ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
जिज्ञासु-जन आप समस्त । सोचते ऐसे अपने चित्त । यह पूर्ण करने यथार्थ । बोलेंगे श्रीहरि ॥ ५८ ॥ जिससे होगा ज्ञान उत्पन्न । आप होंगे विश्रांतिसे पूर्ण । ऐसे दैवी-गुणोंका वर्णन । करेंगे श्रीहरि ॥ ५९ ॥ ज्ञानका कर अनादर । राग-द्वेषको दे आधार । वे आसुरी गुण भी घोर । कहेंगे स्पष्ट ॥ ६० ॥ इष्टानिष्ट दोनों स्वाभाविक । करता है जिनका कौतुक । उनका कथन किया देख । पहले नवममें ॥ ६१ ॥ वहां करना था इसका विस्तार । वहां अन्य विषय हुवा गोचर । तब यहां किया प्रसंगानुसार । उसका निरूपण ॥ ६२ ॥ इसका अब निरूपण । सोलहवेमें करेंगे पूर्ण । क्रमानुगत संख्या जान । पहलेसे जो ॥ ६३ ॥ रहने दो यहां है जो प्रस्तुत । जाननेमें ज्ञानका हिताहित । देवासुर संपदा है समर्थ । कहेंगे अब ॥ ६४ ॥ जो है मुमुक्षुओंका पथ दर्शक । तथा मोह-रात्रिका तम नाशक । कहती दैवी संपदा अलौकिक । सुनो वह प्रथम ॥ ६५ ॥ जहां परस्पर पोषक । ऐसे पदार्थ जो अनेक । एकत्र करते हैं लोक । कहते हैं संपदा ॥ ६६ ॥ सुख संभावना जो दैवी । तथा दैवी गुणोपजीवी । होती है इसीलिये दैवी । संपत्ति है वह ॥ ६७ ॥ भगवान उवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥ श्री भगवानने कहा निर्भयत्व मनःशुद्धि व्यवस्था ज्ञानयोगमें । यज्ञ निग्रह दातृत्व स्वाध्याय ऋजुता तप ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ६३०
१ दैवी-गुण, अभय— अब जो दैवी गुणके श्रेष्ठ । आसन पर बैठता ज्येष्ठ । गुण कहलाता है वरिष्ठ । अभय ऐसे ॥ ६८ ॥ कूदा ही नहीं महा-पूरमें । तब डूबना कहो किसमें । या रोग नहीं आता घरमें । पथ्यके कभी ॥ ६९ ॥ वैसे कर्माकर्मका अहंकार । उठने नहीं देता धनुर्धर । तथा संसार भय तजकर । रहना सदैव ॥ ७० ॥ अथवा ऐक्य भावसे भरकर । अपनेसे अन्य नहीं मानकर । भय-वार्ताको करता सीमा पार । पूर्ण रूपसे ॥ ७१ ॥ जब लवणको पानी डुबाता । तब लवण ही पानी बनता । वैसे आप ही अद्वय बनता । नाशता भय ॥ ७२ ॥ जिसको कहते हैं अभय । वह समझनेसे अद्वय । चलता रहता धनंजय । सदा सर्वत्र ॥ ७३ ॥ २ दैवी-गुण, सत्त्वसंशुद्धि— तथा सत्त्वशुद्धि जो कहलाता । एसे लक्षणोंसे है जाना जाता । जो न जलता या नहीं बुझता । राखके जैसे ॥ ७४ ॥ या शुक्लमें जो न बढ़ता । या कृष्णमें जो न घटता । वैसे सूक्ष्म होके रहता । चंद्रमा जैसे ॥ ७५ ॥ या वर्षाका उतरा महापूर । ग्रीष्मका शुरू न हुआ उतार । वैसे निज रूपमें हो सुंदर । गंगा प्रवाहसा ॥ ७६ ॥ वैसे संकल्प विकल्पका खींचाव । रज तमका तज बोझ दबाव । अनुभवता निज-धर्म स्वभाव । बुद्धिमात्र ॥ ७७ ॥ इन्द्रिय-समूहसे जो दर्शित । उचित अथवा हो अनुचित । देख चित्त नहीं होता स्पंदित । किंचितमात्र ॥ ७८ ॥ घरसे दूर गया वल्लभ । पतिव्रताका विरह क्षोभ । भुला देता अन्य हानि लाभ । मनमें न डसता वैसे ॥ ७९ ॥ ६३१ देवासुर-संपद्विभाग योग
वैसे ही सत्स्वरूपमें पार्थ । अनन्य हो रहना सतत । सत्त्व-शुद्धि कहता श्रीनाथ । असुरारी जो ॥ ८० ॥ ३ दैवी-गुण, योगज्ञान व्यवस्थित— तथा जो आत्म-लाभके विषयमें । ज्ञान या योग दोनोंमेंसे एकमें । रखना अचल निष्ठा हृदयमें । योग्यतानुसार ॥ ८१ ॥ अपनी सभी चित्त वृत्ति । तजना वहां इस भांति । निष्काम देता पूर्णाहुति । यज्ञमें जैसे ॥ ८२ ॥ या कुलीन कन्यादान । दिया सत्कुलमें ही मान । या लक्ष्मी स्थिर हुई जान । नारायणमें ॥ ८३ ॥ ऐसे अनन्य होकर । योग-ज्ञानमें स्थिर । होना जो गुण तीसरा । जाण तू पार्थ ॥ ८४ ॥ ४ दैवी-गुण, दान— तथा तन मन वचनसे । संपन्नतानुसार वित्तसे । आर्त शत्रुको भी ऋजुतासे । पांडुकुमार ॥ ८५ ॥ पत्र पुष्प तथा छाया । फल फूल धनंजया । पथिक जो पास आया । देता वृक्ष जैसे ॥ ८६ ॥ वैसे मनसे धन तक सब । जब जैसे आवश्यक हो तब । काममें लाना आता श्रांत जब । विश्रामार्थ ॥ ८७ ॥ इसको कहते हैं दान । जो मोक्ष निधान अंजन । रहने दे अब अर्जुन । सुन तू दम ॥ ८८ ॥ ५ दैवी-गुण, दम— अजी ! जो विषयेंद्रियोंका मिलन । उसको भंग कर देता भिन्न । जैसे खडु गंदला पानी अर्जुन । करता शुद्ध ॥ ८९ ॥ विषय स्पर्श न होने देता । इंद्रियोंको बचाके रखता । नियम बद्ध कर सौंपता । प्रत्याहारके ॥ ९० ॥ ज्ञानेश्वरी ६३२
चित्त तक सब तज अंदर । प्रवृत्ति चली जाती है बाहर । तब सजाता है इंद्रिय द्वार । वैराग्याभिसे ॥ ९१ ॥ श्वासोच्छ्वाससे भी जो कठिन । व्रत आचरता निशिदिन । उसमें न मिलता है क्षण । विश्रांति उसको ॥ ९२ ॥ दम कहते हैं जिसे । उसके लक्षण ऐसे । यागार्थको संक्षेपसे । कहता हूं सुन ॥ ९३ ॥
६ दैवी-गुण, यज्ञ— ब्राह्मणोंसे स्त्रियों तक । सबका विधिपूर्वक । अपना कर्तव्य नेक । करना सब ॥ ९४ ॥ जिसका है जो सर्वोत्तम । भजनीय देवता-धर्म । वह उसका यथागम- । पूर्वक करना ॥ ९५ ॥ द्विज जैसे षट्कर्म करता । उसे शूद्र नमन करता । उन दोनोंका समान होता । यह यज्ञकर्म ॥ ९६ ॥ अधिकारानुसार अपना । सबका ऐसे यज्ञ करना । उससे फलाशा न करना । विष रूप जो ॥ ९७ ॥ तथा मैं करता ऐसा भाव । न ले देह कार्यका पांडव । किंतु वेदकी आज्ञाका ठाव । होकर रहना ॥ ९८ ॥ अर्जुन ! यह है संज्ञा । सर्वत्र जान तू यज्ञ । कैवल्य-मार्गका विज्ञ । कहता यह ॥ ९९ ॥
७ दैवी-गुण, स्वाध्याय— गेंदसे जैसे भूमिको जो मारना । मारना नहीं गेंद हाथमें लाना । अथवा खेतमें बीजको फेंकना । उपजके लिये ॥ १०० ॥ या रखी वस्तू देखनेके लिये । आदरसे जाते हैं दिया लिये । शाखामें फल फलनेके लिये । सींचते हैं मूल ॥ १ ॥ जाने दे यह जैसे है शीसा । आप देखनेके लिये ऐसा । पोंछ पोंछ रखते हैं स्वच्छ-सा । प्रीतिसे नित ॥ २ ॥
६३३ देवासुर-संपद्विभाग-योग
वैसे प्रतिपाद्य जो ईश्वर । होनेके लिये वह गोचर । करना श्रुतिका निरंतर । अभ्यास पार्थ ॥ ३ ॥ द्विजोंको देखना ब्रह्मसूत्र । अन्योंको स्तोत्र या नाममंत्र । आवर्तन करना पवित्र । देखने तत्व ॥ ४ ॥ कहलाता है यह स्वाध्याय । सुन तू यह धनंजय । तप शब्दका अभिप्राय । कहता हूं अब ॥ ५ ॥
८ दैवी-गुण, तप— दानका अर्थ है सर्वस्व देना । व्ययको संपूर्ण व्यर्थ करना । फलकर जैसे स्वयं सूखना । वनस्पतिका धर्म ॥ ६ ॥ अन्यान्य धूपका जैसे अग्नि-प्रवेश । कनकमें जैसे मलका नाश । या बढ़ते पित्र-पक्षमें ह्रास । जैसे चंद्रमाका ॥ ७ ॥ वैसे स्वरूप प्राप्तिके कारण । गलाना तन मन प्राण । दक्ष रह करके प्रतिक्षण । कहलाता तप ॥ ८ ॥ अथवा तपका रूप भिन्न । अन्य कोई है तो तू जान । दूधमें डाली जैसे चोंच अर्जुन । हंसकी जो ॥ ९ ॥ वैसे देह जीवका मिलन । उसमें पानी करता भिन्न । वह विवेक अंतःकरण । जगाये रखना ॥ ११० ॥ देखते मानो आत्माकी ओर । बुद्धि संकोष होता सत्वर । निद्रा स्वप्न जैसे धनुर्धर । जागृतिमें डूबते ॥ ११ ॥ वैसे आत्म-आलोचन । होता सही प्रवर्तन । तपका सही अर्जुन । होता अर्थ ॥ १२ ॥
९ दैवी-गुण, आर्जव = ऋजुता— बालकके लिये जैसे रम्य । होता भूतमात्रमें चैतन्य । वैसे जीवमात्रमें सौजन्य । कहलाता आर्जव ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६३४
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं हीरचापलम् ॥ २ ॥ १० दैवी-गुण, अहिंसा— विश्व-हित उद्देश्यसे । तन बचन मनसे । रहना जो दक्षतासे । अहिंसा जान ॥ १४ ॥ ११ दैवी-गुण, सत्य— तीक्ष्ण होकर भी मृदुल । जैसे स्वभावसे मुकुल । तेज होकर भी शीतल । शशांकका ॥ १५ ॥ दिखाते ही करे रोग निवारण । किंतु न लगे जिव्हामें जान । ऐसी औषधी न होनेके कारण । उपमा दूं कैसे ॥ १६ ॥ मृदुतामें जैसे आंखोंकी पूतली । किंतु है रगड़ने पर भी भली । वैसे फोडती पत्थरकी भी शिली । उदक जैसे ॥ १७ ॥ वैसे संदेह करनेमें दूर । मानो अति तीक्ष्ण तलवार । किंतु है सुननेमें मधुर । मधुसे भी ॥ १८ ॥ सुननेमें कौतुक । कानोंको होता सुख । सत्यतामें है देख । भेदता ब्रह्मको ॥ १९ ॥ अथवा जो कभी प्रियत्वमें । न आता किसीके झांसेमें । पूर्ण होकर भी सत्यमें । किसीको चुभता नहीं ॥ १२० ॥ वैसे तो व्याध-ध्वनि कर्ण-मधुर । अंत लाती है अतीव भयंकर । अग्नि जलाता है वैसे खुलकर । जले वह सत्य ॥ २१ ॥ रहता है अति कर्ण-मधुर । किंतु छीलता हृदय गह्वर । ऐसी भाषा भाषा नहीं सुंदर । होती है बला ॥ २३ ॥ अहितमें जैसे हो क्रोधानल । लालनमें सुमनसे कोमल । माताका रूप है यह सरल । बाचाका भी ॥ २४ ॥ अहिंसा सत्य अक्रोध त्याग शांति अपैशुन । निर्लोभ स्थैर्य माधुर्य मर्यादा जीवमें दया ॥ २ ॥ ६३५ दैवासुर-संपद्विभाग-योग
वैसे ही हो सुननेमें सुखमय । परिणाममें सत्य मंगलमय । बोलनेमें अविकार औ' सदय । सत्य है वह ॥ २५ ॥ १२ दैवी-गुण, अक्रोध— जैसे कितना ही पानी डालकर । शिलामें नहीं फूटता है अंकुर । अथवा छासको बहु मथकर । आता क्या नवनीत ॥ २६ ॥ केंचुलीके सिर पर पैर । मारा तो क्या उठाता है सिर । तथा वसंतमें भी अंबर । नहीं देता फूल ॥ २७ ॥ जैसे रंभाके भी अनेक रूप । न जगा सका शुकमें कंदर्प । या राखमें न होती है उदीप । घृतसे भी आग ॥ २८ ॥ शिशु भी क्रोधित हो वैसे । कुवाचाके बीजाक्षरोंसे । अथवा अन्य उपायोंसे । किसी समय ॥ २९ ॥ ब्रह्मको भी नमन कर पार्थ । गतायु कभी न होता जागृत । वैसे उसमें कभी न जागृत । होता क्रोध तरंग ॥ १३० ॥ १३ दैवी-गुण, त्याग— मृत्तिका त्यागसे घट । तंतुके त्यागसे पट । बीजके त्यागसे वट । त्याग जैसे ॥ ३१ ॥ या तजकर भित्तिमात्र । तजता है संपूर्ण चित्र । या निद्रा-त्यागसे विचित्र । स्वप्न जाल ॥ ३२ ॥ तथा जल त्यागसे तरंग । वर्षा त्यागसे अनेक मेघ । वैसे झडते हैं समस्त भोग । धन-त्यागसे ॥ ३३ ॥ वैसे ही जो बुद्धिमंत । तजते हैं देहाहंता । जिससे संसार जात । छूटते हैं ॥ ३४ ॥ इसका नाम है त्याग । कहता यह यज्ञांग । यह मानके सुभग । पूछता पार्थ ॥ ३५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६३६
१४ दैवी-गुण, शांति— अब शांतिका लक्षण । कह तू मुझे श्रीकृष्ण । कृष्ण कहता अर्जुन । सुन तू अब ॥ ३६ ॥ निगलकर जब ज्ञेय । ज्ञाता ज्ञान भी धनंजय । मिट जाता जिस समय । मिलती जो शांति ॥ ३७ ॥ जैसे प्रलयांबुका उभार । डुबाकर विश्वका प्रसार । अपनेमें ही रहता नीर । भरके आप ॥ ३८ ॥ उगम ओघ तथा सागर । न रहता यह व्यवहार । सर्वत्र अनुभवता नीर । वह भी कौन ॥ ३९ ॥ वैसे ज्ञेयका होते ही आलिंगन । ज्ञातृत्व भी होता उसमें लीन । फिर रहता जो कुछ अर्जुन । वह है शांति ॥ १४० ॥ १५ दैवी-गुण, अनिंदा— जैसे रोगको दूर कर । पुष्ट करनेमें शरीर । न देखता है आप पर । कमी सद्वैद्य ॥ ४१ ॥ या कीचमें फंसी गाय देखकर । नहीं देखा जाता सूखी या दुधार । उसकी जीवन व्यथा देख कर । चित्त होता व्याकुल ॥ ४२ ॥ डूबतेको देखकर सकरुण । न पूछता तू अंत्यज या ब्राह्मण । जानता उसके बचाना है प्राण । इतना मात्र ॥ ४३ ॥ महावनमें पापीसे नग्न । की हुई स्त्रीको कोई सज्जन । उसको वस्त्र पहने बिन । न देखता जैसे ॥ ४४ ॥ वैसे अज्ञान या प्रमादमें । अथवा दुर्दैव या दोषमें । सभी प्रकारके निंद्यत्वमें । जकड़े गये जो ॥ ४५ ॥ उन्हे अपने अंगके । भले गुण दे करके । भुलाते हैं चुभनेके । सभी शल्य ॥ ४६ ॥ अजी ! दूसरोंके सभी दोष । अपनी दृष्टिसे कर चोख । उनकी ओर वे फिर नेक । दृष्टिसे देखते ॥ ४७ ॥ ६३७ देवासुर-संपद्विभाग-योग
पूज कर जैसे देव देखना । बुवाई करके खेतमें जाना । संतुष्ट करके प्रसाद लेना । अतिथिका जैसे ॥ ४८ ॥ ऐसे लगाकर अपने गुण । दूर कर औरके अवगुण । देखा करता है जो अर्जुन । सबकी ओर ॥ ४९ ॥ न करना मर्माघात । न उलझाना पापमें पार्थ । सदोष नामसे उल्लिखित । न करना कभी ॥ १५० ॥ तथा करके कोई उपाय । पतित खडा हो धनंजय । ऐसे ही करना सभी कार्य । न हो मर्माघात ॥ ५१ ॥ अधमको भी मान । उत्तम ही अर्जुन । कभी इसके बिन । न देखें दोष ॥ ५२ ॥ अनिंदाका यह लक्षण । जान तू होता है अर्जुन । मोक्ष-मार्गका सुखासन । मुमुक्षुओंका ॥ ५३ ॥ १६ दैवी-गुण, दया— अब दया है ऐसी । पूर्ण चंद्रिका जैसी । शीतलता एकसी । देती सबको ॥ ५४ ॥ वैसे दुखितोंका कष्ट । दूर करना है इष्ट । उसमें श्रेष्ठ कनिष्ठ । देखता नहीं ॥ ५५ ॥ जगतमें जीवन जैसे । नाश होता है अंगसे । किंतु बचाना अपनेसे । तृणजात ॥ ५६ ॥ वैसे अन्योंका देख ताप । चटपटाता हो सकृप । सर्वस्व देकर भी आप । कुछ भी मानता नहीं ॥ ५७ ॥ जैसे गढ़ा देखकर अपूर्ण । पानी आगे नहीं बहता जान । वैसे श्रांतको तोष दिये बिन । आगे नहीं जाता ॥ ५८ ॥ पैरोंमें जब कांटा चुभता । उससे हृदय तडपता । वैसे कष्टोंसे चटपटाता । अन्योंके यह ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ३३८
या पैरोंकी होती शीतलता । आंखोंको मिलती है शांतता । वैसे पर सुखसे हर्षता । सदैव आप ॥ १६० ॥ या प्यासोंके लिये जैसे । पानीका जन्म है वैसे । दुखितोंके लिये वैसे । जीवन उसका ॥ ६१ ॥ ऐसे पुरुष धनंजया । मूर्तिमंत जान तू दया । उसके जन्मसे ही भया । ऋणी मैं उसका ॥ ६२ ॥ १७ दैवी-गुण, अलोभ— जीव-भावसे अनुसरता । सूर्य पुष्प सूर्यको सतत । किंतु सूर्य कभी नहीं लेता । सौरभ उसका ॥ ६३ ॥ अथवा वसंतमें आते अनंत । वनमें बहार वैभवके नित । किंतु उनको तजकर वसंत । चलता जैसे ॥ ६४ ॥ जाने दो महासिद्धियोंके साथ । लक्ष्मी आयी पास कहके नाथ । किंतु महा-विष्णु न देखता पार्थ । उसकी ओर ॥ ६५ ॥ वैसे लौकिक या पारलौकिक । आते भोग बनकर सेवक । किंतु तरंग न उठते देख । भोगके मनमें ॥ ६६ ॥ इससे कहना क्या अधिक । मनमें न उठे सकौतुक । अभिलाषा विषयकी देख । वह अलोलुप्य ॥ ६७ ॥ १८ दैवी-गुण, मार्दव— मद्माखियोंको छत्ता सुखकर । जलमें ही जैसे सुखी जलचर । या पक्षियोंको गगन धनुर्धर । होता है मुक्त ॥ ६८ ॥ या बालकके हितमें जैसे । माताका स्नेह होता है वैसे । बसंतमें छूता है हौलेसे । मलयानल ॥ ६९ ॥ या आखोंको प्रियका दर्शन । पिल्लोंको कूर्मीका दृष्टि जान । वैसे है उसका आचरण । जीव-मात्रसे ॥ १७० ॥ ६३९ देवासुर-संपद्विभाग-योग
स्पर्शमें जो है अति मृदु । मुखमें लिया तो सुस्वादु । घ्राणमें वैसे ही सुगंधु । अंगोंसे उज्ज्वल ॥ ७१ ॥ यदि चाहे जितना भी लेता । कोई नुकसान नहीं होता । उसको तब है कहा जाता । कर्पूरसा वह ॥ ७२ ॥ महाभूत अपनेमें समालेता । तथा परमाणुमें भी जो समाता । जैसे विश्व है वैसे ही बन जाता । आकाश जैसा ॥ ७३ ॥ क्या कहूं मैं ऐसोंका जीवन । विश्वके लिये जीव धारण । उसको कहता हूं अर्जुन । मार्दव मैं ॥ ७४ ॥ १९ दैवी-गुण, मर्यादा : लज्जा— तथा पराजयसे राजा । हीन दशामें जो सलज्ज । स्वाभिमानी होता निस्तेज । निकृष्टतामें ॥ ७५ ॥ या आया चंडालका सदन । अकस्मातही संन्यासी जान । होता है जैसे सलज्जमन । उत्तम जो ॥ ७६ ॥ क्षत्रियको रणसे भागना । कैसे सहना निर्लज्ज जीना । विधवा नामसे पुकारना । महासतीको जैसे ॥ ७७ ॥ सुरूपको महारोग भया । या शिष्टको कलंकित किया । प्राण संकटमें लजा गया । उसी भांति ॥ ७८ ॥ साडे तीन हाथका देह बना । तथा शवसा बनकर जीना । जनम ले लेकर मरना । पुनः पुनः जो ॥ ७९ ॥ गर्भके मेद सांचेमें । रक्त मूत्रके रसमें । पुतला बन जीनेमें । आती लज्जा ॥ १८० ॥ लेकर यह देहपन । नाम रूपका धारण । रहनेसे न कुछ भिन्न । लज्जा जनक ॥ ८१ ॥ ऐसेमें देहसे उकताकर । रहते हैं सूज्ञ पांडुकुमार । तथा मानते निर्लज्ज अपार । उसीमें सुख ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४०
२० दैवी-गुण, स्थैर्य— सूत्र तंतु जब टूट जाता । गुड़ियाका थै थै रुक जाता । वैसे प्राण-जयसे टूटता । कर्मेंद्रियोंका खेल ॥ ८३ ॥ या अस्त होते ही दिनकर । रुकता किरणोंका प्रसार । वैसे मनो-जयसे व्यापार । ज्ञानेंद्रियोंका ॥ ८४ ॥ ऐसे मन-प्राणका संयम । करता है इंद्रियां अक्षम । यह है अचांचल्यका मर्म । जानना यहां ॥ ८५ ॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता । भवंति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥ २१ दैवी-गुण, तेज— संकट है मरनेका-सा । वह है अग्नि-प्रवेश-सा । प्राणेश्वरके लिये ऐसा । नहीं गणती सती ॥ ८६ ॥ वैसे आत्म-नाथके ध्यानमें भर । विषय विषकी बाधा दूर कर । जाता शूल्यकी कांटेली राह पर । दौड़ना है उसको ॥ ८७ ॥ निषेधकी बाधा तब नहीं आती । विधिकी भीड़ भी उसे न रोकती । हृदयमें चाह कभी नहीं होती । महासिद्धियोंकी ॥ ८८ ॥ ईश्वराभिमुख हो ऐसे निज । दौड़ता अपने आप सहज । उसको कहते हैं सुज्ञ तेज । अध्यात्मिक जो ॥ ८९ ॥ २२ दैवी-गुण, क्षमा— तथा रहता है सभी गरिमा । गर्व नहीं आता है वही क्षमा । जैसे ढोता है शरीर जो रोम । जानता न ढोता ॥ १९० ॥ पवित्रता क्षमा तेज धैर्य अद्रोह नम्रता । जिसके गुण ये आया दैवी संपत्ति लेकर ॥ ३ ॥ (80) ६४१ देवासुर-संपद्विभाग-योग
२३ दैवी-गुण, धैर्य— तथा उभर आया इंद्रिय-वेग । या भड़क उठे हैं पुराने रोग । अथवा हुये नाता योग-वियोग । प्रियाप्रियोंके ॥ ९१ ॥ इन सबका आया बवंडर । या साथ मिलकर आया पूर । तब अगस्ति बनकर धीर । खडा होता है ॥ ९२ ॥ नभमें धूम्रका वलय । जोरसे उठा धनंजय । क्षणमें करता विलय । वायु जैसे ॥ ९३ ॥ वैसे अधिभूताधिदैव । अध्यात्मिकादि उपद्रव । होते हैं उनको पांडव । निगलता जो ॥ ९४ ॥ जब ईश्वरकी प्राप्तिमें । प्रवर्तता ज्ञान-योगमें । धीरजका न्यून उसमें । नहीं होता ॥ ९५ ॥ आता ऐसा चित्त-क्षोभका समय । सहके पराक्रम करता धैर्य । धृति कहते हैं जिसे धनंजय । वह हैं यही ॥ ९६ ॥ २४ दैवी-गुण, शौच=पवित्रता— जैसे शुद्ध कनक-कलश । उसमें भरा गंगा पीयूष । जैसे हे अंतर्बाह्य कलश । वैसे पावित्र्य ॥ ९७ ॥ शरीरसे निष्काम आचार । हृदयमें विवेक साकार । अंतर्बाह्य बना है आकार । शुचित्वका जो ॥ ९८ ॥ २५ दैवी-गुण, अद्रोह— हरते हरते पाप ताप । पोसते किनारेके पादप । समुद्र तक जाता है आप । गंगाका जैसे ॥ ९९ ॥ या विश्वका तम हरते । क्रियाका सदन खोलते । चला परिक्रमा करते । भास्कर जैसे ॥ २०० ॥ वैसे बद्धको मुक्त करते । डूबेहुओंको जो उभारते । कठिनाईको दूर करते । अंतरतमकी ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४२
वैसे वह दिवस-राति । करते सबकी उन्नति । चलता आत्म-हित-रति । धनुर्धर ॥ २ ॥ केवल अपने हितार्थ । प्राणियोंका अहित पार्थ । मनमें भी लाना किंचित । नहीं कभी ॥ ३ ॥ अद्रोहत्वकी ऐसी गोष्ठी । कही मैंने तुझे किरीटी । मानो वह प्रत्यक्ष दृष्टी । देखती है ॥ ४ ॥
२६ दैवी-गुण, अमानित्व— गंगा जैसे चढके शंभुके माथ । आप हुई अपनेमें संकुचित । वैसे सन्मानसे भी करें प्रतीत । लज्जा आप ॥ ५ ॥ वह अमानित्व कहलाता । तुझसे पहले जो कहा था । वही वही कहना क्या पार्थ । बार बार ॥ ६ ॥
दैवी-गुणोंकी महानता— ऐसे ये गुण हैं जो छब्बीस । ब्रह्मेश्चर्य करता निवास । मोक्ष-चक्रवर्तिका है खास । अग्रहार ॥ ७ ॥ ऐसी नाना संपदा दैवी । गुण-तीर्थकी नित्य-नवी । निरिच्छ सगरोंकी दैवी- । गंगा बह आयी ॥ ८ ॥ या गुण-पुष्पकी वरमाला । लेकर आयी है मुक्ता बाला । निरिच्छ विरक्तका है गला । खोजती है ॥ ९ ॥ अथवा छब्बीस गुणोंकी ज्योती । उजलाकर ले यह आरती । उतारने आयी गीता खोजती । पति आत्माको ॥ २१० ॥ उगलते हैं जो निर्मल । इन गुणोंके मुक्ता-फल । दैवी श्रियाके शुक्तावळ । गीतार्णवमें जो ॥ ११ ॥ कितना करूं इसका वर्णन । कहे हैं स्पष्ट होंगे ऐसे गुण । इन गुण-राशिका है दर्शन । दैवी श्रियाका रूप ॥ १२ ॥
६४३ देवासुर-संपद्विभाग-योग
आसुरी-गुणोंकी ओर संकेत— दुःख क्लेशकी जो पुष्ट लता । दोष-कांटोंसे भरी है पार्थ । वह अपनी व्याख्यामें लाता । आसुरी जो ॥ १३ ॥ त्याज्यको तजनेके हित । जान लेता है उपयुक्त । इसीलिये दे तू स्व-चित्त । सुननेमें यह ॥ १४ ॥ यह है नरक-व्यथा घोर । लाये दोष अति भयंकर । एकत्र किये हैं ये असुर- । संपदा रूप ॥ १५ ॥ नाना विष वर्गका कर गठन । बनाया जाता कालकूट महान । वैसे सभी दोषोंका कर मिलन । बनी आसुरी संपदा ॥ १६ ॥ दंभो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । अज्ञानंचाभिमानस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥ ४ ॥ १ आसुरी-गुण, दंभ— आसुरी दोषमें ख्यात । गर्जेके जिसका पार्थ । नाम चलता सतत । दंभ ऐसा ॥ १७ ॥ अपनी जननी है पावन । रहती जो तीर्थके समान । किंतु जनमें करना नग्न । पतन कारण होता ॥ १८ ॥ या विद्या गुरुपदेशमें प्राप्त । चौराहे पर किया प्रदर्शित । इच्छा भी होती अनिष्ट हेत । वैसे ही जो ॥ १९ ॥ डूबनेको महा-पूरमें । पहुंचाती पैल तीरमें । वह नाव बांधे शिरमें । डुबो देती है ॥ २२० ॥ जीवनका जो साधन । अधिक खाया तो अन्न । वही जीवनीय अन्न । होता है विष ॥ २१ ॥ वैसे ही दृश्य-अदृश्यका मित्र । तारक होता है धर्म सर्वत्र । प्रसिद्ध करनेसे जो सर्वत्र । शत्रु बन जाता ॥ २२ ॥ अहंता दंभ अज्ञान क्रोध दर्प कठोरता । आया जो गुण ये लेके आसुरी संपदा वह ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४४
तमी वाचाके चौराहे पर । फैलाया तो धर्मका विस्तार । कहलाता दंभ धनुर्धर । अधर्म-रूप ॥ २३ ॥ २ आसुरी-गुण, दर्प— किंतु मूर्खकी जिव्हा पर । फैलाया तो धर्मका विस्तार । कहलाता दंभ धनुर्धर । वह ब्रह्म सभाको ॥ २४ ॥ या घोड़ा जो भादुरी लोगोंका । ओछा मानता गज इंद्रका । गिरगिट जो कांटों परका । स्वर्ग भी बौना ॥ २५ ॥ या तृणका जो ईंधन । भड़कता है गगन । डबरे बसा मीन । माने सिंधु तुच्छ ॥ २६ ॥ फूलता है वह क्षीधन । विद्या स्तुति पाकर मान । एक दिनका ही पराश्न । फुलाता अल्पको जैसे ॥ २७ ॥ जैसे मेघ छाया देख तोड़ता । दुर्दैवी घरका आसरा पार्था । मृग-जल देखकर तोड़ता । पानीका डबरा ॥ २८ ॥ और कहूं मैं कितना । संपत्ति-योगसे नाना । मदमें उन्मत्त होना । कहलाता दर्प ॥ २९ ॥ ३ आसुरी-गुण, अभिमान— तथा वेदमें जिसका विश्वास । विश्वका पूजनीय ईश । विश्वमें एक ही महा तेजस । सूर्य मात्र ॥ २३० ॥ विश्वमें जो है स्पर्धास्पद । एक ही सार्वभौम पद । न मरना है निर्विवाद । विश्वको भाता ॥ ३१ ॥ इसीलिये यदि उत्साहसे । इसका वर्णन करनेसे फूलता वह अभिमानसे । तथा रखता डाह ॥ ३२ ॥ कहता निकालूंगा ईशको । गरल पिलाऊंगा वेदको । खपाता है अपने बलको । स्व-गौरवार्थ ॥ ३३ ॥ ६४५ देवासुर-संपद्विभाग-योग
पतंगको दीप नहीं भाता । जुगनूको सूर्य क्लेश देता । तथा पंखेरू द्वेष करता । महासागरका ॥ ३४ ॥ वैसा अहं नामका मोह । ईश्वरसे करता द्रोह । वेदसे माने ऐसा डाह । मानो है सौत ॥ ३५ ॥ स्वयं मान्यताका दुष्ट भाव । अभिमानसे बनता देव । रौरवका पथ है पांडव । जो चलता आया ॥ ३६ ॥
४ आसुरी-गुण, क्रोध—
वैसे ही दूसरोंका सुख । जलता है सदा देख । बढे जैसे क्रोधका विष । मनोदशा यह ॥ ३७ ॥ तपा तेल जल पा कर शीतल । भड़क उठता जैसे महाज्वाल । या चंद्रमाको देखकर उदर-ज्वाल । उठती सियारके ॥ ३८ ॥ विश्वका जीवन जिससे उजलता । वह सूर्योदय देख विश्व खिलता । किंतु है उलूकका नयन फूटता । पापीके जैसे ॥ ३९ ॥ प्रातःकाळ सुख है विश्वका । किंतु मृत्युसा दुःख है चोरका । कालकूट बनता दूधका । सांपमें जैसे ॥ २४० ॥ अगाध सागर जल । पीकर वड़वानल । भडकता बन ज्वाल । न पाता शांति ॥ ४१ ॥ वैसे विद्या विनोद विभव । देखकर अन्योंका सुदैव । भडकता जाता शेष भाव । वह है क्रोध ॥ ४२ ॥
५ आसुरी-भाव, कठोरता—
तथा मन जिसका व्याल-विवर । आंखें मानो विष-बाणके अंकुर । बोलना जैसे बरसते अंगार । जलते हुए ॥ ४३ ॥ ऐसे जिसके क्रिया जात । तीखे जैसे आरेके दांत । सबाङ्ग खरोंचता नित । पारुष सबको ॥ ४४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६४६
मानवोंमें उसको अधम जान । कठोरताका ही जो अवतरण । सुन तू अब कहता हूं लक्षण । अज्ञानका मैं ॥ ४५ ॥ ६ आसुरी-भाव, अज्ञान— शीत उष्णादि स्पर्श जैसे । न जानता पाषाण वैसे । या रात्र और दिवससे । अनभिज्ञ जात्यंध ॥ ४६ ॥ उठता अग्नि जैसे खाता । खाद्याखाद्य नहीं जानता । या पारस नहीं जानता । लोह या सोना ॥ ४७ ॥ या नाना रसोंमें जैसे । डूबती कड़ची जैसे । किंतु रसास्वाद ऐसे । जानती नहीं ॥ ४८ ॥ अथवा जैसे वायु होता । मार्गामार्ग नहीं जानता । वैसे कृत्याकृत्यमें होता । वह अंधा ॥ ४९ ॥ जैसे यह स्वच्छ है मैला । यह नहीं जानता बाल । जिसे देखता वह केवल । डालता मुखमें ॥ २५० ॥ खिचडी कर वैसे पाप-पुण्यकी । खाते हुए नहीं बुद्धिमें उसकी । भला बुरा यह नहीं जाननेकी । ऐसी जो दशा ॥ ५१ ॥ उसका नाम है अज्ञान । इस बोलसे नहीं भिन्न । ऐसे छ दोषोंका लक्षण । कहे सब ॥ ५२ ॥ आसुरी संपदा जीवन विनाशक होती है— ऐसे छ दोषोंसे भरकर पूर्ण । आसुरी संपदा हुई बलवान । छोटीसी शुभांगीमें जैसे अर्जुन । हो विषय अतिशय ॥ ५३ ॥ अथवा तीन अग्निकी पंक्ती । देखनेमें छोटीसी लगती । किंतु है विश्वकी प्राणाहूती । ओछी उसको ॥ ५४ ॥ या विधाताको जाकर शरण । त्रिदोषसे न चुकता मरण । उन तीनोंके ये दूने हैं जान । छह दोष ॥ ५५ ॥ ६४७ दैवासुर-संपद्विभाग-योग
इन छह दोषोंसे संपूर्ण । बनाया है आसुरी भवन । इसलिये अल्प न अर्जुन । आसुरी संपदा ॥ ५६ ॥ या क्रूर ग्रहोंका मिलन । होता एक राशिमें जान । या निंदकके पास पूर्ण । आते सब पाप ॥ ५७ ॥ या मरनेवालेके अंग । ग्रासते जैसे सभी रोग । या कुसमयमें दुर्योग । होते एकत्र ॥ ५८ ॥ या जीवन समाप्तिकी आती बेला । बकरीको डसता बिच्छू काला । वैसे ये छ ही दोष जिसे सकल । घेरते हैं ॥ ५९ ॥ विश्वासु जैसे चोरसे पकड़वाता । या थका हुवा महापूरमें फंसता । वैसे ही इन दोषोंसे अनिष्ट होता । मनुष्यका सदैव ॥ २६० ॥ यदि किसी मोक्ष-पथिक पर । इनका पडा इक छींटा भर । डुबाएगा उसे भव-सागर । न उठेगा वह ॥ ६१ ॥ उतरके अधम योनिकी । सीढी परसे जो अंतिमकी । स्थावर तक गति उसकी । पहुंचेगी ही ॥ ६२ ॥ छ दोष ये जिनमें । पाये जाते उनमें । बढ़ती संपदामें । आसुरी जो ॥ ६३ ॥ ऐसे हैं ये भिन्न । संपदा तू जान । कही स-लक्षण । तुझसे अब ॥ ६४ ॥ दैवी संपद्विमोक्षाय निबंधायासुरी मता । मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पांडव ॥ ५ ॥ तू दैवी संपत्तिका स्वामी है— इन दोनोंमें पहली । दैवी संपदा जो भली । मोक्ष-सूर्यसे उजली । प्रभात जान ॥ ६५ ॥ मुक्तता करती दैवी आसुरी बांधती जहां । पायी है संपदा तूने दैवी न कर सोच तू ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४८
अध्याय १२: भक्तियोग
तथा ये जो दूसरी । संपदा है आसुरी । मोह-लोहकी खरी । सांखली है ॥ ६६ ॥ यह सुन कर तू अर्जुन । भय खायेगा अपने मन । किंतु कभी रातसे क्या दिन । भय खाता है ॥ ६७ ॥ जो है यह आसुरी संपत्ति । उसीका बंधन हो सकती । आश्रित होती जिनकी मति । इन दोषोंकी ॥ ६८ ॥ किंतु यहां तू अर्जुन । उपरोक्त दैवी गुण । लेकर आया निधान । जन्मसे ही ॥ ६९ ॥ इसीलिये तू यहांका । स्वामी दैवी-संपदाका । बन, पायेगा मोक्षका । सुख शाश्वत ॥ २७० ॥ द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥ अनादिसे ये दो मार्ग चले आये हैं— ऐसे देव और असुर । संपदाके स्वामी जो नर । अनादिसे हैं चलकर । आये दो मार्ग ॥ ७१ ॥ जैसे है रातका अवसर । करते निशाचर व्यापार । तथा दिनमें सुव्यवहार । मनुष्यादिक ॥ ७२ ॥ वैसे ही अपना आचरण । करती है दोनों सृष्टि जान । दैवी तथा आसुरी अर्जुन । जन्म लेकर ॥ ७३ ॥ वैसे भी दैवी सविस्तृत । ज्ञान कथनमें पार्थ । कहा है मैंने यथावत । पीछे ही सब ॥ ७४ ॥ जीवोंकी सृष्टि दो भांति दैवी तथैव आसुरी । सविस्तार कही दैवी आसुरी कहता सुन ॥ ६ ॥ ६४९ देवासुर-संपद्विभाग-योग