भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जिज्ञासु-जन आप समस्त । सोचते ऐसे अपने चित्त । यह पूर्ण करने यथार्थ । बोलेंगे श्रीहरि ॥ ५८ ॥ जिससे होगा ज्ञान उत्पन्न । आप होंगे विश्रांतिसे पूर्ण । ऐसे दैवी-गुणोंका वर्णन । करेंगे श्रीहरि ॥ ५९ ॥ ज्ञानका कर अनादर । राग-द्वेषको दे आधार । वे आसुरी गुण भी घोर । कहेंगे स्पष्ट ॥ ६० ॥ इष्टानिष्ट दोनों स्वाभाविक । करता है जिनका कौतुक । उनका कथन किया देख । पहले नवममें ॥ ६१ ॥ वहां करना था इसका विस्तार । वहां अन्य विषय हुवा गोचर । तब यहां किया प्रसंगानुसार । उसका निरूपण ॥ ६२ ॥ इसका अब निरूपण । सोलहवेमें करेंगे पूर्ण । क्रमानुगत संख्या जान । पहलेसे जो ॥ ६३ ॥ रहने दो यहां है जो प्रस्तुत । जाननेमें ज्ञानका हिताहित । देवासुर संपदा है समर्थ । कहेंगे अब ॥ ६४ ॥ जो है मुमुक्षुओंका पथ दर्शक । तथा मोह-रात्रिका तम नाशक । कहती दैवी संपदा अलौकिक । सुनो वह प्रथम ॥ ६५ ॥ जहां परस्पर पोषक । ऐसे पदार्थ जो अनेक । एकत्र करते हैं लोक । कहते हैं संपदा ॥ ६६ ॥ सुख संभावना जो दैवी । तथा दैवी गुणोपजीवी । होती है इसीलिये दैवी । संपत्ति है वह ॥ ६७ ॥ भगवान उवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥ श्री भगवानने कहा निर्भयत्व मनःशुद्धि व्यवस्था ज्ञानयोगमें । यज्ञ निग्रह दातृत्व स्वाध्याय ऋजुता तप ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ६३०