ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पर्शमें जो है अति मृदु । मुखमें लिया तो सुस्वादु । घ्राणमें वैसे ही सुगंधु । अंगोंसे उज्ज्वल ॥ ७१ ॥ यदि चाहे जितना भी लेता । कोई नुकसान नहीं होता । उसको तब है कहा जाता । कर्पूरसा वह ॥ ७२ ॥ महाभूत अपनेमें समालेता । तथा परमाणुमें भी जो समाता । जैसे विश्व है वैसे ही बन जाता । आकाश जैसा ॥ ७३ ॥ क्या कहूं मैं ऐसोंका जीवन । विश्वके लिये जीव धारण । उसको कहता हूं अर्जुन । मार्दव मैं ॥ ७४ ॥ १९ दैवी-गुण, मर्यादा : लज्जा— तथा पराजयसे राजा । हीन दशामें जो सलज्ज । स्वाभिमानी होता निस्तेज । निकृष्टतामें ॥ ७५ ॥ या आया चंडालका सदन । अकस्मातही संन्यासी जान । होता है जैसे सलज्जमन । उत्तम जो ॥ ७६ ॥ क्षत्रियको रणसे भागना । कैसे सहना निर्लज्ज जीना । विधवा नामसे पुकारना । महासतीको जैसे ॥ ७७ ॥ सुरूपको महारोग भया । या शिष्टको कलंकित किया । प्राण संकटमें लजा गया । उसी भांति ॥ ७८ ॥ साडे तीन हाथका देह बना । तथा शवसा बनकर जीना । जनम ले लेकर मरना । पुनः पुनः जो ॥ ७९ ॥ गर्भके मेद सांचेमें । रक्त मूत्रके रसमें । पुतला बन जीनेमें । आती लज्जा ॥ १८० ॥ लेकर यह देहपन । नाम रूपका धारण । रहनेसे न कुछ भिन्न । लज्जा जनक ॥ ८१ ॥ ऐसेमें देहसे उकताकर । रहते हैं सूज्ञ पांडुकुमार । तथा मानते निर्लज्ज अपार । उसीमें सुख ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४०