ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३ दैवी-गुण, धैर्य— तथा उभर आया इंद्रिय-वेग । या भड़क उठे हैं पुराने रोग । अथवा हुये नाता योग-वियोग । प्रियाप्रियोंके ॥ ९१ ॥ इन सबका आया बवंडर । या साथ मिलकर आया पूर । तब अगस्ति बनकर धीर । खडा होता है ॥ ९२ ॥ नभमें धूम्रका वलय । जोरसे उठा धनंजय । क्षणमें करता विलय । वायु जैसे ॥ ९३ ॥ वैसे अधिभूताधिदैव । अध्यात्मिकादि उपद्रव । होते हैं उनको पांडव । निगलता जो ॥ ९४ ॥ जब ईश्वरकी प्राप्तिमें । प्रवर्तता ज्ञान-योगमें । धीरजका न्यून उसमें । नहीं होता ॥ ९५ ॥ आता ऐसा चित्त-क्षोभका समय । सहके पराक्रम करता धैर्य । धृति कहते हैं जिसे धनंजय । वह हैं यही ॥ ९६ ॥ २४ दैवी-गुण, शौच=पवित्रता— जैसे शुद्ध कनक-कलश । उसमें भरा गंगा पीयूष । जैसे हे अंतर्बाह्य कलश । वैसे पावित्र्य ॥ ९७ ॥ शरीरसे निष्काम आचार । हृदयमें विवेक साकार । अंतर्बाह्य बना है आकार । शुचित्वका जो ॥ ९८ ॥ २५ दैवी-गुण, अद्रोह— हरते हरते पाप ताप । पोसते किनारेके पादप । समुद्र तक जाता है आप । गंगाका जैसे ॥ ९९ ॥ या विश्वका तम हरते । क्रियाका सदन खोलते । चला परिक्रमा करते । भास्कर जैसे ॥ २०० ॥ वैसे बद्धको मुक्त करते । डूबेहुओंको जो उभारते । कठिनाईको दूर करते । अंतरतमकी ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४२