भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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या पैरोंकी होती शीतलता । आंखोंको मिलती है शांतता । वैसे पर सुखसे हर्षता । सदैव आप ॥ १६० ॥ या प्यासोंके लिये जैसे । पानीका जन्म है वैसे । दुखितोंके लिये वैसे । जीवन उसका ॥ ६१ ॥ ऐसे पुरुष धनंजया । मूर्तिमंत जान तू दया । उसके जन्मसे ही भया । ऋणी मैं उसका ॥ ६२ ॥ १७ दैवी-गुण, अलोभ— जीव-भावसे अनुसरता । सूर्य पुष्प सूर्यको सतत । किंतु सूर्य कभी नहीं लेता । सौरभ उसका ॥ ६३ ॥ अथवा वसंतमें आते अनंत । वनमें बहार वैभवके नित । किंतु उनको तजकर वसंत । चलता जैसे ॥ ६४ ॥ जाने दो महासिद्धियोंके साथ । लक्ष्मी आयी पास कहके नाथ । किंतु महा-विष्णु न देखता पार्थ । उसकी ओर ॥ ६५ ॥ वैसे लौकिक या पारलौकिक । आते भोग बनकर सेवक । किंतु तरंग न उठते देख । भोगके मनमें ॥ ६६ ॥ इससे कहना क्या अधिक । मनमें न उठे सकौतुक । अभिलाषा विषयकी देख । वह अलोलुप्य ॥ ६७ ॥ १८ दैवी-गुण, मार्दव— मद्माखियोंको छत्ता सुखकर । जलमें ही जैसे सुखी जलचर । या पक्षियोंको गगन धनुर्धर । होता है मुक्त ॥ ६८ ॥ या बालकके हितमें जैसे । माताका स्नेह होता है वैसे । बसंतमें छूता है हौलेसे । मलयानल ॥ ६९ ॥ या आखोंको प्रियका दर्शन । पिल्लोंको कूर्मीका दृष्टि जान । वैसे है उसका आचरण । जीव-मात्रसे ॥ १७० ॥ ६३९ देवासुर-संपद्विभाग-योग