी-गुण, तेज— संकट है मरनेका-सा । वह है अग्नि-प्रवेश-सा । प्राणेश्वरके लिये ऐसा । नहीं गणती सती ॥ ८६ ॥ वैसे आत्म-नाथके ध्यानमें भर । विषय विषकी बाधा दूर कर । जाता शूल्यकी कांटेली राह पर । दौड़ना है उसको ॥ ८७ ॥ निषेधकी बाधा तब नहीं आती । विधिकी भीड़ भी उसे न रोकती । हृदयमें चाह कभी नहीं होती । महासिद्धियोंकी ॥ ८८ ॥ ईश्वराभिमुख हो ऐसे निज । दौड़ता अपने आप सहज । उसको कहते हैं सुज्ञ तेज । अध्यात्मिक जो ॥ ८९ ॥ २२ दैवी-गुण, क्षमा— तथा रहता है सभी गरिमा । गर्व नहीं आता है वही क्षमा । जैसे ढोता है शरीर जो रोम । जानता न ढोता ॥ १९० ॥ पवित्रता क्षमा तेज धैर्य अद्रोह नम्रता । जिसके गुण ये आया दैवी संपत्ति लेकर ॥ ३ ॥ (80) ६४१ देवासुर-संपद्विभाग-योग